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भक्त श्री धनाजी एवं धनावंश

अध्याय : सप्तम - भक्त धना के भक्ति पद

 

(1)

रे चित ! च्यंतसि दीनदयालहि, हरि बिन और न कोई। 

जेहि ध्यावे ब्रह्मण्ड खण्ड लो, करता करे सो होई ।। 

जिन्हि जननी के उदर उदक थे, पिण्ड कीयो दस द्वारा। 

दियो आधार अगिनि मुख राखे, ऐसा खसम हमारा ।। 

कूर्मी अण्ड धरे जल अंतरि, खीर पंक तहं नाहीं। 

पूरन परमानंद पयोधर, चित चिंतित तिहि ठांई ।। 

पाहन कीट गोपि सबहिन थें, मारग कत हूं नाहीं। 

कहे धनौ ताका हरि पूरिक, तूं कांई जीव डराहीं ।।

(गुरु ग्रंथ साहब में यह पद थोड़े फर्क से है।)

 

(2) आरती

गोपाल तेरा आरता। 

जो जन तेरी भगति करता, जिनके काज संवारता। 

दाल सीधा मांगो घीव, हमारा खुशी करो नित जीव। 

पनही छाजन छीका मांगु, नाज मांगू सत सीका। 

गऊ भैंस मांगो लहरी, इक ताजनि तुरी चंगेरी। 

घर की गृही नारि चंगी, अन धना इव मांगी। 

अवगति बेहद तेरी आरती, हृदय में प्रगट्या न जाई ।।

(गुरु ग्रंथ साहब में यह पद थोड़े फर्क से है।)


 

(3)

जे उधरे जिनि राम कहे, तिनके दुख दारन आप कहे। 

जे उधरे ऊधौ, नारद नांमा, अंबरीक, प्रहलाद सुदांमा ।।

उधरे सिब सनकादिक, सनक, सनंदन चरन परापति। 

दास धनां हरि के गुण गावे, गुर परसादि परम पद पावै ।।

(ग्रंथांक 496 के अनुसार)


 

(4)

ना जानौं राम कैसा जोगी, अनंत गुफा मधुसूदन भोगी ।।

खीर, खांड घ्रित अंमृत भोजन, साधनि न्यूंत जिमाऊं । 

यह कुटि छांडौ और निवासो, बहुरि न या कुटि आऊं ।।

आवत जात बहुत से कीयै इहां ई रह्या न होइ । 

भगत धना जाट सेवग तेरा, हंस चाल्या कुटि रोई ।।

(ग्रंथांक 561 के अनुसार)


 

(5)

हरि हरि नित सुमरि ऊबरिसी हरि हूं, कांई रे जीहां हरि न कहे। 

वाऊवा मरण सराणै बैठी, वासै खुरे त्रोड़तो वहै ।। 

निस दिन नाम जपै नारायण, झाले साच पड़े मम झूठि।

दोखी अंत आतम न देखै, पान्ही चढहि जरा तौ पूठि ।।

प्राणियां नांम सुमिर, पुरषोतम, अंनि विषय परहरे आल। 

पग सों पग त्रोड़तो न पेखे, क्रम क्रम जाल नाखतो काल ।।

प्रिसण मरण हरि समरथ पालिस्यै, मेल्हे मा चित सूध मना।

धरि हरि चेत समरि धरणीधर, धरणीधरि ऊबरिसी धना ।।

(प्राचीन राजस्थानी गीत)


 

(6)

हरि गुण गाइ रे हरि गुण गाइ, औरे छांडि सबै चत्राई ।। 

टेक ।। चरण गंग गहि नीर न्हवाऊं, पीतांबर क्यं सोभै तास ।

चंदणि किसै करूं हरि लेपण, जाके अंग अनुपम बास ।।

अगर चंदन घसि धूप खिड़ाण, कौण बास मनि राम रली।

पत्री पहुप किसै बनि आणूं, जाके भार अठारह रोमावली ।।

पूजा भगति किसी भूल माणें, जाके सनक सनंदन भगत सुकादि। 

सेस सहंस मुख नांव अराधै, पवन पूज जाकै ब्रह्यादि ।।

जाके नारद निरति नटारंभ संकर, आप अपछरा तोड़ै ताल।

अगणित महिमा राम तुम्हारी, मैं गुण का जाणू गोपाल ।।

अविगत अगम विषम कठिनाई, कहि कहि कहूंक लीयौ जाड़। 

कहै धनौ अरथ परमारथ, जिनि पायौ तिनि सहज सुभाइ ।।

(ग्रंथांक 496 के अनुसार)


(7)

भ्रमत फिरत बहु जनम भुलाने, तनु मनु धनु नहीं धीरे। 

लाल विखु काम लुबध राता, मनि बिसरे प्रभ हीरे ।। 

बिखु फल मीठ लगे मन बउरे, चार विचार न जानिआ। 

गुन ते प्रीति बढी अन भांति, जनम मरन फिरि तनिआ ।। 1।।

जुगति जानि नहिं रिदै निवासी, जलत जाल जम फंद परे।

बिखु फल संचि भरे मन ऐसे, परम पुरख प्रभ मन बिसरे ।। 2 ।। 

गिआन प्रवेसु गुरहि धनु दीआ, धिआनु मानु मन एक मए।

प्रेम भगति मानी सुखी जानिआ, त्रिपति अघाने मुकति भए ।। 3 ।। 

जोति समाइ समानी जाकै, अछली प्रभु पहिचानिआ । 

धंनै धनु पाइआ धरणीधरू, मिलि जन संत समानिआ ।। 4।।

(मूलपाठ-गुरुग्रंथ साहब)


(8)

गोबिंद गोबिंद गोबिंद संगि नामदेउ मनु लीणा। 

आढ दाम को छीपरो, होइओ लाखीणा ।। रहाउ ।। 

बुनना तनना तिआगि कै, प्रीति चरन कबीरा। 

नीचा कुला जोलाहरा, भइओ गुनीय गहीरा ।। 1 ।। 

रविदास ढुवंता ढोर नीति, तिन्हि तिआगी माइआ।

परगटु होआ साध संगी, हरि दरसनु पाइआ ।। 2 ।। 

सैनु नाई बुतकारीआ, ओहु घरि घरि सुनिआ। 

हिरदै वसिआ पारब्रह्यु, भगता महि गनिआ ।। 3 ।। 

इहि विधि सुनि कै जाटरो, उठि भगती लागा। 

मिले प्रतखि गुसाईआ, धंना बड़भागा ।। 4।।

(मूलपाठ- गुरुग्रंथ साहब)


 

(9)

हर हर हर हर हर हर हरे 

हर सुमिरत जन बहु निस्तरे ।। 

हरि के नाम कबीर उजागर, जन्म जन्म के काटे कागर।। 

जन रामदास राम संग राता, गुरु प्रसाद नरक नहिं जाता ।।

गोबिंद गोबिंद संग नामदेव मन लीला, आठ दाम को छीपरो होयो लाखीना ।। 

बुनना तनना तग के प्रीती चरण कबीरा, नीच कुल जोलाहरा भयो गुणी गहीरा ।। 

सैन नाई बुतकरिया ओ घर घर सुनिया, हिरदे वस्या पारब्रह्म भक्तन में गिनिया ।। 

रामदास अधमते वाल्मीकि तिन त्यागी माया, परघट होय साध संग हरि दर्शन पाया ।। 

यह विधि सुन के जाट रो उठ भक्ति लागा, मिले प्रतक्ष गुसाइयां धन्ना बड भागा ।।

(राग रत्नाकर, खेमराज श्रीकृष्णदास, पृष्ठ 152)


धनाजी की साखियां

धनां कहै हरि धरम बिन, पंडित रहै अजांण । 

अण बाह्यो ही नीपजै, बूझौ जाइ किसांण ।।1 ।।

 

धनां धन नहीं राचिये, न राचिये संसार। 

पग बेड़ी गळ रासड़ी, यूं ही गये असार ।।211

 

धनो कहै ते धिग नरा, धन देख्यां गरबाहि । 

धंन तरवर का पांनड़ा, लागे अरु उडि जाहि ।। 3 ।।

 

धनौ कहे धन बांटियै, ज्यूं कूवा का नीर। 

खाटी सापुरिसां तणी, सब काहू का सीर ।। 4 ।1

 

धनां धनि ते संत जन, जे पेठै परभीड़। 

संधि कटावै आपनी, रत्ती न आवै पीड़ ।। 5।।

 

धनां धंनि ते मानवी, धरणीधर सूं प्रीति। 

राति दिवस बिसरै नहीं, रसनां उर मन चीति ।। 6 ।।

 

धरनीधर व्यापक सबै, धरनि ब्यौम पाताल। 

धनौ कहै धनि साध ते, बिसरे नहीं कहुं काल ।।7।।

 

(हरिनारायणजी पुरोहित संग्रह, ग्रंथांक 67)



धनाजी महाराज के पदों की अब तक व्यापक खोज नहीं की गई। यह भी लगता है कि वीतरागी संत होने के कारण उन्होंने कोई सुरक्षा की अधिक चिंता भी नहीं की। अब तक उनका कोई इकजाई ग्रंथ देखने में नहीं आया है। उनके पदों में परिपक्व अभिव्यक्ति देखकर यह अवश्य निश्चित होता है कि उनके पद थोड़ी संख्या में नहीं थे। गुरुग्रंथ साहब में उनके निरगुण भक्ति भावना को अभिव्यक्त करने वाले चार पदों को ही लिया गया। अब तक धनाजी के पद प्राप्ति के स्रोत ग्रंथ गुरुग्रंथ साहब, दादू शिष्य गोपालदास रचित सर्वांग सरह चिंतामणि, सर्वंगी (रज्जब), हरिनारायणजी पुरोहित के संग्रह के ग्रंथ, गुणगंजनामा, द सिख रिलीजन भाग-6 (मैकालिफ), राग रत्नाकर (पद संग्रह) ने हैं।

 

भक्ति को निर्गुण-सगुण खांचों में बांटने वाले भले ही इन उपलब्ध पदों के आधार पर इन्हें निर्गुण भक्त मानले, पर वे कोई निर्गुण भक्त नहीं थे। उन्हीं की प्रेरणा से धनावंश जैसे सगुण पंथ की स्थापना हुई और धनावंश पंथ के एक हजार से अधिक ठाकुरजी के मंदिर तथा विभिन्न भक्तमालों तथा परची में उल्लिखित उनका जीवन श्री ठाकुरजी के साकार स्वरूप से प्रीति रखता है। वस्तुतः धना का भाव वैराग्य का है। सांसारिक मोह माया से विरत हुए बिना भगवद्भक्ति आसान नहीं है। धना त्याग को बहुत महत्त्व प्रदान करते हैं। प्रो. अनिल जैन भी धनाजी के पदों के अन्वेषक रहे हैं। वे उनके पदों के संबंध में अपने विचार व्यक्त करते हुए कहते हैं कि, "धना आत्मशुद्धि हेतु मन को स्थिर करने पर बल देते हैं। उनकी दृष्टि में चंदन, पूजा, पत्र, पुष्प आदि उपयोगी नहीं है। वे ईश्वर को बाह्याडंबर के बिना - 'जिनि पायो तिनि सहज सुभाई' प्राप्त करना चाहते हैं।" जैन साहब उन्हें अपने आलेख की अगली पंक्तियों में पूर्णतया निर्गुणवादी कवि साबित नहीं कर पाते हैं, तब वे पुनः कहते हैं कि, "धना के पदों से ऐसा आभास मिलता है कि अपने संत जीवन के पूर्ववर्ती दौर में वह सगुणोपासक थे, किंतु परवर्ती दौर में उनका रुझान निर्गुण भक्ति की ओर हुआ। यह भी संभव है कि भक्ति आंदोलन की विभिन्न धाराओं के बीच विचारधारात्मक द्वंद्व के मध्यनजर उनके बीच संतुलन स्थापित करने का यह एक समन्वयवादी प्रयास हो, यह एक अनुमान भर है, किंतु उसकी संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।" 2

 

धना वस्तुतः एक भक्त के लिए जो आवश्यक तत्त्व हैं, उन्हें अपनाने पर बल देते हैं। उनका उत्तरवर्ती जीवन निर्गुणी नहीं अत्यधिक सगुणी हो जाता है। वे धनावंशी पंथ धारणा ग्रहण करने वालों को जो इक्कीस सूत्र प्रदान करते हैं, वे सभी सगुण भक्ति की स्थापना करते हैं। भक्ति से सर्वथा दूर हो चुकी जाति को वे सगुण बोध से ही एक वैरागी पंथ की ओर आकर्षित कर सकते थे। हां, यह अवश्य कहा जा सकता है कि वे अपने से पूर्व हुए तथा समकालीन भक्तों से बहुत अधिक प्रभावित थे। नामदेव, कबीर, रैदास, सैन आदि की भक्तिमय बातें उन्हें लुभाती थीं।

 

भक्ति साहित्य पर उच्च कोटि का शोधपूर्ण कार्य करने वाले विद्वान ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल अपने ग्रंथ 'संत सप्तक' में कुछ बातों पर विशेष बल देते नजर आते हैं कि धना, कबीर, रैदास, सेन का समकालीन होते हुए भी उनसे आयु में छोटे थे B

 

इसलिए उन्होंने इनसे प्रेरणा प्राप्त कर भगवद्भक्ति की। दूसरे वे अनेक प्रमाणों द्वारा यह सिद्ध करते हैं कि धनाजी रामानंद के शिष्य थे। वे धना को रामानंद के अंतिम काल के शिष्य मानते हैं। एक बात उनके शोध में थोड़ी खामी प्रकट करती है, जो इस प्रकार है- "आज भी धनावंशी जाट रामानंद संप्रदाय से जुड़े हुए हैं। उनकी मान्यता है कि धना भगवान सीताराम का उपासक, रामानंद स्वामी का शिष्य तथा गृहस्थाश्रम में रहते हुए भी स्वामी कहलाता था। इसी कारण अब भी अनेक जाट अपने नाम के साथ स्वामी शब्द का प्रयोग करते हैं।" एक जगह ओर वे अपने 'संत धना जाट' नामक विस्तृत आलेख में लिखते हैं, "धनावंशी जाट भी स्वामी रामानंद को ही धना का गुरु मानते हैं।" श्री ब्रजेन्द्रसिंहल जी की इस धारणा के दुरुस्तीकरण में यह निवेदन किया जा सकता है कि संवत 1532 में धनाजी से दीक्षित होने के बाद एक भी धनावंशी स्वामी को जाट कहना उपयुक्त नहीं है। बेशक उनकी पूर्व जाति जाट थी, पर विगत पांच सौ वर्षों से धनावंशी एक नितांत वैष्णवी आचारों से युक्त वैरागी पंथ है। जैसे राजपूत कुल से परिवर्तित ओसवाल जाति को अब राजपूत नहीं कहा जा सकता, वैसे ही धनावंशी स्वामी के लिए जाट शब्द क्यूं प्रयोग में लिया जाए। दूसरी बात धनावंशी स्वामी कभी भी रामानंद संप्रदाय से जुड़े हुए नहीं रहे। धनावंश की ही भांति रामानंदियों का रामावत संप्रदाय अपने आप में स्वतंत्र है। वैष्णव वैरागियों के लगभग पच्चीस पंथ अस्तित्व में हैं और सभी अपनी स्वतंत्र पहचान रखते हैं।

 

धनाजी के थोड़े से पद एवं थोड़ी सी साखियों के बल पर उनकी समग्र भक्ति पहचान की उद्घोषणा करना समीचीन नहीं है।

 

धनाजी के पदों-साखियों में व्यक्त उनकी आध्यात्मिक धारणा इस प्रकार है-

धना के प्रथम पद में सांसारिक असारता और विरक्ति के भाव अभिव्यक्त हुए हैं। वहीं वे ईश्वर के प्रति गहरी श्रद्धा, समर्पण और अनुचिंतन पर बल देते हुए कहते हैं कि हे मेरे चित्त, तूं उस दीनदयाल का चिंतन कर, क्योंकि इस जीवात्मा का कोई सहायक है तो एकमात्र हरि ही है। खंड-ब्रह्मांड में एक वही ध्यान करने योग्य है, क्योंकि वह दीनदयाल ही कर्ता रूप में इसका नियंत्रण किए हुए हैं- वही नियंता है।

 

वह परमात्मा ही जीवों का निर्माता है, माता के गर्भ में जो जीव जल की बूंद के रूप में स्थित स्थापित होता है, उसे परमात्मा दसों द्वारवाला शरीर रूप प्रदान करता है, जठराग्नि की दाह से उसकी सुरक्षा करता है। वह ऐसा पिता है।

 

क्रौंच पक्षी अपने अंडे समुद्र के किनारे देती है, जहां न जल होता है और न ही कीचड़। पूर्ण ब्रह्म परमात्मा ही धात्री रूप धर उनकी रक्षा करते हैं। क्रौंच उन अंडों के पास तो नहीं जाती, पर उनका स्मरण वह निरंतर करती है। उस चिंतन के प्रभाववश उनमें पकाव आता है और क्रौंच शावकों का जन्म होता है।

 

कठोर पत्थरों के भीतर जीव होते हैं, जिन तक पहुंचने का कोई मार्ग नहीं होता, प्रभु उन तक भी भोजन सामग्री पहुंचाते हैं। उनकी समस्त व्यवस्था करते हैं। भक्त धना कह रहे हैं-फिर हे जीव, तू किस बात की फिक्र कर रहा है, हरि सबकुछ आपूरित करते हैं।

 

धना प्रारंभ से ही इसी भाव पर टिके हुए थे। सुदृढ़ विश्वास से ही उनके जीवन में सारे कार्य हुए, लोग भले ही उन्हें चमत्कार समझते रहें, पर धना को तो अपने गोपाल पर अटूट विश्वास था।

 

धनाजी का दूसरा पद आरती है। भगवान के निराजन की परंपरा प्राचीन रही है। लगभग सभी प्रमुख संतों ने आरतियों की रचना की है। 'गोपाल तेरा आरता' नाम से धनाजी की भी आरती है।

 

धनाजी महाराज आर्तभाव से गोपाल यानी ठाकुरजी से कहते हैं कि हे गोपाल, जो भी भक्त आर्तभाव से आपको भजता है, आप उसके समस्त कार्यों को अवश्य सिद्ध करते हैं।

 

धनाजी की भक्ति, सखा भाव की रही है। वे अपने ठाकुर से किसी भी प्रकार का दुराव नहीं रखते हैं, इसलिए निस्संकोच दैनंदिनी आवश्यकताओं को पूरा करने वाली सांसारिक चीजों को मांगते हैं। वे कहते हैं- संत सेवा के लिए दाल, सीधा, घी देते रहें, इससे हमारे मन को बड़ी प्रसन्नता प्राप्त होती है। हमारी आवश्यकताएं कितनी सी तो हैं, पैरों में कांटे न गडे, इसलिए पनहियां हो, सिर पर झोंपड़ा हो, मेहनत से कमाया हुआ सच्चा अनाज हो। किसान हूं इसलिए घर में ताजी-मोटी गाय-भैंस तो होनी ही चाहिए। सब की सेवा करने वाली गृहिणी सदैव भली-चंगी और स्वस्थ रहे। हे प्रभु, आपकी गति को कोई नहीं जानता। आप अपनी कृपा प्रदान कर जब हृदय में प्रकट हो जाते हैं, तो फिर कहीं नहीं जाते।

 

अगले पद में धनाजी महाराज कहते हैं कि इस संसार में जिस किसी का भी उद्धार हुआ है, वह भगवद्रस्मरण से ही संभव हुआ है। जो निरंतर भगवान (राम) का नाम स्मरण करता है, उसके दारुण, दुख भी जाते रहते हैं। कौन नहीं जानता कि भगवान का स्मरण कर उद्धव, नारद, अम्बरीक, प्रह्लाद, सुदामा जैसे भक्त तर गए। 

 

और तो और, महादेव शिव भी भगवान ही का सदैव ध्यान करते हैं। ब्रह्मा के मानस पुत्र सनकादिक ने भी नाम स्मरण के माध्यम से ही परमात्मा की प्राप्ति की। इन भक्तों के अनुसरण में ठाकुरजी का दास यह धना भी परमात्मा हरि का गुणगान करता है। गुरु की कृपावश अवश्य ही परम पद (मोक्ष) की प्राप्ति होगी।

 

एक अन्य पद में ईश्वर की रहस्यमयता को विश्लेषित करते हुए धनाजी महाराज कहते हैं कि वह योगीराज किसी अनंत गुफा में विराजित रहता है। मुझे उसे प्राप्त करने में सेवा का मार्ग ही उचित एवं श्रेष्ठ प्रतीत होता है। परमात्मा का भजन करने वाले योगी-संन्यासियों को खीर, खांड, घ्रित के साथ उत्तम भोजन कराकर यह सेवा का अवसर नहीं चूकना चाहिए। अपने गृह में सदैव साधु-संतों को न्यौतना चाहिए।

 

धनाजी कहते हैं कि यह शरीर और इस गृहवास का तो एक दिन निश्चित ही त्याग करना होगा। हमारा पुनः यहां आना नहीं होगा। इस संसार में आना-जाना तो बहुत बार हो चुका। इस नश्वर से क्या आस लगा रखी है। हे प्रभु, यह धना जाट तो तुझ में अनुरक्ति रखता है। बाकी तो इस संसार में प्राण चले जाते हैं और पीछे घर में रोना-धोना रहता है।

 

पांचवें पद में धनाजी आत्म तत्त्व को ही समझाते हुए इस बात पर बल देते हैं कि एक नाम स्मरण के अलावा उबरने का कोई रास्ता नहीं है, इसलिए मेरी जिह्वा, तू क्यों न हरि का स्मरण करे ? तू अभी तक गाफिल क्यों बैठा है, मौत तो तेरे एकदम समीप यानी सिरहाने बैठी है, उसे भूलकर क्यों आगे बढ़ रहा है? अपने व्यर्थ अहंकार का त्याग कर रात-दिवस नारायण का नाम जपना प्रारंभ क्यों नहीं करता। झूठ (असार एवं नश्वर संसार) का सहारा कब तक पकड़े रहेगा? क्यों नहीं सच को पकड़ लेता है? थोड़ा-सा पलट कर अपने दोषों पर दृष्टिपात क्यों नहीं करता है।

 

वे फिर कहते हैं, हे प्राणी! उस पुरुषोत्तम का नाम स्मरण कर, दूसरे विषयों को अपने मन से दूर हटा। अरे, एक-एक पैर पर काल के मारे हुए लोग तुम्हें नजर क्यों नहीं आ रहे हैं? अपने दोषों का परिहार कर तथा चित्त में सच्चाई का वरण कर, चेत कर और इस जगत के नियंता धरणीधर का ध्यान कर। हे धना, तुम्हें उबारने का कार्य केवल धरणीधर ही करेंगे।

 

धनाजी भगवद्स्मरण पर अत्यधिक जोर देते हैं। उनके छठे पद के भी लगभग यही भाव हैं। वे कहते हैं, हे प्राणी! हरि के गुणानुवाद में लग। तू सब प्रकार की चतुराई छोड़कर एकमात्र इसी कार्य में लग जाओ। वह परमात्मा न गंगाजल से बार-बार स्नान कराने से रीझता है और न ही पीतांबर ओढाने से शोभायमान होता है। यानी ठाकुरजी की प्रतिमा का केवल श्रृंगार कर देना भर पर्याप्त नहीं है। हम जिन ठाकुरजी के विग्रह के चंदन लेपन करते हैं, वह ठाकुर तो अनुपम सुवासित है। हम जिन्हें अगर चंदन का धूप खेते हैं. उनके लिए यह ध्यान करना आवश्यक है कि वह किस सुगंध से राजी होता है ? हम जिन्हें नाना प्रकार से पत्र और पुष्प चढ़ाते हैं, उसके रखे इस संसार की अठारह लाख प्रकार की वनस्पतियां उस जगत नियंता की रोमावलियां हैं। वह किस प्रकार की सेवा-पूजा और भक्ति से प्रसन्न होता है ? इस पर धनाजी कहते हैं कि जैसी भक्ति सनकादिकों ने और शुकदेव मुनि ने की है, वैसी ही करने का अभीष्ट रहना चाहिए अर्थात उनके जैसे वीतरागी बनो। वह सृष्टि नियंता किस नृत्य से राजी हो सकता है, जिसके आगे नारद और शिव नृत्य करते हैं और अप्सराएं सुगान करती हैं। हे गोपाल, तुम्हारी महिमा का गान संभव नहीं है। मैं तो तुम्हारे गुणों को गाना ही नहीं जानता। जिसकी गति को जाना नहीं जा सके, जिसको जान लेना सुगम नहीं है। कोई उसके गुणों को गाकर भी कितना सा गा लेगा ? भक्त धनाजी कहते हैं कि परमार्थ से बड़ा कोई सत्कार्य नहीं है और उस परमात्मा को सहज भाव से ही अर्थात पाखंड रहित होकर ही प्राप्त किया जा सकता है।

 

सातवें पद का भाव इस प्रकार है- हे प्राणी, तुम इस संसार में न जाने कितने जन्मों से भ्रमित होकर फिर रहे हो। अभी तक तुम्हारे तन-मन में धैर्य का आविर्भाव नहीं हुआ है। लालच के वशीभूत होकर विषयों में इस कदर खो चुके हो कि परमात्मा रूपी हीरे को ही बिसरा दिया है। विषय रूपी फल बड़े मीठे प्रतीत होते हैं, क्योंकि भीतर में चेतना का अभाव है। वस्तुओं एवं व्यक्तियों में ऐसी आसक्ति बढ़ा ली कि निरंतर जन्म-मरण के फेरे में पड़े हुए हो। भीतर निवास करने वाले परमेश्वर को पाने की युक्ति नहीं जानी। ब्रह्मपरायण नहीं हुए। परमात्मा के आश्रय हुए बिना, विषयों की ज्वाला में जलते और यम के फंदे में फसते रहोगे। विषयासक्ति जब मन में भर जाती है तो परम प्रभु स्वतः ही विसर जाते हैं। मोह ज्वाला में भस्म हो रहे को गुरुजी ने ज्ञानरूपी धन प्रदान किया, उस ज्ञान के फलस्वरूप अब ध्यान और मन एक हो गया है अर्थात मन की चंचलता समाप्त होकर वह एकात्म भाव में स्थित हो गया है। महापुरुषों का संग दुर्लभ है, उनसे ही प्रेम और भक्ति का मर्म जाना। जो मन अब तक अतृप्त था वह संत संगति से तृप्त हुआ। सत्य स्वरूप, नित्य सिद्ध से साक्षात्कार हुआ। सत्य ही चैतन्य स्वरूप है और वहीं आनंद रूप है। उससे साक्षात्कार का तात्पर्य चैतन्य का चैतन्य में विलय हुआ यानी ज्योति में ज्योति समा गई। सच्चिदानंद परब्रह्म से पहचान हुई। धनाजी कहते हैं कि संतकृपा से इस धना ने धरणीधर रूपी धन प्राप्त किया ओर सदा के लिए धन्य हो गया।

 

धनाजी के इस आठवें पद के संबंध में यह संशय किया जाता है कि यह धनाजी द्वारा रचित नहीं है, जबकि गुरुग्रंथ में शामिल इस पद की व्याख्या इस प्रकार है- निरंतर गोविंद का गुणगान करने वाला नामदेव जाति का छींपा था लेकिन परमात्म प्रेम के कारण वह बहुमूल्य हो गया अर्थात भगवद्भक्ति करने वाला मूल्यवान हो जाता है। इसी प्रकार धागों को तानने और बुनने वाला जुलाहा कबीर ईश्वर प्रेम के कारण बेहद गुणवान भक्तों में परिगणित किया गया। मृत पशुओं को ढोने वाली चमार जाति के रविदास ने माया का परित्याग कर, साधुओं का संग किया और फलस्वरूप परमात्मा से साक्षात्कार किया। घर-घर जाकर लोगों की सुंवार करने वाले सेन नाई के लिए स्वयं परमात्मा ने उसका कार्य किया, किंतु उसके हृदय में प्रभु का सच्चा वास होने के कारण उसकी गिनती उच्च कोटि के भक्तों में हुई। उपरोक्त सभी श्रेष्ठ भक्तों के चरित्र सुनकर जाट जाति में उत्पन्न धना भक्ति अधीन हो गया और भाग्यशाली धना को भगवान साक्षात प्राप्त हुए।

 

'राग रत्नाकर' में प्राप्त नौवां पद उपरोक्त पद से काफी समानता रखता है, पर गुरुग्रंथ साहब का पद पंजाबी भाषा का प्रभाव लिए हुए है, जबकि यह पद पंजाबी प्रभाव से मुक्त है, इसलिए यह कहा जा सकता है कि यह पद धनाजी द्वारा रचित है तथा अपनी मूल भाषा में है।

 

धनाजी की साखियां

यहां हम धनाजी की सात साखियां दे रहे हैं। साखिया उस काल में लगभग सभी भक्तों ने रची थी, किंतु सभी भक्त कवियों की साखियां 'अंगों' में तथा पर्याप्त संख्या में प्राप्त होती हैं, जबकि धनाजी रचित साखियों की संख्या बहुत कम है। धनाजी ने इतनी कम संख्या में साखियां रची होगी, इसमें संशय होता है। धनाजी के अनुयायियों का यह कर्तव्य बनता था कि वे उनके भक्ति साहित्य की संरक्षा करते, पर कहीं न कहीं पंथ की घोर अवहेलना रही।

 

धनाजी की प्रस्तुत साखियां नीतिपरक तात्विक ज्ञान लिए हुए हैं।

 

अपनी प्रथम साखी में धनाजी कहते हैं कि भले ही कोई पंडित आनुष्ठानिक कार्यों में कितना ही दक्ष हो जाए, धर्म की वह कितनी ही व्याख्याएं करे, किंतु जब तक आत्यंतिक हरि भाव मन में नहीं है, तब तक उसका ज्ञान शुष्क ही है। हरि भक्ति का प्रभाव हो तो बिना बाहे ही अन्न निपज सकता है। यह किसी परमात्मा पर गहरी निष्ठा रखने वाले किसी किसान से पूछो। स्वयं धना के खेत में बिन बाहे ही अन्न पैदा हुआ था। संभवतः उनका इशारा इसी ओर है।

 

अपनी दसरी साखी में धनाजी कहते हैं कि व्यक्ति को धन माया के प्रति अधिक उन्माद नहीं रखना चाहिए तथा न ही मरण धर्मा संसार में अत्यधिक आसक्ति ही रखनी उत्तम है। धन और मोह ठीक वैसे ही हैं जैसे पैरों में बेडी और गले में रम्मी का फंदा। धन और मोह दोनों ही काम नहीं आता, प्रत्युत कर्मबंधन ही हुआ। इसलिए असार बातों को समझना आवश्यक है।

 

तीसरी साखी में धनाजी कहते हैं कि वे नर धिक्कार के अधिकारी हैं, जो संयोगवश तथा किसी दूसरे के सहयोग से आए धन को लेकर अभिमान करते हैं। धन की गति तो किसी पेड़ के पत्तों की नांई है। पेड़ के पत्ते लगते हैं और एक दिन झड़कर न जाने कहां उड़ जाते हैं। ऐसे ही धन अधिक टिकता नहीं।

 

चौथी साखी भी धन के वास्तविक महत्त्व को व्याख्यायित करने वाली है। यहां धनाजी कहते हैं कि जैसे हम कुएं का पानी अधिक दिन संचित नहीं कर बांट देते हैं, वैसे ही धन को सद्कर्म में खर्च कर देना चाहिए। व्यर्थ संग्रह किया धन कलह को उत्पन्न करता है। सापुरुष यानी उत्तम व्यक्ति अपने कठोर परिश्रम से उत्पन्न धन में सभी का भाग (सीर) मानते हैं।

 

पांचवीं साखी में धनाजी उस व्यक्ति को धनवान बताते हैं जो दूसरों के दुख को दूर करने का यत्न करे। एक संत ही ऐसे होते हैं जो दूसरों के दुख को अपना दुख समझते हैं। संत संसार में रचे-बसे प्राणी को उसकी निस्सारता से परिचित कराते हैं तथा स्वयं की चित्तजड़ ग्रंथी काटने का कार्य करते हैं। ऐसा करने में उन्हें तनिक भी दुख नहीं होता।

 

धनाजी अपनी अगली साखी में कहते हैं कि वास्तविक अर्थों में वही लोग धनाढ्य हैं जिनकी प्रीति परम पिता परमेश्वर अर्थात धरणीधर में है। ऐसे प्रभु भक्त आठ पहर चौबीस घड़ी परमात्मा का भजन करते हैं, एक क्षण के लिए भी उन्हें विस्मृत नहीं करते। उनके अवयव अर्थात जीभ, हृदय, मन और चिंतन प्रभु में लगे रहते हैं।

 

सातवीं साखी में धनाजी कहते हैं- वे परम दयालु, संसार के नियंता धरणीधर आकाश, पाताल और धरती सब जगह व्यापक हैं। ऐसे घट-घटवासी परमात्मा को हमेशा अपने स्मरण में बसाए रखने वाले साधुजन वास्तविक धनी हैं। ऐसे संत परमात्मा का कभी विस्मरण नहीं होने देते। 

उपरोक्त अधिकांश साखियां एक ही 'अंग' की साखियां है जो धन, द्रव्य, वैभव की क्षणिकता को प्रतिपादित करती हैं। निश्चय ही भक्तप्रवर धना ने अन्य अनेक आध्यात्मिक विषयों पर भी साखियों की रचना की होगी।

 

भले ही अब तक धनाजी के भक्तिमय पदों की अधिक खोज नहीं हो पाई है, पर उनके उपलब्ध पद उनकी आध्यात्मिक अभिव्यक्ति की परिपक्वता को प्रकट करते हैं। डॉ. दिनेश चन्द्र शुक्ल का मत है कि, "एक दृष्टिकोण से राजस्थान के धार्मिक जीवन को नया मोड़ देने में प्रथम योगदान धना का ही है।" वे उनके आध्यात्मिक दर्शन के संबंध में कहते हैं कि, "वे ईश्वर को अगम अगोचर, अनिर्वचनीय, सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान और सर्वकर्ता मानते थे। उनका दृढ़ विश्वास था कि उस अपरंपार महिमा वाले 'राम' को तो वही जान सकता है, जिसका सहज सरल स्वभाव है।" धनाजी के वैराग्य भाव पर उनका कथन है कि, "धना आत्मोद्धार हेतु भक्ति साधना के लिए गृहस्थ जीवन का त्याग करने के पक्ष में नहीं थे।" लेखक को इस बात का ध्यान नहीं है कि अपने जीवन के उत्तरार्द्ध में उन्होंने गृह त्याग कर दिया था और वे मोहिलवाटी के गांवों में आ गए थे, किंतु उन्होंने यह गृहत्याग गुरु आज्ञा से किया था।

 

संत साहित्य के अध्येता ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल का मत रहा है कि, "प्रायः सभी विद्वानों ने संत धना के बारे में कोई गंभीर छानबीन नहीं की है। बस, पूर्व लेखक का परवर्ती लेखक ने अंधानुकरण किया है।"" लेखक का यह मत सही प्रतीत हो रहा है। रामानंद स्वामी के अन्य भक्त शिष्यों पर जितना अनुसंधानपरक कार्य हुआ, उतना धनाजी पर नहीं हुआ। धनाजी के पदों पर अपनी राय देते हुए वे लिखते हैं कि धना के केवल एक पद के आधार पर उन्हें निर्गुणवादी धारा का कवि ठहराना ठीक नहीं है, उनके शेष पदों में निर्गुण-सगुण दोनों धाराओं के दर्शन होते हैं।

 

वस्तुतः धनाजी अपने पूर्ववर्ती भक्तों में नामदेव से काफी प्रभावित नजर आते हैं, वे उनका उल्लेख भी करते हैं। नामदेव कहते भी थे, "सब गोविंद है, सब गोविंद है।" धनाजी उनकी इन पंक्तियों का एक पद में उल्लेख भी करते हैं। नामदेव के एक पद की पंक्तियां दृष्टव्य हैं-

 

कहत नामदेव हरि की रचना देखहुं रिदै बिचारी। 

घट घट अन्तरि सरब निरंतरि केवल एक मुरारी ।। *

नामदेव का सर्वात्म गोविंद, धना को भी प्रिय है। वैसे भी हर संत की अपनी मौलिक दृष्टि रहनी चाहिए। धनाजी ने भी परमात्मा के विषय में अपने मौलिक दृष्टिकोण को प्रश्रय दिया। इस संबंध में उनके गुरु रामानंदजी का कोई आग्रह नहीं रहा। "वस्तुतः रामानंद समन्वयी चेतना के महानायक थे। उनके शिष्यों ने संपूर्ण भारत में समतामूलक समाज की संरचना में योगदान किया।

संत धनाजी की भक्ति ही उनका वास्तविक परिचय है। संत और भक्त अनीतिपरायण मनुष्य की कुबुद्धि को सुबुद्धि में परिवर्तित करने का कार्य करते हैं और धनाजी ने अपने संपूर्ण जीवन में यही किया। ऐसे महापुरुष ने धनावंश का प्रणयन कर वैराग्य पंथ को नव संदेश प्रदान किया। संत पुरुष का काम ही जीव का मंगल करना होता है।

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