भक्त श्री धनाजी एवं धनावंश
अध्याय : अष्टम उपसंहार
धनावंश के पंथ प्रवर्तक श्री धनाजी महाराज राजस्थान में भक्ति चेतना के अनूठे पर्याय थे। अपने विलक्षण व्यक्तित्व के बल पर उन्होंने मध्ययुगीन आध्यात्मिक क्रांतिचेता श्री रामानंदाचार्य को अत्यधिक प्रभावित किया। अपने गुरु के प्रति श्रद्धा, निष्ठा और समर्पण का आधार बना धनावंश संप्रदाय। अगर धनाजी रामानंदजी का शिष्यत्व ग्रहण करने न जाते तो धनावंश संप्रदाय कभी अस्तित्व में नहीं आता। उन्होंने ही धनाजी को संप्रदाय संस्थापन के लिए प्रेरित किया और आज लगभग साढ़े पांच सौ वर्षों से यह संप्रदाय अपने स्वरूप में विद्यमान है। धनावंश संप्रदाय को इसकी स्थापना काल से ही राजाओं-जागीरदारों से मान-प्रतिष्ठा तथा सम्मान अनेक रूपों में प्राप्त हुआ। ठाकुरजी प्रित्यार्थ धनावंशी स्वामियों को बेगार प्रथा से मुक्त रखा गया।
जिस जाट जाति से नव संप्रदाय के रूप में धनावंश का जन्म हुआ, उसे अपनी पूर्व जाति से भी भरपूर सम्मान तथा प्रशंसा और उच्चता प्राप्त हुई।
हां, यह कहा जा सकता है कि जिस धनावंश का जन्म धार्मिक आध्यात्मिक चेतना को नव उत्कर्ष देने के लिए हुआ था, वह काल के प्रवाह में अपना प्राचीन वैभव खोता जा रहा है।
भारतीय समुदाय में न जाने कितने संप्रदाय हैं और न जाने कितनी उनकी परंपराएं हैं। कितनी परंपराएं अपने पुरा वैभव और मर्यादाओं को अक्षुण्ण रखे हुए हैं, यह शोध खोज का विषय है, किंतु हमें अन्य समुदायों पर दृष्टिपात करने की बजाय, अपने समाज संप्रदाय पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। संप्रदायों को अपने नियमों, संहिताओं का पालन करना होता है। स्वानुशासनपूर्वक उनका पालन होता है, कोई बाध्यता नहीं होती। फिर भी विवेकी समुदाय अपनी पंथीय गरिमा और मर्यादाओं को गिरने नहीं देते। समय-समय पर उसे और अधिक उच्चता प्रदान करने का काम किया जाता है। सांगठनिक आधार खड़े किए जाते हैं। अपने धर्म-संप्रदाय की सुरक्षा-संरक्षा के निमित्त लोग तन-मन-धन से योगदान करने में जरा भी हिचकते नहीं हैं। हम गौर से देखें तो पता चलेगा कि आजकल जातीय तथा सांप्रदायिक सम्मेलनों में पहले की बनिस्बत उपस्थिति बढ़ने लगी है। सब जानते हैं कि अपना समाज हमेशा अपनों को अपनत्व और संरक्षा देने का कार्य करता है, किंतु धनावंश के साथ उलटा हो रहा है। यहां विगत वर्षों में समाज के मध्य शैथिल्य अधिक प्रसरित हुआ है। धार्मिकता के मामले में तो और अधिक। स्थिति सामाजिक उत्थान की भी संतुष्टिदायक नहीं कही जा सकती। जो समाज धार्मिक रूप से उन्नति करता है, उसकी सर्वतोन्मुखी उन्नति भगवान करते हैं। पूर्व काल में धनावंशी साधों की ईश्वरीय अनुरक्ति देखकर ही उन्हें शासकीय समर्थन प्राप्त हुआ।
हमें अब धनाजी महाराज की साक्षी में समाज को नवीन उत्थान प्रदान करने के लिए सभी प्रकार के प्रयास करने हैं। हमारे महंतों ने अपनी धार्मिक सिद्धियों तथा आचरण के कारण ही तत्कालीन राजा-महाराजाओं को प्रभावित किया था। अब यह वर्ग अनेक विसंगतियों का शिकार होकर अपने अस्तित्व को खोने खोने में है। इस परंपरा को समाज के बौद्धिक जनों को पुनर्व्याख्यायित करना होगा। वैषम्य को समझना होगा।
परंपराएं और संस्कार खंडित होते रहते हैं। युगीन नव परिवेश में नए ढंग से उनका परीक्षण किया जाता है। टूट-फूट होने पर हम मकान की भी तो मरम्मत कराते ही हैं। उसके संपूर्ण गिर जाने की प्रतीक्षा थोड़ी ही करते हैं।
वही समाज धार्मिक-आध्यात्मिक सामाजिक-सांस्कृतिक उत्थान कर सकता है जहां के विद्वतजन तथा आचार्य अपने समुदाय के साथ नैरंतर्य में संवाद कायम रखते हैं। प्रबोधन का कार्य कभी भी धीमा नहीं पड़ना चाहिए। धनावंश वैराग्य की नींव पर खड़ा हुआ संप्रदाय है, वैष्णवता इसका बाना है। इसलिए इसके आंतरिक मूल्य सदैव जीवित रहेंगे, तभी यह संप्रदाय की गरिमा रख पाएगा।
धनावंश का यह इतिहास ग्रंथ अपनी सीमाओं में इस पंथ के नैष्ठिक आचरणों को भी बताता चलता है। इतिहास, भविष्य को दिशा प्रदान करने का काम करता है। जाने-अनजाने में संप्रदाय के भीतर जो कुछ ध्वस्त हुआ है, उसकी मरम्मत, पुनर्निर्माण और जीर्णोद्धार की जिम्मेदारी किसी अन्य की नहीं है। कोई भी जीवंत समुदाय ठान ले तो असंभव कुछ नहीं होता, आवश्यकता उठ खड़े होने की है।
इस उठने में हमारे पंथ प्रवर्तक और संपूर्ण भारतवर्ष के भक्ति परिदृश्य में सुपूजित धनाजी महाराज अपने सूक्ष्मांश से हमारी मदद अवश्य करेंगे।
जय ठाकुरजी की।
------------xxx-----------
परिशिष्ट-1
प्रभुनाथ द्विवेदी रचित 'श्रीरामानन्द सतसई' में धनाजी वर्णन
राजपूताने टाँक मुँह धुवन गाँउ धनि धाम।
परमभागवत जाट एक धन्ना ताको नाम ।।399 ।।
प्रभु प्रसन्न इक बार तेहि सनमुख दरसन दीन्ह।
किरपा करि उपदेसेऊ अधिकारी तेहि चीन्ह ।।400 ।।
धन्ना कासी जाहु तुम्ह सिरिमठ पहुँचहु धाइ ।
धरनि अवतरेउ रामजी सिरिमठ रहेउ बसाइ ।।401 ।।
सिरिमद्रामानन्द तेहि एहि जनम करि नाउँ।
मम बिभूति तेहि तन लसै औरु न दूजो ठाउँ ।।402 11
करम बचन मन जाइ तुम्ह सेवहु सहित सनेह।
पुन्य मोच्छ तुम्ह पाइहौ छुटि जइहै भवदेह ।।403 11
निज जोगज सामर्थ्य ते स्वामिबर्ज सबु जान।
नित चितवत कब आइहै धन्ना जाट सुजान ।।404 11
धन्ना आयउ हरषजुत कासी राम दुआरि।
मिलेउ अनन्तानन्द सों स्वामी कहत बिचारि ।।405 ।।
धन्ना सरल सुभाउ जन पठयउ सिरी भगवान।
शिष्य करउँ संस्कार जुत प्रभु कौ बचन प्रमान ।। 406 ।।
दीच्छा देह बनाइ सिष भेजेउँ धुवन बहोरि।
भेंटेउ भरि अंकवारि प्रभु उमरी प्रीति न थोरि ।। 407 11
परिशिष्ट-2 श्री धनाजी का लोक पद
सांवरा म्हे तो कोनी थारै सारै ।। टेर ।।
थारै कहीजै राधा रुखमण, कुबजा नार तुम्हारै।
थारी बराबरी म्हे करां, ओक जबर जाटणी म्हारै ।।
थारै कहीजै म्हैल माळिया, अजब झरोखा थारै।
थारी बरोबरी म्हे करां, ओक छांन-झूपड़ी म्हारैरे ।।
थारै कहीजै हाथी घोड़ा, घूमै राज दुवारै।
थारी बरोबरी म्हे करां, भूरी भैंस छै म्हारै ।।
थारै कहीजै तुलछां रो बिड़लो, देव परकमा थारै।
थारी बरोबरी म्हे करां, मोटो खेजड़ो म्हारै ।।
धनै भगत री भगती पूरबली, जिणरा खेत निपजावै।
गिरधर कीं रा कारज सारै, नांव लियां हर तारै ।।
परिशिष्ट-3 राग मलार
प्रभु के ऊंच नीच नहिं कोई। प्रेम भक्तिकर जो जन ध्यावे, उत्तम कहिये सोई ।।
कुलवंता राजा दुर्योधन तिस गृह पग न धास्यो ।
जाय विदुर के भाजी अरपी जाति न जन्म विचास्यो ।।
ब्राह्मण एक करत नित पूजा ताको भोग न लीना।
धन्ने जाट के शोच न कोई होय प्रगट दुध पीना ।।
ऊंचे जन्म कर्म के तपसी ना किसे मंदिर धावे।
महा कुचील भील दे कर ते ले जूठे फल खावे ।।
जाय पड़े सब आगे बैठे ना किसे देत दिखाई।
नामदेव को देहरा फेश्यो लीनो कंठ लगाई।।
पारब्रह्म पूरण अबिनाशी सब घट की मति जानै।
दुनीदास प्रभु भक्तवछल है कपट हेतु नहिं मानै ।।
(राग रत्नाकर, पद सं. 518, पृष्ठ-153)
परिशिष्ट-4 मीरां कृत नरसीजी रो माहेरो
मीरां कृत माहेरा के एक पद में धनाजी महाराज का उल्लेख आया है। पद इस प्रकार है-
एजी म्हारां नटवर नागरिया, भगतां रे क्यों नहीं आयो रे।। टेर ।।
धना भगत की भगति पुरबली, जिनको खेत निपायो रे।
बीज लेर साधां नै बांट्यो, बिना बीज निपजायो रे।। 1।।
नामदेव थारो नानो लागै, ज्यांरो छप्पर छायो रे।
मार मंडासो छावण लागो, लिछमी बंध खिंचायो रे।। 2।।
सैन भगत थारो सुसरो लागै, ज्यांरो कारज साख्यो रे।
बगल रछानी नाई बणग्यो, नृप को सीस संवाख्यो रे।।3 ।।
फरसो के थारै फूंफो लागै, ज्यांरो पेड़ो पूठ्यो रे।
बिना बुलायो आपै आयो, रात्यूं लकड़ कूट्यो रे।।4।।
कबीर कांई थारै काको लागै, ज्यां घर बाळद ल्यायो रे।
खांड खोपरा गिरी छुहारा, आप लदावन आयो रे ।।5 ।।
भीलणी कांई थारी भूआ लागै, जिण रो जूठण खायो रे।
ऊंच नीच की संक न मानी, रुच रुच भोग लगायो रे।। 6 ।1
करमा कांई थारी काकी लागै, जिण रो खीचड़ खायो रे।
धाबळियै रो पड़दो करती, रुच रुच भोग लगायो रे।। 7।।
मीरां के थारी मासी लागै, जिण रो विषड़ो जास्यो रे।
राणै विष रा प्याला भेज्या, विष अमृत कर डास्यो रे।। ৪।।
बाल भोग को भूखो बाला, खोस खा गयो बोर रे।
नानी बाई रो माहेरो भरतां, तन्नै लागै जोर रे।। 9।।
जीमण को जिमणारो बाला, फिर फिर सारया काम रे।
नानी बाई को माहेरो भरतां, घर सूं लागै दाम रे ।।10।।
कहै नरसीलो सुण सांवरिया, आणो है तो आवो रे।
ब्याही सगां में भेंडा लागां, यूं कांई लाज गमावो रे।। 11।।
(सं. जेठालाल नारायण त्रिवेदी)
