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भक्त श्री धनाजी एवं धनावंश

अध्याय : षष्ठ - धनावंश और पंच संस्कार

 

वैष्णव धर्म अत्यधिक प्राचीन है। वैष्णव ग्रंथों में प्राप्त होता है कि सर्व प्रथम भगवान नारायण ने ब्रह्माजी और शंकर भगवान को पंच संस्कारों से युक्त वैष्णवी दीक्षा प्रदान की। वैष्णवता के अपने संस्कार तथा नियम हैं। हरेक संपदाय के अपने कुछ नियम-लक्षण हुआ करते हैं। पुराणों में वैष्णव संस्कारों के संबंध में वर्णन हैं-

 

ये कण्ठ लग्न तुलसी नलिनाक्ष माला ये बाहूमूल परि चिह्नित शंख चक्राः ।

ये वा ललाट फलके लसद् ऊर्ध्वपुण्ड्रास्ते, वैष्णवाः भुवनमाशु पवित्र यन्ति ।।

 

वैष्णवी दीक्षा प्राप्त व्यक्ति भगवद् प्राप्ति कराने में पूर्ण सक्षम होता है, पर वह अध्यात्मवेत्ता होना चाहिए। जो अध्यात्मवेत्ता नहीं है, वह अपने धर्म का शुद्ध फल नहीं भोग सकता।

 

वैष्णव जन को ललाट पर टीका के रूप में ऊर्ध्वपुण्ड्र लगाना चाहिए। कंठ में तुलसी की माला धारण करे। भगवद् आराधना पंच संस्कार युक्त होकर करने का विधान है।

 

निम्न हैं पंच संस्कार :

(1) तप्त छाप : तप्त छाप को तप्त मुद्रा भी कहा जाता है। ये छाप पांच प्रकार की होती हैं। इन्हें भगवान विष्णु का प्रतीक माना जाता है। धनुष, बाण, नाम, चन्द्रिका तथा मुद्रिका नाम की ये छाप, बांयी भुजा पर धनुष, दाहिनी भुजा पर बाण, वक्षस्थल (छाती) पर श्री सीतारामजी का नाम तथा मुद्रिका तथा ललाट पर चन्द्रिका। ये पांचों मुद्रिकाएं शब्द, रूप, रस, स्पर्श, गंध नामक पांच तन्मात्राओं से साधक की रक्षा करती है।

 

रामानंदजी से दीक्षित होने के बाद धनाजी महाराज ने स्वयं पंच संस्कारों का आजीवन निर्वहन किया। प्राचीन समय से धनावंश में तप्त मुद्रा लेने का धार्मिक चलन रहा है। समझदार होने पर धार्मिक युवा भागकर द्वारिका चले जाया करते थे और तप्त मुद्रा लिया करते थे। मुद्राएं तप्त एवं शीतल दोनों प्रकार की होती हैं। धनावंश में कथन प्रचलित है- 'जो धरणीधर की झेलेलो, बो तीन लोक में खेलेलो।' इसका तात्पर्य ही यही है कि तप्त छाप लेने वाला निर्भय हो जाता है।

 

पद्म पुराण में शंक, चक्र की मुद्रा लेने का भी उल्लेख है। जो वैष्णव तप्त मुद्रा धारण करता है उसकी इक्कीस पीढ़ियां मुक्त हो जाती हैं।

 

(2) तिलक : उपासना के अनेक अंगों में पुण्ड को भी आवश्यक माना गया है। पुण्ड्र तिलक का ही नामांतर है।

 

ललाट मध्ये तिलकमूर्ध्वरूपं समाहितः । 

यः कुर्यान्मन्त्रसंयुक्तमूर्ध्वपुण्ड्रमिति स्मृतम् ।।

 

ऊर्ध्वपुण्ड्र वैष्णवों की पहचान है। ऊर्ध्वपुण्ड्रों के आकार की संख्या बीस है तथा चंदन, केसर, कुमकुम, कस्तूरी आदि सुगंधित द्रव्यों से तथा श्याम, पीत, श्वेत, रक्तवर्णी मृतिका से भी ऊर्ध्वपुण्ड्र लगाया जाता है। धनावंशी वैरागी गोपीचंदन से ऊर्ध्वपुण्ड्र करते हैं तथा यह परंपरा प्राचीन है।

 

शरीर पर वैष्णव 12 स्थलों पर तिलक करते हैं, यथा- (1) ललाट (2) उदर (3) वक्षःस्थल (4) कण्ठ (5) दक्षिण पार्श्व पर (6) दक्षिण हस्त पर (7) दक्षिण स्कंध पर (8) वाम पार्श्व पर (9) वाम हस्त पर (10) वाम स्कंध पर (11) कटि पर (12) कान पर।

 

ऊर्ध्वपुण्ड्र तिलक को भगवान का चरणचिह्न समझ कर हम अपने ललाट पर धारण करते हैं। राम भक्ति करने वाले चित्रकूट की रामरज तथा श्रीकृष्ण भक्त गोपीचंदन का तिलक धारण करते हैं।

 

(3) नामकरण : वैष्णव का नाम 'दासान्त' होना चाहिए। कोई वैष्णवी दीक्षा ग्रहण करता है तो उसे गुरुजी नव नाम प्रदान करते हैं। गृहस्थ के लिए नव नाम तो आवश्यक नहीं है किंतु बालक के नामकरण में दासान्त संज्ञा अवश्य हो।

 

(4) माला अथवा कंठी तुलसी की माला का वैष्णवों में बड़ा ही महत्त्व

 

है। जो व्यक्ति अपने गले में तुलसी की कंठी बांधता है, वह भगवान से अनन्यता स्थापित करता है। गुरु भी जब शिष्य बनाता है तो सबसे पहले उसके गले में तुलसी मनकों की कंठी बांधता है। इसके अलावा 108 मनकों की तुलसी माला भगवन्न नाम स्मरण के लिए वैष्णवों के पास रहती है।

 

(5) मंत्र धारण : मंत्र में बड़ी भारी शक्ति रहती है। गुरु द्वारा प्रदत्त मंत्र में भगवान के समान ही श्रद्धा रहनी चाहिए। शिष्य के लिए वह मंत्र तारक है। सांप्रदायिक मंत्र का निरंतर जाप रहना चाहिए। उपरोक्त पांच वैष्णव संस्कार से संपन्न वैष्णव भगवान का अति प्रिय होता है। पंच संस्कार धारित वैष्णव की साधना अधिक फलवती होती है।

 

ऊर्ध्वपण्ड के प्रकार: ऊध्वपुण्ड्र तिलक अनेक प्रकार के प्रचलित रहे हैं।

 

रामानुज संप्रदाय में अंग्रेजी के आकार मध्य रक्तवर्णी तिलक रहता है. जबकि रामानंद संप्रदाय में रामानंदजी का तिलक में सिंहासन सहित श्वेत ऊर्ध्वपूण्ड तथा मध्य में पत्राकार पतला लाल तिलक। गलता गददी में तिलक में सिंहासन नहीं था, रैवासा गददी के तिलक में बाकी तो गलता गद्दी की भांति है, पर तिलक के दोनों ओर पीत चंद्रिका होती है। इस प्रकार अनेक तिलक प्रचलित हुए, पर धनावंशी ऊर्ध्वपुण्ड्र में बिना सिंहासन 'वी' आकार का तिलक तथा मध्य में भी गोपीचंदन अथवा रामरज का तिलक रहता है।

 

आचार्य निष्ठा : सद्‌गुरु पंच संस्कारों की महत्ता व्याख्यायित करते हैं। इसलिए

 

पंथ में आचार्य गुरु का अत्यधिक महत्त्व है। जो सामान्य पंथी, भक्ति, ज्ञान, वैराग्य की साधना से रहित हैं, जिनके हृदय में भक्ति भाव जाग्रत नहीं है, ऐसे जन को आचार्य बोध प्रदान करते हैं। आचार्य के प्रति पंथ संप्रदाय में गहन निष्ठा रहनी चाहिए। संप्रदाय का अर्थ होता है- गुरुचरणों में श्रद्धा, गुरुभाइयों में परस्पर प्रीति, गुरुआज्ञा का प्राणपन से पालन और पंथ के प्रति गहन समर्पण का भाव।

 

चरणचिह्न का ध्यान : नाभादासजी ने वैष्णव जन को सदैव रामजी के चरणचिह्नों का ध्यान लगाने का निर्देश भक्तमाल में किया है-

 

अंकुस, अम्बर, कुलिस, कमल, जव धुजा धेनुपद ।

संख, चक्र, स्वस्तिक, जंबूफल, कलस, सुधाहृद ।। 

अर्धचन्द्र, षटकोन, मीन, बिंदु, ऊरधरेखा। 

अष्टकोन, त्रयकोन, इन्दु धनु, पुरष विशेषा ।।

सीतापति पद नित बसत एते मंगलदायका ।

चरन चिह्न रघुबीर के संतन सदा सहायका ।। 6 ।।

 

भगवान राम के चरणों में उपरोक्त बाईस चिह्न विराजते हैं, जो साधक के ध्यान हेतु अति उत्तम हैं।

 

धनावंश में कंठीमाला, चरणामृत, तुलसी ग्रहण, प्रदक्षिणा, एकादशी व्रत, जन्माष्टमी, रामनवमी, राधाष्टमी का विशेष महत्त्व है।

 

धनावंश के तीर्थस्थल : धुआं कलां - धनाजी महाराज का मुख्य स्थल, जहां उन्होंने भगवद् साक्षात्कार किया तथा संत सेवा की। चौरु-धनाजी महाराज का जन्मस्थल एवं ननिहाल। काशी में श्रीमठ- श्री धनाजी महाराज का दीक्षा स्थल। 

 

प्रयागराज - धनाजी महाराज का तीर्थस्थल। अयोध्या - भगवान श्रीराम का प्राकट्य स्थल। मथुरा, वृंदावन, गोकुल आदि भगवान श्रीकृष्ण के लीला स्थल। द्वारिका- तात छाप के लिए पूज्य स्थल गया- मुक्तिस्थल। गंगासागर, चित्रकूट, प्रभास क्षेत्र पुष्कर, कोलायत, नाथद्वारा, गलता आदि तीर्थ भी वैष्णवों के श्रद्धा जापित करने के स्थान हैं।

 

पठनीय ग्रंथ : धनावंशी वैष्णव जन के लिए सदैव पठनीय ग्रंथों में श्रीमद्भगवद गीता, भागवत पुराण, नारद पुराण, विष्णु पुराण, पद्म पुराण, स्कंद पुराण, श्रीरामचरित मानस, रामार्चन पद्धति, रामपटल, भक्तमाल, धनावंशीय संहिता, विष्णु सहस्रनाम, रामरक्षा स्तोत्र आदि हैं।

नित्य भगवद् पूजन : प्रातः ब्रह्ममुहूर्त में स्नानादि से निवृत्त होकर भगवान के मंदिर में जाकर सर्वप्रथम दंडवत प्रणाम करें तदुपरांत तीन ताली बजाकर मंदिर के किवाड़ खोलें। मंदिर की साफ-सफाई करें, पूर्व दिन के माल्य, गंध, तुलसी आदि को हटावें, पूजा के पात्रों को धो-मांजकर शुद्ध करें। फिर दीपक प्रकाशित करें। घंटानाद कर भगवान को जगावें। बाएं भाग में जलकलश भरकर रखें। पूजा की सामग्री को तैयार करें। श्लोक, पद बोलकर भगवान को जगावें। पंच पात्र में जल भरें- कलश में तुलसी-दल छोड़ें। भगवान के चरणों में तुलसी-दल छोड़ें, फिर पुष्प चढ़ाएं, भगवान का आह्वान करें। आह्वान मंत्र पढ़ें। आचमनी से जल लेकर भगवान के हस्त कमल को धोएं। फिर हस्त-मुख आदि का प्रक्षालन कर शुद्ध धुने वस्त्र से पौंछें। फिर मुख-पांव को धोएं। दंत धावन कराएं, फिर ताम्बूल भेंट करें। अंग स्नान कराएं, भगवान के उबटन मलें, फिर कलश के पानी से स्नान कराएं। भगवान को अर्घ्य दें- आभूषण पहनाएं। भगवान को उत्तरीय, ऊर्ध्वपुण्ड्र, वस्त्र, चंदन, तुलसी, नैवैद्य समर्पित करें। मंत्रों के साथ सेवा करें। नैवैद्य समर्पण के बाद, जलपान निवेदन, पुनः शुद्ध जल से भगवान के हाथ मुंह धुलवाएं, पुष्पांजलि तथा दक्षिणा देकर स्तुतिपाठ करें। प्रदक्षिणा करें - भगवान के नाम का स्मरण करते रहें। धनावंशीय आचार एवं परंपराएं श्रेष्ठ व्यक्तियों (बौद्धिक जनों) द्वारा अनुमोदित एवं बहुजनों द्वारा मान्य नियमों को आचार अथवा आचरण कहते हैं। हमारे धर्मग्रंथों खासकर स्मृतिग्रंथों यथा मन् स्मृति, याज्ञवल्यक स्मृति में इनका यथेष्ट उल्लेख है।

 

आचारों का पालन करना आवश्यक है। आचार से ही अपने कर्तव्य का बोध होता है। आचारों की तीन श्रेणियां मानी गई हैं, जो इस प्रकार हैं-

1. देशाचार

2. जात्याचार (जाति के आचार-विचार)

3. कुलाचार (अपने कुल के आचार-विचार) ।

 

हमारे धर्मग्रंथों में उपरोक्त प्रकार के आचारों का पालन करना आवश्यक बताया गया है। जो समुदाय अपने धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक आचारों का पालन नहीं करता या विपरीत पालन करता है तो उसका नाश अवश्यंभावी है। संप्रदाय के आचार्य आचरणों का पालन करते हैं, इसीलिए आचार्य कहलाते हैं। अपने अनुयायियों को भी वे आचरणगत व्यवहार करने की प्रेरणा देते हैं।

 

धनाजी महाराज ने जाट जाति के अनेक नखों के अनुयायियों को जब धनावंशी समुदाय में शामिल होने का आग्रह किया तो पूर्व जाति के अनेक आचारों के परित्याग का आग्रह रखा। आचार में अनेक क्रियाएं भी समाहित होती हैं।

 

धनावंशी स्वामी का खान-पान शुद्ध रहता है। उसे मांस-मछली अंडा तथा वैष्णव आचारों से हीन व्यक्ति के हाथ का भोजन निषेध है तथा किसी भी प्रकार का नशा चाय, कॉफी, बीड़ी, सिगरेट, भांग, गांजा, तम्बाखू, गुटखा, दारू, शीतलपेय की आचरणगत मनाही है।

 

धनावंशी स्त्री-पुरुष का पहनावा शोभनीय रहना चाहिए। खासकर स्त्रियों का पहनावा वैष्णवता को लज्जित करने वाला न हो। धनावंशी स्त्री पुरुषों का अभिवादन सुंदर तथा बोली व्यवहार कटखना न होकर शुद्ध, शुभ तथा महनीय होना चाहिए।

 

प्रतिदिन नित्यकर्म से निवृत्त होकर ठाकरद्वारे जाकर ठाकुरजी के दर्शन करने चाहिए। ठाकुरद्वारा दूर हो तो घर के मंदिर में ही भगवद् आराधना, संध्यावंदन आदि का नियम रहना चाहिए। सायंकालीन सत्संग भजन हो।

 

धनावंशी स्वामी के आराध्य देव केवल ठाकुरजी हैं, चूंकि श्री संप्रदाय के प्रणेता हनुमानजी हैं, इसलिए वे भी पूजनीय हैं। भैरव, पित्तर जैसी परिकल्पना धनावंश में नहीं है। कीर्तन धनावंश की मूल पूंजी है। हर धनावंशी के गले में तुलसी के मनकों की कंठी रहनी चाहिए। तिलक (ऊर्ध्वपुण्ड्र) और चोटी का भी विधान है।

धनावंशी को जनेऊ भी धारण करनी चाहिए। धनाजी महाराज स्वयं जनेऊ रखते थे तथा उन्होंने धनावंशी से जनेऊ का आग्रह भी रखा। धनावंशी घर में शालग्राम, शंख, पंच पात्र, रामचरितमानस तथा गीतादि अन्य शास्त्र भी आवश्यक धार्मिक चीजें हैं। धनावंशी का पुरुष नाम दासांत होना चाहिए।

 

धनावंशी विवाहों में स्त्री-पुरुष नाच (नृत्य) फूहड़ गान, डीजे आदि नहीं होने चाहिए। विवाह तथा अनान्य आयोजनों में भोजन सात्विक रहे, इस बात का ध्यान रखा जाता है। धनावंश में विधुर स्त्री या पुरुष के लिए नाता नहीं होता। बालविवाह भी निषेध है।

 

मृत्युपरांत धनावंशी को वैकुंठी के माध्यम से शमशान गृह तक पहुंचाया जाता है और उसको गोपीचंदन आदि के टीके किसी साधु की भांति ही लगाए जाते हैं। दाह संस्कार के बाद तप्त भात किया जाता है, जिसमें चावल का भोजन होता है और शोक निवारणार्थ होता है क्योंकि यह माना जाता है कि एक साधु भगवान के श्रीचरणों में चला गया। मृत्युपरांत 17 दिनों तक कीर्तन भजन रामचरित मानस के पाठ आदि चलते हैं तथा गंगाप्रसादी की प्रथम रात्रि मेळ के दिन मंदिर से आसन सहित शालग्रामजी को लाया जाकर उन्हें प्रसाद चढ़ाया जाता है। झालर शंख-नगारों के साथ आरती की जाती है। इसी दिन महंत का आगमन होता है। सत्रहवीं के दिन महंत कंठी बांधते हैं। पूर्व में महंत ही पैंतीसी के गांवों में सत्रहवीं में आने की चिट्ठी अपने हाथ से लिखा करते थे। धनावंशियों के यहां गरुड़ पुराण नहीं पढ़ी जाती।

 

धनावंशी भले ही गृहस्थी हो, उसे साधु का विरद प्राप्त होता है, इसलिए उसके प्रत्येक आचार-व्यवहार, स्वभाव में विनम्रता और साधुता के लक्षण रहने चाहिए।

 

धनावंशी महंत मंडल

जन्मकाल से वैराग्य संपन्न महापुरुष विरल होते हैं. पर महंत जन्मकाल से वैरागी होते हैं। भारतीय जीवन में चार आश्रमों की महत्ता रही है। प्रथम आश्रम ब्रह्मचर्याश्रम, उसके पश्चात गृहस्थाश्रम और उसके बाद वानप्रस्थाश्रम और आखिर में संन्यासाश्रम। यह विधान प्रत्येक व्यक्ति के लिए रहा है, किंतु जो मठों. मंडलों के निहंग महंत होते हैं. उनके संन्यास की सरुआत ब्रह्मचर्याश्रम के दौरान ही हो जाती है। ये जन्मकाल से वैरागी होते हैं।

 

महंत का संबंध किसी न किसी संप्रदाय विशेष से रहता है। उक्त संप्रदाय के समस्त धार्मिक संस्कार को वह विधि तथा परंपरा के अनमेल से संपन्न कराता है। उक्त संप्रदाय पर उसका धार्मिक नियंत्रण रहता है। महंत की कोटि कटीचक्र संन्यासी की रहती है। वह अधिष्ठाता के रूप में मठ, मंदिर, मंडल में रहकर वैराग्य जीवन व्यतीत करता है। काम, क्रोध, मद, लोभ आदि से रहित होकर वह संप्रदाय में धार्मिक गतिविधियों की अभिवृद्धि करता है। नैमित्तिक समस्त आचरणों का निर्वाह नियमबद्ध होकर करता है। उक्त महंत के निर्वाह मात्र संसाधनों का बंदोबस्त करना उक्त संप्रदाय के अनुयायियों का कर्तव्य रहता है।

 

महंतद्वारों को महंत गद्दी, मंडल, द्वारा आदि से संबोधन किया जाता है। महंतद्वारे ज्ञान के आगार होते हैं। जिस संप्रदाय का महंतद्वारा होता है, वहां उस द्वारे में पारंपरिक रूप से उक्त संप्रदाय की धार्मिक-आध्यात्मिक परंपराओं से संबंधित अभिलेख सुरक्षित रहते हैं। संप्रदाय के इतिवृत्त तथा अपनी महंत गुरु परंपरा की समस्त जानकारियां संकलित रखते हैं। संप्रदाय से संबंधित ग्रंथों का संग्रह रहता है। संप्रदाय से संबंध रखने वाले ग्रंथों का पारायण किया जाता है।

 

भक्त शिरोमणि धनाजी महाराज ने जब धनावंश पंथ की संस्थापना की तो पंथ की आवश्यकता समझकर समाज ने महंतद्वारे स्थापित किए। यह सोच रखा गया कि संप्रदाय की धार्मिक शिक्षाओं को आगे बढ़ाने के लिए महंतीय व्यवस्था से संप्रदाय के साधुओं को आधार प्राप्त होगा। धनावंशी वैरागी संप्रदाय के नियमों का निर्वहन होता रहेगा तथा महंत के रूप में सामान्य धनावंशी को गुरु की प्राप्ति होगी। महंतों की जागरूकता से समाज के आदर्श नियम बने रहेंगे। प्रारंभ में खारिया, कसूंबी, गारबदेसर जैसे थोड़े से महंत मंडल स्थापित हुए, किंतु धनाजी महाराज के हरिशरण होने के बाद महंत मंडलों की वृद्धि होती गई। ज्यों-ज्यों धनावंश की वृद्धि हुई, उसी के अनुरूप एक-एक पैंतीसी पर एक-एक गुरुद्वारा स्थापित होता गया। वे पैंतीस गांव जिनमें धनावंशी स्वामियों का वास था, एक मंडल के अधीन, वे गांव पैंतीसी कहलाते थे। उन पैंतीस गांवों के समुच्चय को ही मंडल की संज्ञा दी गई।

 

धनावंशी स्वामी के गोलोक गमन को साधुओं के देहावसान की भांति ही प्रतिष्ट्रा दी गई है। वह एक सामान्य व्यक्ति की मृत्यु न होकर एक वैरागी के हरिशरण होने की प्रभु इच्छा को माना गया। और मृत्युपरांत सत्रहवीं तक के सारे आचारों में वैरागी संत और गृहस्थी धनावंशी में कोई अंतर नहीं रखा गया। धनावंशियों में प्राणी की मृत्युपरांत अग्नि संस्कार के बाद 'तप्त भात' की परंपरा रही है। यह शोक निवारण की परंपरा है। ऐसा माना जाता है कि मृत्यु को प्राप्त व्यक्ति ठाकुरजी के अंश में लीन हो गया है। वह सायुज्य मुक्ति प्राप्त कर गया है, इसलिए उसके लिए शोक न किया जाए। सत्रह दिनों तक कीर्तन, सत्संग, रामायण पाठ आदि धार्मिक प्रसंगों में क्षेत्रीय महंत का निर्देश रहा करता तथा सत्रहवें दिन गंगा प्रसादी के मेले तथा पूर्व संध्या के मेल हेतु गृहस्थी वैरागी के नातेदारों को चिट्ठी देने की परंपरा (शोक संदेश भेजने) रही है, चिट्ठी देने का, लिखने का जिम्मा महंत का रहा है। इस प्रक्रिया को महंतजी द्वारा चिट्ठी फाड़ना कहा जाता था। समाज में परस्पर आत्मिक भाव बना रहे, इसलिए पैंतीसी में चिट्ठी देने की परंपरा भी रही है, किंतु धीरे-धीरे यह व्यवस्था शिथिल पड़कर लगभग समाप्त जैसी हो गई है।

 

मृत प्राणी के घर पर महंतजी को आमंत्रित किया जाता, तब वे अपने पूरे लवाजमें (शिष्यों आदि) के साथ आया करते। महंतजी के स्वागत में गवाड़ से लेकर घर तक रास्ते में लोवड़ी बिछाई जाती तथा उनके चरण का अंगूठा पखारा जाता और उस जल को चरणामृत के रूप में घर के सदस्य पान करते। मृतक धनावंशी के घर सत्रहवीं के भोजन को महंत के हाथ से परूसने की परंपरा थी। खिचड़ा-लापसी में महंत अपनी चुलू से घी परोसते। बांकिया ध्वनि के बाद भोजन प्रारंभ होता। यह एक गुरु का सम्मान था। महंत के गुरुद्वारे पूजनीय होते हैं। उनमें बालकों के जात-झडूले उतरते रहे हैं तथा विवाह शादी के उपरांत लोग गठजोड़े की जात लगाते हैं। यह इस पदवी के प्रति सम्मान की परंपरा रही है। महंत के समक्ष शिष्यगण को खाली हाथ नहीं जाना चाहिए।

 

महंतों की राजाओं तथा जागीरदारों के समय में बड़ी भारी प्रतिष्ठा तथा मान्यता हुआ करती थी। राजा लोग अपने-अपने क्षेत्र के महंतों को राज्याश्रय के रूप में बड़ी-बड़ी जमीनें डोली रूप में प्रदान करते तथा मंदिरों के लिए पेटिया व्यवस्था कायम किया करते।

 

अनेक धनावंशी महंतों का तत्कालीन समय में धार्मिक रुतबा था। गारबदेसर के महंत हरिदासजी का बीकानेर के राजा सूरतसिंहजी अत्यधिक सम्मान करते थे। वे टीकमदास के शिष्य को बीकानेर के महाराजा सुरतसिंहजी ने एक हजार बीघा जमीन महंत के अनुग्रह के लिए लालायित रहते थे। कड़वासर के तत्कालीन महंत मोहनदास, तथा दूसरी अनेक सुविधाएं प्रदान कीं। भादरा के महंत कानड़दास को उच्च कोटि का पेटिया प्रदान किया गया। बीकानेर महाराजा रतनसिंह ने बकणसर के तत्कालीन महंत हरिदास शिष्य दयाराम प्रशिष्य बदरीप्रसाद को भाछ, नेतो आदि करों में छूट तथा भूमि प्रदान की। गारबदेसर के महंत को अस्थल के पीछे 300 बीघा तथा 750 बीघा भूमि कालू में प्रदान की गई। महंतों को भूमि, पेटिया तथा करों में छूट के ऐसे अनेक ब्यौरे राजाओं के समय के बड़ी संख्या में प्राप्त होते हैं। जायल के महंत का बड़ा भारी रुतबा था। कसूंबी के महंत की धोक खाने के बाद ही वहां के जागीरदार सामौर (चारण) शुभ कार्य करते। चूरू के महंत की भी ऐसी ही प्रतिष्ठा थी। निम्बी जोधा के महंत को होली-दीवाली के राम-राम के दिन गढ़ के भीतर सम्मानपूर्वक ऊंचा आसन देकर बैठाया जाता। जोधपुर के तीनों धनावंशी महंतद्वारों का अत्यधिक मान-सम्मान था। खारिया महंत का बीदावत ठिकानेदारों ने सदैव सम्मान किया। गारबदेसर महंत के संबंध में लिखा है, "महाराजा सूरतसिंह ने संवत 1852 में महंत को तीन सौ, नौ सौ तथा सात सौ पचास बीघा अर्थात 2025 बीघा जमीन प्रदान की।... श्री हरिदास महंत तकड़बंध एवं राजवी की भांति जमीन जायदाद वाले थे।" धनावंशी महंत की गरिमा सदैव ही समाज में बनी रही। जोधपुर के मोतीबाई मंदिर के महंत श्री गणेशदासजी ने अपने सप्रयासों से लाडनूं के मंगलपुरा क्षेत्र में श्री वैरागी विद्यालय की स्थापना 24 अप्रैल, 1950 में की। इसमें गुरुकुल आवासीय पद्धति से वैरागी विद्यार्थियों को निशुल्क शिक्षा प्रदान की गई। जोधपुर के महंत बदरीदासजी गोलिया भी नामी संत हुए, जिन्होंने धनाजी महाराज पर दो पुस्तकों का लेखन किया। नोहर के महंत बालदासजी, भादरा के महंत जानकीदासजी, मूंडवा के महंत सीतारामदासजी, जोधपुर के महंत बदरीनारायणजी, गोपालपुरा के महंत हनुमानदासजी, निम्बोल के महंत द्वारकादासजी ने भी श्री वैरागी विद्यालय की स्थापना में सहयोग किया। किसी समय नागौर क्षेत्र के नौ महंत मंडलों में परस्पर बहुत सामंजस्य रहा करता था। नौ मंडलों की चिट्ठी फाड़ना भी बड़े गौरव का विषय था। 

सभी ऐतिहासिक एवं प्राचीन तथ्य धनावंशी मंडल महंतों की महत्ता प्रतिपादित करते हैं। धनावंश की धार्मिक-आध्यात्मिक सुदृढ़ता के प्रतीक कहे जाने वाले महंतद्वारे विगत अनेक दशाब्दियों से शैथिल्य के शिकार हो चुके हैं। इस व्यवस्था को पुनः सुदृढ़ आधार प्रदान करने की आवश्यकता है। महंत साधना कर स्वयं का आत्मोत्थान तो करता ही है, समाज को भी इसके लिए प्रेरित करने का दायित्व भी उनका रहता है। महंतों को गद्दीनशीन करने का कार्य पंथ का रहता है। आवश्यकता पड़ने पर समाज नव महंतों तथा परिव्राजक को दीक्षा दिलवा सकता है। महंतों की वंश परंपरा न होकर शिष्य परंपरा होती है। योग्यता देखकर शिष्य बनाया जाता है। महंत के पद पर विराजित व्यक्ति को अपनी सभी योग्यताओं से संपन्न होना चाहिए। समाज के अनेक विवादास्पद मुद्दों का निपटारा महंतद्वारों में महंतों के द्वारा किए जाते थे, क्योंकि महंतों की न्यायप्रियता उल्लेखनीय हुआ करती थी। महंत के बड़प्पन का अंकुश रहने से ही समाज में स्वच्छंदता से समाज विरोधी कार्य करने से कोई भी व्यक्ति डरा करता था। महंत न केवल प्रतिभावान अपितु समाज पर पकड़ रखने वाला व्यक्ति होना चाहिए। महंत समाज का आईना होते हैं। वे समाज को गढ़ने का दायित्व रखते हैं।

 

कसूंबी और खारिया ग‌द्दी दोनों ही सबसे प्राचीन महंत गद्दियां हैं। दोनों का परस्पर संबंध भी है। दोनों ही गद्दियों के मंदिर नृसिंह भगवान के हैं। खारिया गद्दी के महंत नारायणदास प्रभावी महंत थे। खारिया मंदिर के दर्शन करने के लिए बीदावत राठौड़ आया करते थे।

 

धनावंश में परिव्राजक महंत की अवधारणा

किसी भी समाज में जब पूर्व प्रचलित धार्मिक एवं आध्यात्मिक परंपराएं अवसान को प्राप्त होने लगे तो निश्चित तौर पर यह जानना चाहिए कि जीवन की चिरंतनता पर विचार करने वाले बौद्धिक जन का अभाव हुआ है। उस समाज के लोगों को इस अप्रिय स्थिति पर चिंतन-मनन करना चाहिए। अग्रगण्य एवं बौद्धिक जन के अभाव से उस समाज के आदर्शवादी मूल्य क्षीण होकर मर जाते हैं। किसी भी समाज की सुंदर छवि उसके नैतिक, आध्यात्मिक और सौंदर्यपरक प्रतिमानों से बनती है।

 

भक्तिकाल में अनेक संप्रदायों का जन्म हुआ। इसी दौरान भक्त धनाजी के प्रयासों से धनावंश अस्तित्व में आया। किसी भी संप्रदाय का अभ्युदय काल पूर्णतया आदर्शवादी होता है। वैराग्य, भगवद्भावना, ईश आराधना की भावना से प्रेरित इस समुदाय के सैकडों मंदिर निर्मित हए। समाज को धर्म की चिंतनधारा से जोडे रखने के लिए 35 के लगभग महंतद्वारे भी बने। महंत उसी को बनाया गया, जो सामान्य जन से आध्यात्मिका के लिहाज से काफी उच्चतर स्थिति में था। उसकी जीवनदृष्टि भौतिक मूल्यों से परे आध्यात्मिक मूल्यों से संवलित थी। धर्म की विचारधारा को संपोषित करने तथा उनके संप्रसार के लिए कटिबद्ध थी। वहीं महंत नाम का वह व्यक्ति सदाचारों के निर्वहन में एक आदर्श स्थिति को धारित करने वाला होता था। पंथ प्रवर्तक ने जिस धार्मिक राह का संचालन किया है, उसका भली प्रकार अनुसरण करने वाला हो, यह भी महंत के लिए आवश्यक कर्म था। वैसे तो कोई भी मनुष्य नैतिक रूप से स्वतंत्र होता है, वह चाहे तो पूर्व परंपराओं का अनुसरण करे, वह चाहे तो उन परंपराओं में किसी नव्य राह का सूत्रपात करे, और चाहे तो सब प्रकार के शैथिल्य का शिकार हो जाए। पर इन तीनों स्थितियों में एक पंथ के लिए आदर्श स्थिति कौनसी है-इस पर विचार किया जाना आवश्यक है। पंथ की दृष्टि से घातक स्थिति शैथिल्य को प्राप्त हो जाना है। ऐसा करके तो वह स्वयं एक पतनकारी स्थिति में पहुंच गया और उसने अपने पंथ की आध्यात्मिक उन्नति को भारी आघात पहुंचाया।

 

एक महंत, किसी मठाधीश सत्ता का नाम नहीं है। न ही वह किसी अकर्मण्यता का प्रतीक है। वह तो सृजनशील मनीषा का वाहक है। उसका पद दोहरे प्रतिमानों पर टिका हुआ है, एक ओर वह स्वयं का आत्मिक उद्धार करता है, दूसरी ओर अपने पांधिक स्वजनों के आध्यात्मिक उद्धार के लिए प्रतिबद्ध है। काल और समय के प्रवाह में उसे अपनी भूमिका का निर्वहन सम्यक प्रकारेण करना है, यह सीख उसके भीतर से उपजनी चाहिए।

 

संप्रदाय चाहे कोई सा हो, जब तक उसकी आत्मिक संरचना को नहीं जाना जाएगा-महंत के लिए कोई करणीय कार्य ही नहीं रह जाएगा। इतिहास में जाएं, जब 'श्री संप्रदाय' एकांगी और केवल पद पूजन तक सीमित हो गया तो रामानंदजी को यह स्थिति जड़वत, निष्क्रिय और अप्रिय लगी। उन्होंने इसका प्रतिकार अपने गुरु राघवाचार्यजी के समक्ष रखा। कुछ वाद-विवाद-संवाद के बाद रामानंद को नव पंथ रामावत संप्रदाय की स्थापना करनी पड़ी और उनकी उदारता यह रही कि अपने सभी शिष्यों को उन्होंने केवल रामावत संप्रदाय से बंधने की बात न कहकर अपने-अपने हिसाब से नए पंथ स्थापित करने की सलाह व स्वतंत्रता प्रदान की। परिणाम यह हुआ कि विभिन्न जातियों को धर्मोन्मुख करने का महती कार्य, अस्तित्व में आए अनेक संप्रदायों के माध्यम से सुगम हुआ। धनावंश भी रामानंदजी की अपने शिष्य धनाजी को दी हई उस सीख का परिणाम है। धनाजी के लिए यह सुगमता थी कि धनावंश में समाहित करने के लिए उन्हें अपनी से इतर किसी दूसरी जाति का मुंह नहीं जोहना पड़ा। धनाजी जाट जाति से थे और राजपूताना में उस वक्त यह सबसे ज्यादा जन बाहुल्य वाली जाति थी। धनाजी ने अपनी जाति के जाटों को वैराग्य का वरण कराकर प्रभु भक्ति की ओर उन्मुख होने का आग्रह किया। जिन जाट परिवारों को उनका यह आग्रह उचित प्रतीत हुआ, वे उनके अनुयायी बनकर धनावंशी कहलाए। चूंकि धनावंश एक नव संप्रदाय था। धार्मिक संप्रदाय में मंदिर, महंत, अनुयायी, भक्ति पद्धति-ये अनिवार्य संज्ञाएं हुआ करती हैं। किसी भी संप्रदाय की परंपराओं का विस्तार शनै-शनै होता रहता है। धनावंश पंथ के अभ्युदय काल के अन्यान्य संप्रदायों का विस्तार निस्संदेह धनावंश से अधिक हुआ है। किसी भी संप्रदाय की उन्नति तथा विस्तार में जितनी सक्रियता और योगदान महंतों का, आचार्यों का हुआ करता है, उससे कम भागिता और सौजन्य अनुयायीगण का भी नहीं होता। कारण अज्ञात है, पर छह-सात दशकों से धनावंश की सांप्रदायिक गतिविधियों में गतिरोध आया है, इससे इसकी आध्यात्मिक उन्नति भी प्रभावित हुए बिना नहीं रही है।

 

एक परंपरा थी निहंग महंतों की। पर शिथिलाचार ने लगभग महंतों को निहंग नहीं रहने दिया। धर्म अध्यात्म की ठौर जब से धन-संपत्ति के स्वामित्व द्वारा लेना शुरू हुआ, महंतीय व्यवस्था छिन्न-भिन्न होने में देर नहीं लगी। पारिवारिक जंजालों एवं जिम्मेदारियों में उलझा महंत लोकमानस को धर्मोपदेश करे भी तो वह अधिक प्रभाव नहीं रख पाता। सामान्य जन के मूल्यांकन का परिमाप नैतिक एवं आचरण के मूल्यों पर रहता है। "पर उपदेश कुशल बहुतेरे। जे आचरहिं ते नर न घनेरे।" त्यागी, वैरागी, तपस्वी, सेवाभावी, सत्कर्तव्यनिष्ठ महंत जैसी बात कह सकता है, वैसी बात एक सद्गृहस्थ महंत कह भी तो नहीं पाता। स्वार्थपरता, अर्थलिप्सा, कीर्तिलिप्सा ने धनावंश की महंतीय व्यवस्था को चौपट कर दिया। रही-सही कसर तब पूरी हो गई, जब महंतीय प्रणाली को कुटुंबीय नातों से जोड़ दिया गया। कोई निहंग महंत रह भी गया तो उसने अपने परिवार के ही किसी अबोध बालक को महंत की गद्दी के लिए शिष्यत्व देना अधिक समीचीन जाना। दृष्टि महंत गद्दी की संपदा पर रही। अपढ़-अबोध बालक को महंत के लिए अपेक्षित ज्ञान सरणि में से गुजारने को कतई महत्त्व नहीं दिया गया। केवल महंत का ठप्पा लगाने को ही प्रमुखता दी गई। फलस्वरूप एक साथ एक उन्नत महंत परंपरा अस्ताचल में जाने को बाध्य हो गई। इसके लिए संपूर्ण धनावंशी समुदाय भी कम दोषी नहीं है। यह व्यवस्था भंग होती गई, पर किसी ने इस पर अपनी असहमति जाहिर नहीं की। न ही कोई इस बिगडती व्यवस्था का सुधार करने के लिए आगे आया। समाज में चिंतनशील व्यक्तियों के अभाव की ओर भी यह स्थिति अंगुली उठाती है। समाज में किसी ने भी हस्तक्षेप की अपनी भूमिका को नहीं जाना। एक-एक महंतद्वारों के बंद होते दरवाजों को निशब्द देखते रहे। जहां कहीं किसी गद्दी पर कोई एकाध महंत बैठा भी है तो वह अपनी परंपराओं और इतिहास से नितांत अनभिज्ञ है। किंकर्तव्यविमूढ, कर्तव्यशुन्य तथा इस अस्वस्थ व्यवस्था के मददेनजर अब समाज के सामने किस तरह का विकल्प बचता है, यह नितांत चिंतनीय एवं प्राथमिक मुद्दा है। इस महंतीय व्यवस्था को स्वस्थ कैसे किया जा सकता है ? महंत और मंदिर नहीं तो धनावंश को संप्रदाय नहीं कहा जा सकता। कतिपय अवहेलना बरतने वाले अज्ञानी किस्म के लोगों के लिए यह कोई अत्यावश्यक नहीं है कि संप्रदाय रहे कि न रहे, जाति रहे कि न रहे, स्वस्थ आध्यात्मिक मूल्य रहे या न रहे। अपने परिवार के पांच-चार जनों की शुभता से आगे उनका सोच ही नहीं रहता। इसलिए वे सदैव निष्प्रयत्न बने रहना सुखकारी समझते हैं। संसार सुरम्य-सुंदर एवं रत्नों से भरा है, किंतु 'मूढैः पाषाणखण्डेषु, रत्न संज्ञा विधीयते।' कोई पत्थरों को ही रत्न समझे तो क्या किया जा सकता है। पर स्थिति जब ऐसी अवनति को प्राप्त होने लगे तो चंद जागरूक चेतनाशील लोगों की भूमिका अहम हो जाती है। समाज के संत, साधक, ज्ञानीजन तीनों से लाभ प्राप्त होता है। ज्ञानीजन अपने सद्वचनों से किसी भी संप्रदाय को पुनर्प्रतिष्ठा दिलवा सकता है।

 

इस आलेख के प्रारंभ में इंगित किया गया था कि संप्रदाय की उन्नति में महंतजन के अलावा उक्त संप्रदाय के एक आचार्य की भूमिका भी महती रहती है। अनेक संप्रदायों में आचार्य परंपरा को हम जीवंत रूप में देख रहे हैं। आचार्य स्नेहानुग्रह के साथ पंथ को चारित्रिक जागृति के साथ आगे बढ़ाते हैं। अनैतिकताओं, विषमताओं से परे रहने तथा अपने संप्रदाय की शिक्षाओं को ग्रहण करने का आग्रह करते हैं। आचार्य संप्रदाय को बहुत उच्च अवस्था तक ले जाने का सामर्थ्य रखते हैं, पर अफसोस, धनावंश ने इस व्यवस्था की ओर कभी ध्यान नहीं दिया। जिस पंथ में आचार्य होते हैं, वे निस्वार्थ भाव से अपने समाज में सद्विचार और अध्यात्म की थाती को अक्षुण्ण रखने का महती कार्य करते हैं। उनकी प्रेरणा से आडंबर, दुर्व्यसन, अंधविश्वासों से मुक्त समाज बनता है। सबसे बडी बात-आचार्य ज्ञानवर्द्धक साहित्य की रचना कर समाज को सौंपते हैं। उनकी अनुभव वाणी आगे संप्रदाय की परंपरा को जीवित रखने में युक्तिकर होती है।

इसे स्पष्टतया समझना आवश्यक है कि जब तक धनावंशी संप्रदाय में लक्ष्यानुरूप कार्य प्रारंभ नहीं होंगे, इसका परंपरागत आध्यात्मिक स्वरूप विकृत होता जाएगा।

 

एक सर्वहितकारी संप्रदाय के परिणाम उपस्थिति नहीं हो पाएंगे। भ्रमवश हमारे संप्रदाय का जितना उजाड़ हुआ है-उसकी भरपाई के लिए तीनों उपक्रमों को पुनः प्राणवान बनाना आवश्यक है। सुविज्ञ महंत बनाए जाएं, भ्रमणशील परिव्राजकों को दीक्षाएं हो, और संभव हो तो धनावंशाचार्य का पद भी हो तथा उपरोक्त सभी पदों के लिए श्रेष्ठ व्यक्तियों का चयन हो और वे सभी उदात्त मानवीय गुणों से अभिमंडित हों।

 

निष्ठावान समाजसेवी के रूप में, गृहस्थ से उपराम, वानप्रस्थी सज्जन, परिव्राजक दीक्षा के सर्वथा उपयुक्त हो सकते हैं। समाज के धार्मिक-आध्यात्मिक शैथिल्य तथा अनेक विभ्रमों को ध्वस्त करने में इनकी महती भूमिका हो सकती है।

 

जानंति केचिन्न च कर्तुमीशाः कर्तुं क्षमा ये न च ते विदंति।

जानंति तत्त्वं प्रभवंति कर्तुं ते केअपि लोके विरला भवंति ।।

 

कहा गया है कि कतिपय जानते हैं, पर करने में सक्षम नहीं हैं। कुछ करने में समर्थ हैं, पर जानते नहीं, पर ऐसे व्यक्ति थोड़े होते हैं, जो जानते भी हैं और करने में भी समर्थ होते हैं।

 

सूझबूझ से भरे समाज चेताओं को हमें परिव्राजक दीक्षा ग्रहण करने के लिए प्रेरित करना चाहिए। हमारा जुड़ाव इस आध्यात्मिक संप्रदाय से है तो हमें आध्यात्मिकता के स्तर पर भी बात करनी चाहिए। अध्यात्म का प्रथम सोपान जिज्ञासा से प्रारंभ होता है। जिज्ञासु अपनी ज्ञान पिपासा को शांत करने के लिए संतजनों का संग करता है। शास्त्रों का अध्ययन करता है। स्वयं के अवलोक से उसका आत्मोत्थान प्रारंभ होता है। स्वयं के भीतर उठने वाले प्रश्नों से उसका साक्षात् होता है। उत्तर भी भीतर से पाता है। संसार का मिथ्यात्व समझ में आता है और वैराग्य की यात्रा प्रारंभ होती है। वैराग्य से आत्मानंद प्रकट होता है। वैराग्य कोई जातिगत संज्ञा नहीं है। कोई व्यक्ति लिपटा तो है सांसारिक गुणों से और अपने जाति नाम 'वैरागी' से प्रमुदित होता है, यह तो स्वयं को छलने जैसी बात है।

 

इसलिए आध्यात्मिक स्वभाव के जनों को धनावंश की वास्तविक पहचान, जो कि एक वैराग्य परंपरा से अनुस्यूत है, से अधिकाधिक जनों को परिचित कराने की आवश्यकता है। महंत और आचार्य, स्वयं की चाहना भर से नहीं बन सकते, उसमें समाज जनों की स्वीकृति आवश्यक है किंतु परिव्राजक दीक्षा के लिए किसी की स्वीकारोक्ति की जरूरत नहीं पड़ती। स्वयं की प्रेरणा से धर्म प्रचार का कार्य करने से कौन रोकता है। परिव्राजक बहुत पहले से होते आए हैं। परिव्राजक स्वयं साधक रूप में होता है और जन कल्याण की उदार भावना से भावित होकर समाज में सदगुणों, ईश्वरान्राग का प्रसार करने का कार्य स्वेच्छा से करता है। अपने समाज की ऐतिहासिकता और उच्च परंपराओं से भी वाकिफ कराने का काम भी उसका है।

 

परिव्राजक सेवा-धर्म से प्रेरित होकर कार्य करते हैं। समाज को उदात्त जीवनचर्या की शिक्षा देना उनका परम कर्तव्य है। तुलसीदासजी ने सही कहा है- 'सब तें सेवक धरम कठोरा।' समाज की सेवा का यह कार्य कठिन तो है, किंतु इसका लक्ष्य बड़ा महान है। ज्ञानी, धैर्यवान, परम संतोषी, मानापमान रहित व्यक्ति ही कुशलता से परिव्राजक धर्म का पालन कर सकता है। वस्तुतः तो परिव्राजक दीक्षा-सेवाव्रत का संकल्प है। संयमपूर्ण इसका निर्वहन परमोच्च स्थितिदायक है। धनावंश में इसका महत्त्व इसलिए अधिक है क्योंकि यहां अनेक विभ्रम समाज को संशय में डालते रहे हैं। पैंतीस महंत थे तो कम से कम बीस-पचीस परिव्राजक तो होने ही चाहिए।

 

धनावंशीय सम्प्रदाय - दृष्टिकोण

1. धर्म - वैरागी।

 

2. सम्प्रदाय - धनावंश।

 

3. सम्प्रदाय मान्यता - वैष्णवी।

 

4. जाति - धनावंशी स्वामी, साध, वैरागी।

 

5. सम्प्रदाय भाव - सत्व गुण, निर्वेद (वैराग्य) ।

 

6. सम्प्रदाय गुरु - धना भगत जी।

 

7. आदि संबंध - सनकादिक ऋषि।

 

8. उपासना - ठाकुरजी (विष्णु अवतार-श्रीराम एवं श्रीकृष्ण) ।

 

9. संबोधन, अभिवादन - जय ठाकुर जी की।

 

10. गोत्र - अच्युत ।

 

11. जाति नख - विभिन्न।

 

12. धर्म परम्परा - अनादि काल से, आदि वैराग।

 

13. मण्डल - विभिन्न महन्त मंडल।

 

14. गुण - 26 (छब्बीस)।

 

15. तिलक - ऊर्ध्वपुण्ड्र ।

 

16. वेशभूषा - श्वेत वस्त्र ।

 

17. त्याज्य - व्यसन मुक्ति, व्यर्थ चिंतन ।

 

18. भोजन - सात्विक ।

 

19. स्नान - नित्य-प्रातः ।

 

20. स्वाध्याय ग्रंथ - श्रीमद्भगवद्‌गीता, रामचरितमानस, भक्तमाल, विष्णु सहस्रनाम, रामरक्षा स्तोत्र, भागवत पुराण, स्कंद पुराण, पद्म पुराणादि ।

 

21. भगवप्रसाद - पंचामृत, तुलसी-पत्र, शालग्राम चरणामृत।

 

22. भक्ति - साकार सगुण वैष्णवावतार ।

 

23. मुख्य दिवस - रामनवमी, जन्माष्टमी, श्री धनाजी जयंती।

 

24. सद्गृहस्थ उपासना - प्रत्येक घर में शालग्राम पूजा।

 

25. प्रभु स्मरण - प्रातः-सायं, संध्यावंदन आवश्यक, यों दिन-भर प्रभु पूजें।

 

26. जुड़ाव - नैमितिक सत्संग से जुड़ाव।

 

27. सत्कार - स्वजातीय जन एवं सभी अतिथियों का।

 

28. तत्परता - समाज हित के कार्यों में।

29. व्रतोपवास - एकादशी, पूर्णिमा, अनंत चतुर्दशी सहित विभिन्न पर्व।

 

30. मुक्ति कामना - सामीप्य, सारुप्य, सायुज्य, सालोक्य।

 

31. मंत्र - रामाय नमः, कृष्णाय नमः ॐ नमो भगवदे वासुदेवाय नमः ।

 

32. धारणीय - तिलक (ऊर्ध्वपुण्ड्र) तुलसी काष्ठ की कंठमाला, शिखा (चोटी रखना), गो-खुर।

 

33. भक्तिस्वरूप - नवधा।

 

34. दीक्षा - मण्डलीय महन्त द्वारा।

 

35. निषेद - सूतक ।

 

36. पूजन - द्वियाम, धूप-दीप, निराजन, नैवैद्य सहित।

 

37. भोग - शालग्राम को बाल भोग।

 

38. प्रणाम - भूमिष्ठ होकर, दण्डवत ।

 

39. भजन - नित्य प्रभु भजन।

 

40. आंतरिक लक्षण - निरभिमानी, शील, संतोष, सद्वक्ता, मिष्ठभाषी, सज्ञानी, सद्व्यवहार।

 

41. कुलाभिमान - सदैव धनावंशी के साथ न्यात व्यवहार की दृढ़प्रतिज्ञा।

 

42. स्मरण - श्रीराम, श्रीकृष्ण नामोच्चार।

 

43. स्वकांक्षी - ऊर्ध्व गति।

 

44. आरती - पंचारति।

 

45. भोजन नियम -भोजन पूर्व पंच ग्रास टालना, अल्प आहारी।

 

46. प्राण त्याग प्रयास - दसवें द्वार (ब्रह्मरन्ध्र) से।

 

47. पंचतत्त्व विसर्जन स्थल - मुक्तिधाम।

 

48. अंतिम पार्थिव यात्रा - काष्ठ वैकुंठी में।

 

49. अंतिम संस्कार - अग्नि संस्कार।

 

50. तप्त भात - शोक विछिन्नता। अग्नि संस्कार के तुरंत बाद चावल का भोजन कर शोक का परित्याग । यह मानना कि एक जीव का परमात्मा में विलय हो गया।

 

51. स्वर्गोपरांत दिवस - 17 दिवस (सतरही) ।

 

52. सतरह दिवस - 17 दिनों में निरंतर रामचरितमानस एवं हरिनाम संकीर्तन। धनावंशी गरुड़ पुराण का पाठ नहीं करते।

 

उपरोक बावन चीजें, धनावंश सम्प्रदाय को एक शिष्ट एवं अलग पहचान वाला सम्प्रदाय सिद्ध करती है।

 

विशिष्टाद्वैत सिद्धांत के अनुसार जीव का ठाकुरजी के साथ संबंध वैष्णव साधना पद्धति में जीव का परमात्मा के साथ संबंध है।

 

ये सोलह संबंध इस प्रकार हैं-

 

1. गुरु- गुरु का बडा महत्त्व है। परमात्मा जीव के गुरु हैं और गुरु में भी परमात्म भाव देखना चाहिए।

 

2. माता - जीव को परमात्मा मातृरूप में पालते तथा रक्षा करते हैं।

 

3. पिता - जीव का पोषण परमात्मा पिता की भांति करते हैं।

 

4. रक्षक परमात्मा ही सदैव जीव की रक्षा करते हैं।

 

5. शेषी- जीव शेष अर्थात अंश हैं और भगवान शेषी (अंशी) हैं।

 

6. भर्ता - जीव के पोषण परमात्मा ही करते हैं, वे दैव उसके भर्ता हैं।

 

7. स्वामी - जीवात्मा भार्या है और भगवान उसके स्वामी। जीव भगवान का दास है।

 

8. आधार जीवात्मा के असली आधार परमात्मा ही हैं। जीवात्मा आधेय रूप में हैं और परमात्मा उसके आधार।

 

9. भोक्ता - जीवात्मा भोग्य है और परमात्मा उसके भोक्ता। इसका उलटा भी संभव है, जीव भी परमात्मा का भोक्ता हो सकता है।

 

10. शरीरी प्राण परमात्मा का शरीर है। परमात्मा उसके शरीरी हैं।

 

11. मित्र - इस जीव का कल्याण चाहने वाले, इसके सच्चे मित्र परमात्मा ही हैं।

 

12. बांधव - जीव के नित्य बंधु हैं परमात्मा, त्वमेव बंधु।

 

13. धन जीव का सबसे बड़ा धन ठाकुरजी ही हैं।

 

14. राजा जीवात्मा प्रजा है और उसके राजा परमात्मा हैं। राजा के अनुशासन का पालन प्रजा को सदैव करना चाहिए।

 

15. देव - परमात्मा देव हैं और यह जीव उनका उपासक।

 

16. सेव्य - जीवात्मा ही सेवक है और उसके सेव्य हैं परमात्मा, जिनकी उसे सेवा करनी है।

 

जीव के कल्याण के लिए इन सोलह संबंधों का निर्वाह आवश्यक है।

श्री धनाजी की गुरु परंपरा

श्री रामानंदजी के रामार्चन पद्धति में अपनी गुरु परंपरा इस प्रकार दर्शायी है-

 

(1) श्री रामचन्द्रजी

 

(2) श्री सीताजी

 

(3) श्री विष्वक्सेनजी

 

(4) श्री शठकोपजी

 

(5) श्री नाथ मुनिजी

 

(6) श्री पुण्डरीकांक्ष जी

 

(7) श्री राममिश्रजी

 

(8) श्री यामुनाचार्यजी

 

(9) श्री महापूर्णाचार्यजी

 

(10) श्री रामानुजाचार्यजी

 

(11) श्री कुरुकेशजी

 

(12) श्री माधवाचार्यजी

 

(13) श्री वोपदेवाचार्यजी

 

(14) श्री देवाधिपजी

 

(15) श्री पुरुषोत्तमजी

 

(16) श्री गंगाधरजी

 

(17) श्री रामेश्वरजी

 

(18) श्री द्वारानंदजी

 

(19) श्री देवानंदजी

 

(20) श्री श्रियानंदजी

 

(21) श्री हरियानंदजी

 

(22) श्री राघवानंदजी

 

(23) श्री रामानंदजी और रामानंदजी के शिष्य

 

(24) श्री धनाजी महाराज


 

श्री संप्रदाय परंपरा

लक्ष्मीनाथ समारम्भा नाथ यामुनमध्यमाम्।

अस्मदाचार्यपर्यन्तां वन्दे गुरुपरम्पराम् ।। 

मुक्त्यधिकारिण येते सम्प्रदायप्रवर्तकाः । 

येषां मन्त्रोपदेशेन प्राप्तं भागवतं पदम् ।। 

श्रीमन्नारायणः साक्षाज्जीव लोकानुकम्पया। 

गुह्याद गुह्यतमं मन्त्रं तारकै तिमिरापहम् ।। 

देव्यानुबोधितः श्रीमान्विष्णुः सर्वजनेश्वरः । 

आह्वयामास सा देवी तारकं पुण्यवर्धनम् ।। 

कृतकृत्या तदा लक्ष्मीप्राप्तमष्टाक्षर द्वयम् । 

ददौ प्रीत्या तदा देवी विष्वक्सेनं स्वपार्व्वदम् ।।

विष्वक्सेनोत्तमं मन्त्रं लब्धवान्वैष्णवोत्तमम् । 

शठकोपेति विख्यातो मुनिवर्यः सदात्मवान् ।। 

कोपदेव समाराध्य द्वापरादौ परांकुशः । 

व्यंकटादौ द्राविडेषु प्राप्तं मन्त्रार्थगुह्यकम् ।। 

परांगशेन च प्रोक्तं श्रीनाथमुनये तथा। 

पुंडरीकाक्षेण प्रोक्तः राममिश्रमहामतिः ।। 

यामुनमुनिनाप्रोक्तः दासनाम परांकुशः । 

चत्वारस्तस्य विख्याताः शिष्याः परांकुशस्य च ।।

श्रुतिदेवश्रुतप्राज्ञः श्रुतधामा श्रुतोदधिः ।

त्रिदण्डिनः शिष्या युक्तो रामानुजश्व पंचमः ।।

रामानुज समराध्य कुरुकेशो महामतिः ।

पञ्च संस्कार सम्पन्नो महाभागवतोत्तमः ।।

आह्वयामास परमं तारकं तिमिरापहम् ।

गोविंदाचार्येण सम्प्रोक्तः भद्राचार्य पराशरः ।।

निगमान्तेन योगिना प्रोक्तं वै लोकाचार्याय।

माधवाचार्येण प्रोक्तं मन्त्रराजरहस्यकम् ।।

देवाधिपेन शैलेशं रम्यजामातरं मुनिम् ।

पुरुषोत्तमसम्प्रोक्तं गंगाधराय तेन वै ।।

तेन प्रोक्तं सदाचार्यवन्दसंज्ञाविधानतः ।

ततो रामेश्वराचार्यः द्वारानन्दश्व तेन वै।।

देवानन्दः समाख्यातः कृतः कृपानिधिः खलु ।

तेन श्यामानन्दः प्रोक्तः श्रुतानन्दाय धीमते ।।

ततः प्रोक्तं चित्यानन्दे पूर्णानन्दोदयानिधिः । 

श्रियानन्देन सम्प्रोक्तः हर्यानन्द महामतिः ।। 

तेन प्रोक्तं महामन्त्रं रामानन्द जगद्गुरुम।। 

सार्धद्वादश शिष्यास्तु रामानन्दगुरोरपि । 

द्वादशादित्य संकाशाः संसार तिमिरापहाः ।।

अनन्तश्वसुरानन्दः सुखानंदः नरहरिः । 

भवानन्दश्व गालवः सप्तैते नामनन्दना ।

कविरश्व रमादासः सैन्यो पीपा धनस्तथा ।

पद्मावती तदर्थे च षडेते षट् सप्तनजितं ।।

 

इति श्रीपरम्परा सम्पूर्णा

 

गलता गद्दी की गुरु परंपरा

गलता गददी की स्थापना श्री कष्णदासजी पयहारी ने की थी। वे रामानंदजी के शिष्य अनंतानंदजी के शिष्य थे। पयहारीजी ने बारह वर्षों तक पुष्कर में तपस्या करने के उपरांत गलता में अपना स्थान बनाया। श्री कृष्णदासजी बड़े चमत्कारी संत थे। उन्होंने गलता में नाथ पंथी तारानाथ योगी के अभिमान को गलित किया। आमेर के महाराजा पृथ्वीसिंह ने इन्हें अपने गुरु का सम्मान प्रदान किया। पयहारीजी के ब्रह्मलीन होने पर उनके दो शिष्य कील्हदासजी और अग्रदासजी में से बड़े शिष्य कील्हदासजी ने गद्दी को संभाला। शिष्य परंपरा इस प्रकार है-

(1) श्री कृष्णदास पयहारी

 

(2) श्री कील्हदास

 

(3) श्री कृष्णदास (छोटे)

 

(4) श्री विष्णुदास

 

(5) श्री नारायणदास

 

(6) श्री हरिदेवाचार्य

 

(7) श्री रामप्रपन्नाचार्य (मधुराचार्य)

 

(8) श्री हरियाचार्य

 

(9) श्री श्रियाचार्य

 

(10) श्री जानकीदास

 

(11) श्री रामाचार्य

 

(12) श्री सीतारामचार्य

 

(13) श्री हरिप्रसादाचार्य

 

(14) श्री हरिवल्लभाचार्य

 

(15) श्री हरिशरणाचार्य

 

(16) श्री रामोदाराचार्य

 

(17) श्री अवधेशाचार्य (वर्तमान महंत)

धनावंश के नख (उपवंश)

(1) अरछतवाल / हरचतवाल (2) अहलावत (3) आंवला (4) इनाणिया

(5) ओळा (6) कंकरोडिया (7) कड़वासरा (9) कपूरिया (10) कलवाडी

(11) कलवानिया (12) कल्डवालिया (13) कस्वां (14) काकोडिया (15) कालीरावण

(16) कालेरा (17) काल्या (18) कासनिया (19) कुलडिया (20) कूकणा

(21)खदाव/ खद्दा (22) खरबास (23) खर्रा (24) खिलेरी (25) खेदड

(26) खैरवा (27) खोड (28) खोत (29) गढवाल (30) गहलावत (31) गीला (32) गोदारा

33) गोयल (34) गोरा (35) गोलिया (36) घड़घस (37) घासल

(38) घींटाला( / घंटियाला (39) घोटिया (40) चाहर (41) चितौडिया (42 ) चिग्गा

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