भक्त श्री धनाजी एवं धनावंश
अध्याय : पंचम - धनावंश की स्थापना
यह जानना बहुत दिलचस्प है कि धनावंश के पंथ प्रवर्तक भक्त शिरोमणि धनाजी महाराज ने नव पंथ स्थापना के लिए टॉक क्षेत्र के धुआं कलां गांव से चलकर थली प्रदेश की ओर रुख क्यों किया ?
अपने वैकुंठ धाम गमन से पूर्व श्री रामानंदजी ने देश में धार्मिक पंथों के माध्यम से धर्म-अध्यात्म की स्थिति कायम करने के लिए अपने शिष्यों तथा प्रशिष्यों को यह आदेश प्रदान किया कि अनेक पंथों की स्थापना के माध्यम से भारतवर्ष में धर्म का व्यापक प्रसार करना है। वे मुस्लिम आक्रांताओं की हिंदू धर्म विरुद्ध कट्टरता से भीतर ही भीतर दुखी थे। भविष्य पुराण में उल्लेख है कि उन्होंने धर्म परिवर्तन कर मुसलमान हो चुके हिंदुओं को अयोध्या में पुनः कंठी-माला प्रदान कर वैष्णव बना दिया था। भारत की धार्मिक स्थितियों का रामानंद ने गहन अध्ययन किया। वे भारतीय जन का और अधिक अहित नहीं देखना चाहते थे, इसलिए अपने सभी शिष्यों को इस प्रकार की आज्ञा दी कि उदारतापूर्वक अपनी जाति-समुदाय अनुयायियों में धर्म एवं भक्ति का प्रसार करो। न केवल वैष्णव संप्रदायों में यह सीख काम करती रही बल्कि वैष्णेतर अन्य संप्रदाय भी सोलहवीं सदी और उसके बाद भी बड़ी मात्रा में अस्तित्व में आए। रामानंद का भक्ति के क्षेत्र में जो उदार दृष्टिकोण था, उससे अनेक सांप्रदायिक पंथों को आगे बढ़ने की प्रेरणा प्राप्त हुई। ब्राह्मण, क्षत्रिय, शूद्र, जुलाहा, नाई, चमार सभी उनके शिष्य बने। उन्होंने अपने शिष्यों की स्वतंत्र भक्तिधारा को कभी बाधित करने की चेष्टा नहीं की, न ही उन्हें रामावत संप्रदाय में दीक्षित होने के लिए बाध्य किया। "यही कारण था कि रामानंद से प्रेरणा पाकर मध्ययुग में भक्तों का एक ऐसा वर्ग तैयार हो गया, जो पददलित जातियों को समान रूप से भक्ति का अधिकारी मानता था। ऐसे भक्तों में कबीर, रैदास, सेन, धना और पीपा आदि प्रमुख हैं। रामानंद ने स्त्रियों के लिए भी भक्ति का द्वार खोल दिया था। पद्मावती और सुरसुरी उनकी दो प्रसिद्ध शिष्याएं थीं। कहा जाता है कि खान-पान के संबंध में भी रामानंद का दृष्टिकोण बहुत ही उदार था। वे छुआछूत को नहीं मानते थे। लगता है रामानंद हृदय की विशुद्धता पर अधिक बल देते थे, बाह्याचार पर कम।"'
धनाजी जाट जाति से थे। जाटों में उस समय धर्म तथा अध्यात्म की ओर उन्मुखता न के बराबर थी। धनाजी के मन में अपनी जाति की धार्मिक स्थिति को लेकर संकोच था, पर उन्हें गुरु आज्ञा हई कि अपनी जाति समुदाय में धार्मिक संप्रदाय की स्थापना कर उन्हें वैष्णवता का मार्ग दिखलाओ। ऐसी गुरु आज्ञा देने के पीछे भारत भ्रमण कर चके रामानंदजी को भली प्रकार मालूम था कि राजपूताना में जाट एक बड़ी जाति है, किंतु अनेक जातीय नखों में बंटी यह जाति केवल कुछ देवपूजन के अलावा आध्यात्मिक समझ से विरत है। अनेक जनपदों तथा लघु मांझरों में विभक्त जाट समुदाय परस्पर विग्रह तथा अनेक प्रकार की अराजकताओं से ग्रस्त था। बहुलता की ताकत रखने के बावजूद वह अपना संगठित राज्य कायम नहीं कर सकी। तेजा, बिग्गा जैसे वीरों को लोकदेवताओं की मान्यता देने वाली इस जाति में विधिवत वैष्णवता के संस्कार उत्पन्न हो तथा यह बड़ा समुदाय अपनी एक आध्यात्मिक समझ और पहचान कायम करे तथा लोक कल्याण का दृष्टिबोध पैदा हो, इसी उद्देश्य से अनुप्राणित होकर रामानंदजी ने धनाजी को भी जाट समाज में हरिभक्ति का मार्ग प्रशस्त करने की आज्ञा प्रदान की।
किसानी तथा पुशपालन में निमग्न इस जाति को भक्ति-वैराग्य की ओर उन्मुख करना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं था। गुरु आज्ञा थी कि अपनी जाति का कल्याण करो, तो धना के मानस में जाट बाहुल्य थली, सवालख प्रदेश ही आया। किशोरवय से संत समागम, सत्संग आदि करने का आपका अभ्यास रहा था। युवाकाल में ही उन्हें अपनी जाति के लोग तथा ग्राम के दूसरे लोग मोडा (स्वामी) कहने लगे थे। वैराग्य से ओतप्रोत धनाजी को मोडा संबोधन से न व्यंग्य लगता और न ही चिड़ होती। स्वयं उनके खेत की हालिन ने क्रोधवश अपने पति से कहा- "ऊ तो मोड्यो, मांग रु लासी।" 2 मतलब वह तो मोडा (वैरागी) है, मांगकर ले आएगा, पर तू क्या खाएगा ? हालिन के इस कथन से जाहिर होता है कि युवाकाल में ही लोग उन्हें वैरागी समझने लगे थे। ऐसे वैरागी धना के समक्ष अपने ही स्वजातीय बंधुओं में भी वैराग्य भाव पैदा कर देने की सात्विक चुनौती थी। उनके गुरु ने तो बहुत बड़ी चुनौती झेलकर दिग्विजयी यात्रा की थी। धर्मोद्धार के भावों से अनुप्राणित होकर धनाजी ने अपने गांव खैरापुर (वर्तमान धुआं कलां) से निष्क्रमण किया। सत्संग करते-कराते वे साधुपुरा आए। यहां उन्होंने परख के भाव से सत्संग कराई, पर पंथ की बात कह नहीं पाए। इस गांव के सभी जनों ने भगवान के एक महान भक्त का दर्शन पाकर स्वयं को धन्य समझा।
इस समय वैष्णव साधुता धारण किए लोगों का विशेष सम्मान था। साधूपुरा में जाट जाति का बाहुल्य नहीं था। वे थली के उस क्षेत्र में जाना चाहते थे जहां जाट जाति का बाहुल्य हो तथा राजनीतिक द्वंद्र भी कम हो। उस समय ऐसा क्षेत्र थली प्रदेश ही था। थली जाट जाति का विस्तृत भूभाग था तथा अनेक बड़े जाट नखों की यह धरती थी। उस समय थली प्रदेश के संबंध में एक कथन प्रचलित था- 'थळ गोकळ'। यानी थली प्रदेश की पवित्रता ब्रज के गोकुल समान थी। इसी प्रदेश को 'सोन थळी' भी कहा जाता था। अर्थात स्वर्ण प्रदेश। राजस्थान का वर्तमान नागौर, लाडनूं, सुजानगढ़, बीदावाटी का क्षेत्र सोनथली कहा जाता था। थली के निकट का क्षेत्र सवालख कहा जाता था, जिसमें जायल, रोल, मूंडवा, कुचेरा, इनाणा, भाकरोद, भदादा, जनाना आदि क्षेत्र आता था। थली और सवालख दोनों ही जाट बाहुल्य क्षेत्र रहे हैं। कहा जाता है, अकाल या अन्य किन्हीं विषम परिस्थितियों में धनाजी के पूर्वज भी थली से टाँक क्षेत्र में गए थे। धनाजी सत्संग करते-कराते थली क्षेत्र में आए। इस क्षेत्र में उन्होंने कुछ दिन गुजारे। ये ही दिन धनावंश स्थापना की प्रेरणा और आचार बने। वे सबसे पहले लाडनूं क्षेत्र के फिरावांसी गांव में अपने सजातीय लोगों को जीवन के आदर्श आचरण, वैराग्य के सुंदर गुण, भगवद्लीला के आश्रित होने के लाभ, गृहस्थ में रहकर भक्तिमय जीवन जीने तथा अंत में वैकुंठ धाम में भगवान का सायुज्य प्राप्त करने की बात समझाने में सफल हुए। उपस्थित जन उनकी सुंदर एवं कल्याणमयी वाणी सुनकर बहुत प्रसन्न हुए। संतुष्टजनों ने धनाजी से पूछा कि आज हमारे भीतर आपने जो भगवद् संबंधी भाव उत्पन्न किए हैं, वे स्थाई रूप से कैसे बने ? हमें आपने जो श्रीराम मंत्र का उपदेश प्रदान किया है, वह सदा ही हमारा पाथेय कैसे बने, हमारे सभी पाप भस्म कैसे हों, वह उपाय बताएं ? धना समझ गए कि धरणीधर स्वयं ही उनका मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं। उन्होंने कारुणिक होकर कहा कि जो अपने अंगपर तप्त छाप धारण कर लेता है, उसके समस्त पाप स्वतः ही भस्म हो जाते हैं। उन्हें नरकलोक का भय भी नहीं रहता- जो धरणीधर की छाप (तप्त मुद्रा) झेलता है, वह तीन लोक में निर्भय होकर जीवन व्यतीत करता है।
उपस्थित जनों ने धनाजी के समक्ष अपनी और जिज्ञासाएं रखते हुए कुछ आचारों के संबंध में जानना चाहा - धना अधिक कुछ शास्त्रीय और तात्विक बातों को बताने की बजाय वैराग्य जीवन की इक्कीस बातें बताने लगे-
(1) भगवान धरणीधर की ही सर्वत्र लीला है। वे ही हमारे मीत हैं।
(2) अतिथि सेवा में दूजा भाव मत धरो।
(3) हर भूखे प्राणी को भोजन देवो, उसकी पोखना करो।
(4) किसी जीव को मत मारो।
(5) ठाकुरजी का ध्यान ही संध्या-वंदन है, दोनों वक्त संध्या-वंदन करो, यह वैरागी का धर्म है।
(6) साच का साफ और हाथ का साथ करो।
(7) सवेरे का धूप, ध्यान नहाकर करो तो सायंकाल का हाथ-पैर मुंह धोकर।
(8) वैरागी का दर्शन कल्याणकारी है, वैरागी को मान दो।
(9) हरिकीर्तन ही पूंजी है, जितनी इकट्ठी कर सको, करो।
(10) ठाकुरजी के कल्याणप्रद दर्शन के बाद ही सारे कार्य करो।
(11) धर्मात्मा गुरु और भगवान में समान भाव रखो। साध को भगवान कर पूजो।
(12) धरणीधर की छाप ही वैरागी बनाती है। छाप, तिलक, कंठीमाला, चोटी ही वैरागी का आभूषण है।
(13) भगवान का ही नशा करें, अन्य नशा न करें।
(14) चोरी-जारी का गुनाह, बड़ा पाप।
(15) मोटा न्याय भगवान की थळी अर्थात भगवान के मंदिर की चौखट से बड़ा कोई न्याय स्थल नहीं है।
(16) पीपल में विष्णु का वासा अर्थात पीपल लगाएं तथा पीपल का पूजन करें।
(17) हलोतिये चीड़ी-कीड़ी का भाग अर्थात फसल में चिड़ियों एवं चींटियों का भाग होता है।
(18) अमावस-पून्यू थेऊ, अमावस्या पूर्णिमा को थेऊ रखना चाहिए।
(19) ग्यारस का व्रत राखणा अर्थात एकादशी का व्रत रखें।
(20 ) संतोषी है सो ई स्यामी यानी वैरागी को हमेशा संतोष रखना चाहिए।
(21) वैरागी के शोक नाहीं अर्थात वैष्णव को किसी के देवलोक गमन पर शोक नहीं रखना चाहिए। ध्यान रखें कि वह प्राणी भगवद्धरणों में निवास करने गया है।
धनाजी की यह इक्कीस सीख सभी उपस्थित जनों को आत्मोत्थान करने वाली लगीं। उपस्थित लोग धनाजी के अनुयायी बन गए। उन्हें धनाजी की जीवनचर्या भी उत्तम प्रतीत हई। उन्हें लगा कि इस वैरागीपन में बडा सुख है, इन्हीं दिनों में उनका आगमन शोभासर, तंवरा, भीडासरी, खारिया आदि गांवों में भी हुआ। जिन स्वजातीय लोगों को उनके वचनों में विश्वास हुआ, वे उनके अनुयायी बन गए। धनाजी के वचन मानकर उन्हीं के नाम को पंथ का नाम दे दिया। अनुयायियों का यह पंथ धनावंश बन गया। घर में एक व्यक्ति को निहंग भी रखने लगे। कंठी धारण किए देखकर तत्कालीन जागीरदारों, राजाओं ने भी बतौर वैरागी सहयोग और सम्मान प्रदान किया। ठाकुरजी के मंदिरों की स्थापना भी होने लगी। यथासंभव मंदिर का पुजारी निहंग रहा करता, किंतु रहता वह परिवार में ही था तथा परिवार ने कृषि कर्म का भी परित्याग नहीं किया। धनावंश के प्रारंभिक गांवों में साधुपुरो, तरणाऊ, कसूंबी, धोलिया तथा सारड़ी भी है। देखादेखी धनावंश का विस्तार होने लगा। राजाओं की ओर से धनावंशी वैरागी को विभिन्न प्रकार के कर तथा बेगार में भी छूट थी। धनावंशी वैरागी के प्रति राजाओं के मन में यह भावना थी कि वे हमारे पुण्य का वर्धन करते हैं। राजाओं की बहियों में अनेक जगह इस आशय के लेख प्राप्त होते हैं।
संवत 1532 में श्री धनाजी महाराज द्वारा की गई यह यात्रा पंथ स्थापन के निमित्त थी और वे अपने ध्येय में भली प्रकार सफल हुए। गुरुजी को दिया वचन पूर्ण हुआ। निश्चय ही गुरुजी का सूक्ष्म अभौकित वपु प्रसन्न हुआ होगा। एक सहज भक्त के रूप में धनाजी की ख्याति तो चौफेर पहले से ही थी। जाट समुदाय में उनकी भक्ति सुवास धीरे-धीरे प्रसरित होने लगी। न केवल राजस्थान बल्कि दूर-दूर के क्षेत्रों में धनाजी की निर्मल, भक्त छवि प्रसिद्धि पा चुकी थी। भक्तों में एक धारणा बन चुकी थी कि धना के हाथ से चौथाई रोटी का टुकड़ा खा लेने भर से पूर्वकृत विकर्म नष्ट हो जात हैं। 5 भगवद् निष्ठा में आकंठ डूबे धनाजी को अपनी प्रसिद्धि से कोई मोह नहीं था। रामानंदजी ने धनाजी को सीख में यह कहा था-
सहजै सहजैं सब गुण जाइला।
भगवंत भगत ए थिर थाइला ।।
मुक्ति भइला जाप जपीला।
यों सेवग स्वामी संगि रहीला ।।
अमृत सुधा निधि अंत न पाइला।
पीवत प्राण न कदै अघाइला ।।
रामानंद मिली संगि रहला।
जब लगि रस तव लगि पीवेला ।।
धनाजी महाराज किसी शास्त्रीयता के फेर में नहीं पड़े। उन्होंने गुरु आज्ञानुसार सहज भक्ति का ही प्रसार किया। अपने अनुयायियों को गृहस्थ में रहते हुए, भगवद्दास होकर साधपन अंगीकार करने का उपदेश प्रदान किया। कृषि कर्म करते हुए इन श्रद्धासिक्त नव वैरागियों के सम्मुख यह भक्ति मार्ग कोई कठिन नहीं था, बल्कि राहतकारी और सम्मानजनक था। भगवान का दास होकर रहना है, बाकी तो 21 धारणाएं कोई कठिन नहीं थी। भावनाशील लोगों (जाटों) ने साधपन की अंगीकृति में अधिक विलंब नहीं किया। जिस परिवार का मन मांगा और उन्हें इस नव पंथ वरण में सरलता महसूस हुई, उसने धनावंशी साध होने में कोई विलंब नहीं किया। उस समय जन संकुलता अधिक नहीं थी, फिर एक गांव में एक-दो परिवारों ने ही साधपन अंगीकृत किया, किंतु राज्य की ओर से, समाज की ओर से भी यही मान्यता थी कि साध तो गांव में मंदिरों के अनुकूल होने चाहिए। एक-दो मंदिर होने पर उन्हें शासन की ओर से पेटिया, लगान माफी, डोली भूमि जैसी सुविधाएं दी जा सकती थीं। जातीय बहुलता के बावजूद प्रत्येक गांव में एक-दो परिवार इस बात के लिए सहमत हो गए कि वे पूर्ण रूप से खेती एवं पशुपालन जैसे पारंपरिक कार्यों को यथावत रखते हुए साधपन भी रखेंगे और ठाकुरजी का पूजन करेंगे। यह परिवर्तन तत्कालीन शासक वर्ग को अनुचित नहीं लगा, इसलिए उन्होंने कोई दखल इसमें नहीं किया।
धनावंश का प्रवर्तन मोहिलवाटी में हुआ, जहां मोहिल नख के चौहान राजपूतों का राज्य था। मोहिलों की सदाशयता तथा धर्मप्रियता सदैव से रही है। तत्कालीन समय में मोहिल चौहानों का राज्य पूर्व में नेछवा, उत्तर में रिणी, पश्चिम में रासीसर तथा दक्षिण में ओडींट गांव तक था। बताया जाता है कि उस समय मोहिलों के 1440 गांव थे।' छापर और द्रोणपुर गांव मोहिलों की राजधानी थे। बाद में मोहिलों को विजित कर जोधपुर के तत्कालीन शासक राव जोधा के पुत्र राव बीदा इस भूमि पर काबिज हो गए। बीदा के आधिपत्य के उपरांत मोहिलवाटी, बीदावाटी कहलाने लगी। अजब संयोग है कि संवत 1532 में मोहिलवाटी क्षेत्र में धनावंश की स्थापना हई और इसी वर्ष फागुन मास में यानी धनावंश की स्थापना के कुछ माह बाद राव बीदा ने द्रोणपुर पर अपना आधिपत्य कायम किया। इस संबंध में कहा जाता है-
पनरै सौ बत्तीस में, फागण मास उजाळ।
बीदै दाब्यो द्रोणपुर, ग्यारस बार गुरुवार ।।
हालांकि बीदा द्वारा मोहिलवाटी को जीतने के संवत के संबंध में इतिहासकार एकमत नहीं है। कुछ इतिहासकार संवत 1541 में राव बीदा का राज्य स्थापित होना मानते हैं। वस्तुतः मोहिलों ने हार के बाद भी अपने राज्य को पुनः प्राप्त करने के प्रयास छोड़े नहीं। इतिहासकार मुहणोत नैणसी के अनुसार इस धरती पर लगभग 900 वर्षों तक मोहिलों का राज्य रहा। मोहिलवाटी में लाडनूं सबसे प्राचीन शहर था। चांपा सामौर की वंशावली के अनुसार चौहानवंश बागड़ प्रदेश से इस क्षेत्र में आया और दररेवा के चाहिल, सीकर के जोड़ तथा निर्वाण और छापरवाटी के मोहिल चौहानों के रूप में यह जाति विभक्त हो गई। कर्नल टॉड के अनुसार मोहिल तत्कालीन राजपूताना के 36 प्रमुख राजकुलों में से एक थे। उस समय मोहिलों के संबंध में यह कहा जाता था कि-
मोहिल मोटा राजवी, ठकुराई ठावे।
छापर ताल चरंतियां, भटनेर ने भावे ।।
मोहिलों ने बागड़ियों, जोहियों तथा जाटों से भी एक बड़ा भूभाग छीना। उस समय मोहिल एक बहुत बड़ी राजनीतिक शक्ति थी। मेवाड़ के शासक राणा कुंभा ने भी मोहिलों से वैवाहिक संबंध स्थापित किए और राव जोधा ने भी अपनी पुत्री का विवाह मोहिल अजीत के साथ किया और बाद में मोहिलवाटी को प्राप्त करने की नीयत से उसका छलपूर्वक वध किया। यहां हमारा उद्देश्य मोहिलवंश के इतिहास को प्रस्तुत करना नहीं है, वरन तत्कालीन राज्य सत्ता के आलोक में यह बताना है कि इस क्षेत्र में धनावंश का प्रचार-प्रसार तथा संगठन बिना किसी राजनीतिक हस्तक्षेप के हुआ और बाद में यह आगे से आगे विस्तार पाता गया। हर जगह सत्तापक्ष चाहे राजा हो या जागीरदार उनकी अनुग्रहपूर्वक भावना धनावंश के साथ रही। धीरे-धीरे एक-एक गांवों में धनावंशी परिवारों की वृद्धि होती गई तो समाज ने धार्मिक पंथ के दृष्टिकोण से एक-एक कर महंतद्वारों की स्थापना भी की। परिवारों में जो एक व्यक्ति निहंग रखने की परंपरा थी, धीरे-धीरे वह परंपरा ध्वस्त होकर केवल महंतों के निहंग रहने तक महदूद हो गई। पैंतीस धनावंशीय गांवों के गुरु पक्षीय धार्मिक संस्कारों को संपन्न कराने के लिए एक-एक महंत मंडल बनाया गया। एक मंडल महंत की अपने क्षेत्र के धनावंशी समुदाय पर गहरी पकड़ थी तथा परिवार के प्रत्येक सदस्य को तुलसी की कंठी पहनाकर महंत उसे वैष्णवी दीक्षा प्रदान करने तथा सुगरा बनाने का कार्य करते। महंत गुरु के रूप में प्रत्येक शिष्य को एक गोपनीय तारक मंत्र प्रदान करता। महंतजी से कंठी लेने का चाव सात-आठ वर्ष के बालक में ही पैदा कर दिया जाता। पारंपरिक तप्त छाप लेने के लिए युवा अपने घरवालों को बिना बताए द्वारिका अथवा अयोध्या को चले जाते। बाहु पर जन्मभर दिखने वाली तप्त छाप उसके पक्का वैष्णव होने का प्रमाण हुआ करती थी। तप्त छाप, कंठी, तिलक आदि का विस्तृत विवरण आगे प्रस्तुत करेंगे।
धनाजी ने अपने अनुयायियों को परमोपासक के रूप में सीतारामजी, राधाकृष्णजी, नृसिंहजी, चतुर्भुज आदि किसी भी वैष्णव स्वरूप पर अपनी श्रद्धा टिकाने का आदेश दिया। धनाजी की भक्ति सखा भक्ति थी। उनका मानना था कि परमात्मा से मैत्री भाव स्थापित कर उन्हें शीघ्र प्रसन्न किया जा सकता है। भक्ति के आदर्श उच्चतम होने चाहिए तथा भगवद् स्मरण से आत्म परिष्कार किया जा सकता है। धनावंश पंथ संस्थापन के थोड़े ही काल पश्चात धनाजी इस लोक का परित्याग कर गए। कालांतर में सभी संप्रदायों में अन्य धार्मिक मत, दर्शन और मान्यता के प्रभाव पड़ते ही हैं, धनावंश में भी अनेक तरह के परिवर्तन एवं शैथिल्य के भाव देखे गए हैं।
लाडनूं क्षेत्र में धनाजी की आवभगत
धुआं कलां क्षेत्र से चलकर श्री धनाजी महाराज जब लाडनूं क्षेत्र में आए तो उन्हें स्वप्रेरणा हुई कि धार्मिक उन्नयन के लिए यह क्षेत्र उपयुक्त है, इसलिए अपने स्वजातीय जनों को साधपन के गुणों से अवगत कराया जा सकता है। इस क्षेत्र के अधिपति मोहिलों की यशगाथा उन्होंने सुन रखी थी। "मोहिलों की धार्मिक आस्था बढ़ी-चढ़ी थी, अतः उन्होंने अपने हिंदू देवी-देवताओं के मंदिर अपने शासित भूभाग में बनवाए।"' 1440 गांवों के अधिपति होने के बावजूद मोहिलों को अभिमान छू तक नहीं गया था।
वे जब फिरवांसी गांव में आए तो उन्होंने साधपन धारण करने के मंतव्य से कतिपय जाट परिवारों को अवगत कराया तो उन्हें धनाजी की बातें कल्याणकारी प्रतीत हई। इससे धनाजी का भी उत्साहवर्धन हुआ। अपनी जाति के कुछ परिवारों की धार्मिक संस्कार धारण करने की मंशा से उन्होंने निकट के अन्य गांवों में भी जाने का निश्चय किया। हिंदी-राजस्थानी के प्रख्यात साहित्यकार तथा लाडनूं क्षेत्र के सुदीर्घकालीन इतिहास विवेचक श्री भंवरसिंह सामौर का कथन है-" उस युग के महान ईश्वर उपासक धना भक्त ने नीतिवान एवं उदार मोहिल शासकों से प्रभावित होकर अपने जीवन का उत्तरार्द्ध मोहिलवाटी में व्यतीत करने का निश्चय किया। धना भक्त टोंक क्षेत्र के अपने पुश्तैनी गांव से रवाना होकर मोहिलवाटी के फिरवांसी गांव से तंवरा नामक गांव में पहुंचे।" 8
इतिहासकार सामौरजी की यह बात सत्य है। धनावंश की स्थापना का प्रारंभिक कार्य फिरवांसी में शुरू हुआ, किंतु किसी एक गांव के दो-चार परिवारों से संप्रदाय स्थापना की नींव तो लग गईं, पर उसे विस्तार भी दिया जाना था। पूर्व काल में संत लोग वैसे भी अनेक गांवों में पहुंचा करते थे, इसलिए धनाजी फिरवांसी से तंवरा गांव में पहुंचे। तंवरा में उनका अभूतपूर्व स्वागत हुआ।
उस समय तंवरा गांव चारण जैतसी सामौर के पट्टे में था। अभूतपूर्व भक्त के रूप में धनाजी की ख्याति उस समय कम नहीं थी। कुतुहलवश भी लोग उन्हें देखने के लिए आते कि कैसे भक्त हैं, जिन्होंने बिना बीज खेती निपजाई और ठाकुरजी को सदेह अपने सामने बैठाकर भोजन करवाया। ऐसे भक्त के दर्शनों की खातिर कोई क्यों न लालायित होता।
सामौर जैतसी उस समय कसूंबी के पट्टेदार थे। उन्होंने कसूंबी में अपनी कोटड़ी स्थापित कर वहां माताजी का मंदिर करवाया तथा चार सौ वर्ष लगभग पहले संतन बोहरा नामक महाजन ने जो ठाकुरजी का शिखरबंध मंदिर करवाया था, उसकी मरम्मत करवाई। जैतसी उच्च कोटि का कवि तथा अत्यधिक धार्मिक विचारों का व्यक्ति था। जैतसी सामौर के प्रति अनेक दोहे प्रचलित हैं, जिनमें करूंबी का भी वर्णन है। उनके प्रति कहा गया एक दोहा प्रस्तुत है-
खरो कवेसर खंड में, (ज्यांरी) होड न किण हूं होय।
चकवै आखै चारणां, जैत करूंबी जोय ।।
भंवरसिंह सामौर के कथानुसार- "जैतसी सामौर को धना भक्त के पहुंचने की सूचना मिली तो वे उनके स्वागत के लिए तंवरा ग्राम में आए। वहां धना भक्त के दर्शन कर अभिवादन के रूप में यह दोहा कहा-
आज जैतसी ऊजळो, धारण चरण धनेस।
पांण जोड़ आखै प्रगट, अलख पुरख आदेस ।।
धना भक्त ने जैतसी सामौर को आशीर्वाद दिया। जैतसी ने धना भक्त को तंवरा गांव भेंट करने का प्रस्ताव दिया तो धना भक्त ने हंसते हुए कहा-अपने से दूर क्यों रखना चाहते हैं?"
चौहानवंशीय मोहिल राजाओं का प्रारंभ से सामौर चारणों के साथ अटूट साथ रहा। मोहिलवाटी के इतिहास ग्रंथों में वर्णन मिलता है कि मोहिल चौहान ने अपने साथ सहयोग करने वाले रांण सामौर को उस समय का सबसे बड़ा पुरस्कार क्रोड़ पसाव प्रदान करते हुए अपने शासन के पांच गांव प्रदान किए थे। उन पांच गांवों में करूंबी का एक बास, रंगीली, लैड़ी, हरमगरी तथा तंवरा गांव था। रांण सामौर मोहिल राजवंश का पोलपात बारहठ था। सामौरों को विरुद प्राप्त था- 'तेजल दादा जैतसी, सत साचा सामौर'। कहते हैं कि जैतसी सामौर के वचन से तत्कालीन मोहिल शासक अपने वैवाहिक संबंध स्थापित करते। मोहिलों ने सामौर चारणों को 1500 बीघा भूमि कसूंबी के पश्चिमी भाग में प्रदान की। 10 आज जसवंतगढ़ भी उसी भूमि पर बसा हुआ है। मोहिलों की दातारी पर बहुत उल्लेख प्राप्त होते हैं। मोहिल राणा मेघा के बाद में वैसरसल छापर की गद्दी पर बैठा। उसकी दानवृत्ति की प्रशंसा करते हुए चांपा सामौर ने दोहा कहा है-
मोहिल दाता मोहरी, जस गाहक गुण जाण।
सुकवि पालण वैरसल, मेघावत महराण ।।
सामोर जैतसी भक्तप्रवर धनाजी का आशय समझ गए। उन्होंने धनाजी को कसूंबी पधारने का आग्रह किया, जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकार कर लिया। श्री भंवरसिंह सामौर का इस संबंध में कथन है कि "जैतसी सामौर अपना अहो भाग्य मानकर उन्हें सहर्ष कसूंबी ले आए। कसूंबी में सामौर बावड़ी के निकट स्थित ठाकुरजी मंदिर परिसर धना भक्त पधारे तो यह स्थान उन्हें पसंद आ गया। वहीं उन्होंने अपना आसन लगा लिया। वहीं उनके निवास की स्थाई व्यवस्था की गई। इस अवसर पर जैतसी सामौर ने फिर एक दोहा उनकी सेवा में प्रस्तुत किया-
आज कसूंबी ऊजळी, धिन धिन गुरां धनेस।
ओ पगफेरो आपरो, रहसी याद हमेस।।"
धनाजी को सम्मानपूर्वक धनेष्ठ, धनेश कहने की उस समय सम्मान की परंपरा थी। रामानंदजी ने धनेष्ठ का संबोधन किया। जबकि 'रामानंद दिग्विजय' में 'भव्यगुणो धनेशः' कहा गया। 12
धनाजी महाराज का करूंबी प्रवासकाल अनेक प्रकार से महत्त्वपूर्ण माना जाता है। फिरवांसी, तंवरा से प्रारंभ हई धनावंशी संप्रदाय स्थापना यात्रा कसंबी में आकर परिपक्व हुई। धनाजी को भी यहां आकर प्रसन्नता प्राप्त हुई, क्योंकि कसूंबी का वातावरण बहुत सुंदर तथा यह धार्मिक प्रभाववाला गांव था। कहते हैं, इस बड़े गांव के पहले सात बास थे। वर्तमान में इसके चार बास प्रमुख हैं, जिनके नाम क्रमशः अलीपुर, जाखला, उपाधड़ा तथा नीलियां हैं। धनाजी जहां ठहरे, वह मंदिर अलीपुर में था। कसूंबी के इस मंदिर का निर्माण विक्रम की तेरहवीं शताब्दी के प्रथम दशकों में साहूकार संतन बोहरा ने करवाया था। प्रस्तर खंड से बना यह मंदिर बहुत सुंदर था। आज भी इसके उपेक्षित पड़े प्रस्तर खंड इसकी भव्यता की कहानी कहते हैं। पूरी तरह टूट चुका या तोड़े जा चुके इस मंदिर के कलात्मक स्तंभ, कलात्मक फलक इधर-उधर बिखरे पड़े हैं तथा यह भूमि लोगों के अधिकार में आ चुकी है। इसी भग्नावशेष मंदिर के निकट वह बावड़ी आज भी मौजूद है। कसूंबी के धार्मिक वातावरण का ही असर है कि यहां ठाकुरजी के छह मंदिर हैं। एक प्राचीन हनुमत मंदिर परिसर में अनेक संतों की समाधियां तथा उन पर गड़े चरणचिह्न इस बात का द्योतक है कि यहाँ वैष्णवी साधु-संतों का प्राचीन समय (तीन-चार शताब्दियों) में वर्चस्व रहा।
जब हम संतन बोहरा द्वारा निर्मित शिखरबंद मंदिर तथा बावड़ी का उल्लेख कर रहे हैं तो हमें उनके संबंध में थोड़ा और जान लेना समीचीन होगा।
राणा मोहिल (12वीं शताब्दी) मोहिल को बागड़ियों से छापर-द्रोणपुर का राज्य प्राप्त करने में संतन नाम के एक बोहरा (साहूकार) से बड़ी मदद प्राप्त हुई। संतन ने अपनी अपार संपदा प्रदान कर मोहिल चौहान को सोलह हजार सैनिकों की फौज खड़ी करने में अपना योगदान प्रदान किया। इस फौज की मदद से राणा मोहिल को छापर-द्रोणपुर का राज्य मनोवांछित ढंग से प्राप्त हो गया।
राणा मोहिल ने संतन से उधार ली हुई रकम का चुकारा किया तथा उसे करूंबी सहित पांच गांवों की जागीर भी प्रदान की। कहते हैं संतन ने करूंबी गांव का बहुत विकास किया। संतन ने करूंबी गांव में एक बावड़ी तथा उसके निकट ठाकुरजी के मंदिर का निर्माण करवाया। मंदिर में प्रयुक्त अलंकृत पत्थरों को देखकर सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि उस काल में उसने यह कितना भव्य मंदिर बनवाया होगा। संतन के चार सौ वर्ष बाद इसी मंदिर का जीर्णोद्धार जैतसी सामौर ने करवाया था। यह मंदिर संवत 1250 के आस-पास बना था। प्राचीन समय में यहां तेरहवीं शताब्दी के कतिपय शिलालेख भी विद्वानों ने पढ़े थे। मोहिल और संतन वोहरा की पारस्परिकता का वर्णन मुहंता नैणसी ने भी किया है।
कसूंबी और धनाजी महाराज के नाते को व्याख्यायित करने के कुछ और ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध हैं। प्रख्यात इतिहासकार श्री गोविंद अग्रवाल द्वारा रचित चूरू मंडल के शोधपूर्ण इतिहास में जैतसी सामौर द्वारा धनाजी को दी गई इस ऐतिहासिक जगह का वर्णन धना जाट के खेत के रूप में किया गया है। उन्होंने लिखा है कि, "कसूंबी गांव अब लाडणूं तहसील के अंतर्गत है। नैणसी के अनुसार चौहान मोहिल ने यह गांव संतन वोहरा को दिया था। संतन ने यहां एक बावड़ी और एक शिखरबंध मंदिर का निर्माण कराया था। बावड़ी अभी मौजूद है, जिसे गांववाले पी-बावड़ी कहते हैं। बावड़ी के निकट ही शिखरबंध मंदिर था, जिसके अवशेष दिखलाई पड़ते हैं। नजदीक ही जबरा, धन्ना आदि जाटों के खेत हैं, जिनमें शिला निर्मित चार दीर्घाकार घाने पड़े हैं।" 13 इतना ही नहीं, ठाकुरजी के इस मंदिर के संबंध में गोविंद अग्रवाल आगे लिखते हैं- "इसकी दक्षिणी दिशा में एक अन्य बावड़ी है, जिसको 'डेढ बावड़ी' कहते हैं। (वर्तमान में यह बावड़ी धनावंशी स्वामी के खेत मध्य है।) दोनों के बीच लाल पत्थर का एक कीर्ति स्तंभ खड़ा है, जिस पर धनुर्धारी राम-लक्ष्मण व सीता दिखाई पड़ते हैं, लेख के अक्षर सर्वथा घिस गए हैं। इसके नजदीक ही एक अन्य कीर्ति स्तंभ है, लेकिन उस पर लेख नहीं है... धना जाट के खेत में लाल पत्थर की एक और देवली है।" 14 उपरोक्त विवरण को पुष्ट करते हुए सामौर साहब का आलेख है- "धना भक्त ने कसूंबी से ही अपने अभियान की शुरुआत की। तत्कालीन जनमानस को उन्होंने उद्बोधित किया। धर्म परिवर्तन (मुस्लिम शासकों द्वारा) के उस कठिन दौर में मनुष्य के आत्मगौरव को डिगने से बचाया। यह समाज को उनकी अपूर्व देन है। उन्होंने अपने अनुयायियों को 'धनावंशी स्वामी' के रूप में एक नई पहचान देकर एक पंथ के रूप में विस्तार दिया। धना भक्त को ही यह श्रेय है कि उन्होंने ही सर्वप्रथम 'धनावंशी स्वामी पंथ' की स्थापना की। फिर तो राजस्थान में उनके अनुकरण पर सैंतीस पंथों की स्थापना हई पर अग्रणी धनावंशी ही रहे। धनावंश स्वामी पंथ में निहंग संन्यासी व गृहस्थ स्वामियों को समान महत्त्व मिला। जैतसी सामौर के वंशजों ने आगे चलकर बोबासर, लोढसर व बड़ाबर आदि गांव बसाए तो उन गांवों में उन्होंने जो मंदिर बनाए उनमें पुजारी की नियुक्ति भी कसंबी वाले मंदिर के महंत ही करते थे। 15
लाडनू के इतिहास में उल्लेख आया है कि "जाटों में हुए प्रसिद्ध भक्त धना के अनुयायी धनावंशी साध (स्वामी) कहलाते हैं। परसोजी से परसवंशी साधों का संप्रदाय चला। ये जाति के बढई (खाती) थे। ये सभी पंथ प्रवर्तक संत इस प्रदेश के ग्रामीण परिवेश की उपज हैं। ये इतिहास की उस विषम बेला में हए जो मध्यकाल के म से जानी जाती है। इन संतों ने जनमानस को उद्बोधित किया और धर्म परिवर्तन के उस कठिन दौर में आम आदमी के आत्मगौरव को डिगने से बचाया। इनकी इतिहास और संस्कृति को अमूल्य देन है।" 16 नाम से
धर्म और अध्यात्म में रुचि रखने वाले जाट परिवारों ने धनाजी महाराज के प्रति अपनी आस्था प्रकट की। न केवल फिरवांसी, तंवरा और कसूंबी के कुछ जाट परिवारों ने धनावंशी होना स्वीकार किया, बल्कि शोभासर, खारिया, भीड्यासरी, धोलिया, सारड़ी, लैड़ी से भी कुछ परिवार धनाजी से गुरुमंत्र प्राप्त करने आए। बाद में तो अनुयायियों की संख्या बढ़ने लगी, जिन्हें साधपन अपनाना कल्याणकारी लगा, उन्होंने इसे सहर्ष स्वीकार किया। इस प्रकार धनावंश पंथ का विस्तार होने लगा। धनावंश पंथ अंगीकार करने वाले साधों को तत्कालीन राजपूत शासकों ने सम्मान प्रदान किया। बड़ी संख्या में ठाकुरजी के मंदिर बनने लगे तथा पुजारी परिवार को शासकों ने खेती की भूमि भी डोळी के रूप में देनी प्रारंभ की। शासकों द्वारा अनेक करों तथा बेगार में छूट प्रदान की गई। महंतद्वारों की स्थापना होने लगी। कसूंबी, खारिया दोनों महंतद्वारे एक ही काल में बने।
फिरवांसी गांव के कालेरा जाति के जाट बेहद दयालु, साधजन हितैषी तथा धार्मिक भावना रखने वाले थे, उन्हें धनाजी की एक-एक बात में प्रीति होने लगी। गांव में यह समृद्ध जाति थी, इसलिए पूरे गांव में इसका दबदबा भी था। फिरवांसी का तत्कालीन ब्यौरा विस्तारपूर्वक प्रस्तुत है।
धनावंश का जन्मस्थल - फिरवांसी
फिरवांसी गांव भले ही नागौर जिले की लाडनूं तहसील में स्थित है, किंतु वह सीकर एवं नागौर जिले की संधि का गांव है। गांव का अधिकांश हिस्सा नागौर जिले में तथा कुछ भाग सीकर जिले में है। धनावंश की स्थापना के पीछे धनाजी को गुरु आज्ञा थी। वे उसके पालनार्थ ही उत्तर दिशा को निकल गए। घूमते-घूमते फिरवांसी में वे कालेरा नख के एक जाट परिवार में पहुंचे तो उन्हें इस परिवार में धार्मिक संस्कार दिखाई दिए तथा यह एक बड़ा परिवार था, जिसके संबंध में कहा जाता है कि खेती के समय घर के इतने लोग खेत में सामूहिक कार्य करते थे जिनकी भोजन प्रसादी बैलगाड़ी पर लादकर ले जानी पड़ती। धनाजी यहां रुके तो उन्होंने देखा कि कालेरा परिवार की सुरुचि भगवद्धर्चा में है। संवत 1532 को रामनवमी के शुभ दिन धनाजी ने ईश्वर अनुग्रह की बातें बताईं तो इस परिवार को अच्छी लगीं। सद्गृहस्थ रहते हुए साधपन अपनाने का आग्रह भी इस परिवार ने सहज स्वीकार किया। धनाजी महाराज अपने साथ कुछ शालग्राम विग्रह लेकर आए थे। उन्होंने कतिपय आचरण की बातें-नियम आदि बताने के बाद एक पीले रंग का शालग्राम इस परिवार को पूजा करने के लिए सौंपा और कहा कि जो शालग्राम को पूजता है, उस वैरागी के लिए ईश्वर की प्राप्ति कठिन नहीं है। कालेरा परिवार इस बात से परिचित था कि धनाजी महाराज ने तो बाल्यकाल में शालग्राम की पूजा कर भगवान को अनेक दिनों तक साक्षात चूरमें का प्रसाद कराया था। एक-दो रोज में ही कालेरा परिवार धनाजी का पक्का अनुयायी हो गया और उन्होंने कहा कि आज से हम आपके इस धनावंश की मर्यादाओं का पूरा पालन करेंगे और अपने निकट रिश्तेदारों को भी परमात्म प्राप्ति के इस मार्ग में लाएंगे। दो-तीन दिन बाद धनाजी ने जब निकट के गांव तंवरा की ओर प्रस्थान किया तो कालेरा परिवार तंवरा तक उनके साथ आया तथा वहां के खिलेरी गोत्रीय जाट परिवार को धनाजी महाराज के व्यक्तित्व से परिचित कराया तथा उनके पंथीय मंतव्य से अवगत कराया। तंवरा में भी कुछ परिवारों ने साधपन लिया, अर्थात गृहस्थ में रहते हुए तथा खेती करते हुए वैराग्य अपना लिया। तंवरा के जागीरदार चारणों ने भी धनाजी का स्वागत किया। बाद में धनाजी तंवरा से करूंबी गांव चले गए। कसूंबी में रहते हुए उन्होंने निकट पड़ौस के अनेक गांवों के जाटों को धनावंश पंथ की महत्ता बताते हुए, इसमें शामिल कर वैरागी बनाया।
धनाजी का निवास एक प्राचीन ठाकुरजी के मंदिर में था। उस मंदिर के निकट में प्राचीन बावड़ी थी, जिसका जल वे अपने ठाकुर के चढ़ाते। धनाजी के सानिध्य में अन्य अनेक विरक्त साधू भी रहा करते। मंदिर के निकट ही जैतसी सामौर ने उन्हें एक खेत प्रदान किया था, जो धनाजी के खेत (धना जाट का खेत) के रूप में प्रसिद्ध हुआ। 17
धनाजी का महाप्रयाण
धनाजी महाराज कसूंबी गांव में लगभग सवा वर्ष रहे। संवत 1533 की आषाढ़ सुदी अष्टमी को उन्होंने अपने पास रहने वाले एक-दो वैरागियों को कहा कि कल वे इस संसार से प्रयाण कर अपने खाविंद धरणीधर के पास जाएंगे। उन्होंने अपने गुरु के बताए कार्य को कर डाला है। ठाकुरजी में श्रद्धा रखने वाले जाट इस पंथ को समृद्ध करते रहेंगे और धर्म की ज्योत को जगाए रखेंगे। आषाढ़ सुदी नवमी को वे ब्रह्ममुहूर्त में उठे। बावड़ी से पानी लाकर स्नान व नित्यकर्म किया। साथ रहने वाले वैरागियों को कहा कि वे महानिर्वाण यात्रा पर जा रहे हैं, कोई भी उनके पीछे नहीं आए। साध धर्म का पालन करते रहो। ब्रह्ममुहूर्त में वे करूंबी से उत्तर दिशा की ओर निकल गए और देखते-देखते अदृश्य हो गए।
दिन उगने के बाद जब गांव के लोग मंदिर आए और स्वामीजी के संबंध में पूछा कि वे क्यों नहीं नजर आ रहे। तब वैरागियों ने कहा कि वे महानिर्वाण यात्रा पर जाने की बात कहकर आज प्रातः उत्तर दिशा में निकल गए हैं। गांव के लोगों को विश्वास ही नहीं हुआ। उन्होंने सोचा अभी तो धनावंश शैशवावस्था में है, अभी इसे और आगे ले जाने की आवश्यकता थी।
उनके पदचिह्नों को देखते हुए लोग उन्हें ढूंढ़ने निकले लेकिन बहुत दूर उनके जाने के कोई चिह्न नहीं मिले। आषाढ़ सुदी नवमी के दिन पाताल के अधिष्ठाता बलि के अवतार कहे जाने वाले धनाजी महाराज परमात्मा में ही समा गए। ठाकुरजी की लौ ठाकुरजी में मिल गई।
जाट समाज और धनावंश
धनाजी महाराज अपनी भक्ति में इतने निमग्न रहे कि उन्हें गुरुजी द्वारा निर्देशिन पंथ संस्थापन को बहुत वर्षों तक समय ही नहीं मिला, किंतु अपने देवलोक गमन में पूर्व जब रामानंदजी ने पुनः धनाजी को यह याद दिलाया कि उन्हें अपने जातीय समुदाय में धर्म प्रभावना का प्रसार करने के लिए प्रयास करना चाहिए। अंततः वह समय संवत 1532 को आया और वे उत्तर दिशा के थली प्रदेश में पंथ संस्थापन की दृष्टि से आ गए।
यह निर्विवाद है कि धनाजी महाराज जाट जाति से थे। धनाजी के काल में यह कृषक जाति उत्तरी पश्चिमी राजस्थान में जन बहुल रूप में थी। सैकड़ों गोत (जातीय नख) में बंटी हुई जाट जाति बड़ी संख्या में होने के बावजूद घोर पारस्परिक फूट के कारण अपनी स्वतंत्र सत्ता स्थापित नहीं कर पा रही थी। उस काल की राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक स्थितियों को जानना चाहिए। तत्कालीन राजपूताने का यह क्षेत्र रेतीला था, तनिक भी सींचित न होने के कारण हर एक-दो वर्ष बाद अकालों का सामना करना पड़ता था, सारा जीवन पशुपालन और खेती पर टिका हुआ था। शासक के रूप में राजपूत राजा थे, उनके कहे युद्ध भी लड़ना पड़ता था और अनेक प्रकार के कर भी चुकाने पड़ रहे थे। जीवन अत्यधिक विषम था। अनेक मान्यताओं और अंधविश्वासों से ग्रसित था यह युग। स्वभाव में सच्चाई के अलावा भोलापन और अखड़ता भी थी। इस क्षेत्र की तत्कालीन परिस्थितियों का वर्णन अनेक प्रकार से किया गया है। कबीर के एक पद में भी इसका वर्णन है। 18
तत्कालीन समय के राजपूताने का कोई एकल नाम नहीं था। यह भौगोलिक नामों से ही अधिक पहचाना जा रहा था, जैसे सवालख, थली, बागड़, मगरा, माड, मेदपाट, जांगळ आदि। थली के ही एक भाग को मोहिलवाटी और बाद में बीदावाटी के नाम से पहचाना गया। जांगलू क्षेत्र में पहले सांखला (परमार) राजपूतों का राज्य रहा, बाद में राठौड़ों का आधिपत्य हो गया। सांभर, अजमेर का क्षेत्र सपादलख (सवालख) कहलाता था, यहां चौहान राजपूतों का अधिकार था। नागौर पट्टी भी सवालख क्षेत्र के अंतर्गत थी। बीदावत राठौड़ों के आगमन से पूर्व छापर, द्रोणपुर, चरलू का क्षेत्र मोहिल चौहानों के अधिकार में होने के कारण मोहिलवाटी कहलाता था। इतिहासकार नैणसी के कथनानुसार मोहिलों ने यहां लगभग नौ सौ वर्षों तक राज्य किया। संवत 1532 में उनसे राठौडों ने यह प्रदेश छीन लिया। 19 पूगल क्षेत्र में भाटी राजपतों का राज्य था, उनका राज्य जैसलमेर तक फैला हुआ था। जैसलमेर क्षेत्र को माड धरा कहा जाता था। इस काल में भटनेर पर भाटी, चायल, जोहिया जाति के मुसलमानों का राज्य था। बाद में राव बीका ने इसे अपने अधिकार में लिया।
दयालदास की ख्यात में राव बीका के आने से पूर्व के थली और बागड़ क्षेत्र में जाट जाति के मजबूत परगनों का वर्णन मिलता है। 360 गांवों पर गोदारा नख के जाटों का भोमियाचारा, शेखसर, लाधड़िया प्रमुख ठिकाना, मुखिया पांडू गोदारा पुत्र हिंदू का। 360 गांव कसवों के, कंवरपाल मुखिया तथा सीधमुख ठिकाना, 360 गांव बैणीवालों के, रासलाणा ठिकाना तथा रायसल मुखिया, पूनिया गोत के भी 360 गांव, कान्हा मुखिया, बड़ी लूंदी ठिकाना, सिहाग गोत के 140 गांव, सूई ठिकाना और चोखा मुखिया, सोहूवों के 84 गांव, धाणसिया ठिकाना और अमरा मुखिया। इसी समय खीची, खरला, वागोड़ा, सांखला, जोहिया, चौहानों का भी कई गांवों पर भोमियाचारा था। सारे गांव तीन हजार से अधिक थे जिन पर राव बीका का आधिपत्य हुआ। 20 ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार थली, बागड़ तथा सवालख क्षेत्र के अधिकांश गांव इन जाटों ने ही बसाए। जाट जाति पर सर्वाधिक शोधपूर्ण कार्य करने वाले विद्वान डॉ. पेमाराम ने जाट जाति की परिभाषा इस प्रकार की है-
"जाट शब्द की उत्पत्ति संस्कृत भाषा में जट्ट शब्द से हुई है। 'ज' का अर्थ है विजेता। उत्पादनकर्ता तथा अट्ट का अर्थ है, घुमंतुपन अर्थात जलीय क्षेत्रों में घूमकर अन्न उत्पादक समुदाय को जट्ट कहा गया है। बाद में विभिन्न भाषाओं में इसका प्रयोग आरंभ हुआ। अतः इस शब्द का विभिन्न भाषाओं में भिन्न-भिन्न अर्थ होना स्वाभाविक है। संस्कृत में जट्ट, प्राकृत में जाथर। जाट अरबी में जुत, फारसी भाषा में चयनापा और तारीख ए मासूमी में जाट, चीनी में युती, यूरोप में जेती या जटिया, रोम में गाथ या गात, लेटिन भाषा में गेटी तथा हिंदी में जाट नाम से प्रसिद्ध है। 2" डॉ. कालिकारंजन काननूनगो का मानना है कि जाट शुद्ध रूप से आर्य हैं। 22
जाटों का इतिहास लिखने वाले ठाकुर देशराज का भी मंतव्य उपरोक्त प्रकार का रहा है और यह तथ्य वे जाटों की शारीरिक बनावट, रूप-रंग के आधार पर दे रहे हैं। विभिन्न जाट इतिहासों में इस जाति की उत्पत्ति, निवास स्थान के संबंध में विस्तार से वर्णन प्राप्त होता है, किंतु यहां हमारा मंतव्य इस जाति के विस्तार वर्णन में जाने का नहीं है। चूंकि सभी धनावंशी स्वामी संत-भक्त धनाजी के अनुयायी जाट जाति से बने, इसलिए इस जाति का सांदर्भिक वर्णन हम यहां कर रहे हैं।
राजस्थान की विभित्र जातियों का इतिहास लिखने वाले श्री बजरंगलाल लोहिया के अनुसार, "राजस्थान में जाति की दृष्टि से सबसे अधिक संख्या जाटों की थी। राजपूतों से भी इनकी संख्या अधिक रही है।" 23 बड़ी जाति होने के बावजूद, इस जाति ने उस काल में अपने संख्या बल पर अधिक ध्यान नहीं दिया और न ही प्रशासनिक महत्त्वाकांक्षा रखकर साम्राज्य की कामना रखी। अपने खेती और पशुपालन के पेशे से पूर्णतया संतुष्ट रहने वाली इस जाति का खेतिहर वर्ग के साथ सहयोग और भ्रातृत्व का भाव रहा। अधिक महत्त्वाकांक्षी न होने के कारण यह राज्याश्रित ही रही। विश्नोई संप्रदाय का इतिहास रचने वाले विद्वान डॉ. हीरालाल माहेश्वरी इस संबंध में अपने विचार इस प्रकार से प्रकट करते हैं, "विष्णोई अधिकांशतः जाट जाति से बने हैं। विष्णोई रचनाओं से जहां समूचे समाज की विभिन्न दशाओं का पता चलता है, वहां जाटों से संबंधित कतिपय विशिष्ट बातों का भी पता चलता है। वे शीघ्र ही उत्तेजित हो जाने वाले, लड़ाकू, झूठे, मूर्ख और अज्ञानी थे। वे न पवित्रता रखते, न स्नान करते, न 'जीकारा' देकर बोलते और सुभाषण तो करते ही नहीं थे। हो, हो करके जोर से बोलते थे। वे बुरी-बुरी आदतों के शिकार थे।" 24 जाटों के संबंध में रिपोर्ट मरदुमशुमारी राज मारवाड़ सन 1891 में भी इसकी प्राचीन उत्पत्ति के अनेक लेख दिए गए हैं। उसमें इसे 'मोकळ मुंडी' जाति कहा है, जिसका तात्पर्य होता है, जो आए सो मुंह से बोलना। 25 इस पुस्तक में मारवाड़ के जाटों से संबंधित कुछ दिलचस्प सामग्री को भी प्रस्तुत किया है जो काफी रोचक है। जाटों से संबंधित सैकड़ों लोककथाएं तथा सैकडों ही कहावतें प्रचलित हैं। जैसे जाट के संबंध में कहा गया है कि 'जंगल जाट न छेड़िए, हाटां बीच किराड़।' जायल और खिंयाला के जाटों की उदारता की कथा भी कही जाती है।
सामाजिक तौर पर पंद्रहवीं-सालेहवीं शताब्दी में थली एवं मारवाड़ के जाटों में निराशा, जड़ता, संस्कारहीनता का वातावरण था। आचार-विचार में शैथिल्य पनपने लगा। जाटों में ऐसी अराजक स्थिति ने ही श्री धनाजी, श्री जांभोजी तथा श्री जसनाथजी को उनमें धार्मिक संस्कार उत्पन्न करने को प्रेरित किया। इस साम्यता की ओर भी ध्यान देने की आवश्यकता है कि तीनों ही संप्रदाय प्रवर्तकों ने प्रवृत्तिमूलक संप्रदायों की स्थापना की। आचरण से पिछडे अपने जाट अनुयायियों को धनाजी 21 नियम ग्रहण करने की बाध्यता रखते हैं। उसके बाद जांभोजी अपने अनुयायियों के लिए 29 आचरणों का विधान करते हैं जबकि उनके बाद इस संख्या से आगे बढ़कर जसनाथजी 36 नियमों की आखड़ी रखते हैं। ये तीनों ही संत उस समय के अपने जाट अनुयायियों को धार्मिक नियमों में बांधकर अपने संप्रदायों को दीर्घजीवी बनाना चाहते थे।
इस समय इस क्षेत्र (जाट बाहुल्य क्षेत्र) की धार्मिक स्थिति बड़ी जटिल थी। धर्म के नाम पर पाखंड का बोलबाला अधिक था। विद्वान साहित्यकार सूर्यशंकरजी पारीक कहते हैं- " भैरव, भोमिया आदि नाना कल्पित देवताओं की मद्य-मांस, जीव बलि देकर पूजा-अर्चना करना उस समय धर्म मान लिया गया था। तांत्रिक, वाममार्गी तथा जमातधारी पाखंडी साधुओं के संसर्ग दोष से मरुधरवासी सर्वथा ही धर्महीन हो चुके थे। जांभोजी की वाणी तथा उस काल के अन्य संतों की रचनाओं से यह सहज ही जाना जा सकता है कि उस समय किस प्रकार धर्म के नाम पर अधर्म का वर्णन होता था।" 26
थली, मारवाड़, माड, मगरा क्षेत्र में धार्मिक प्रभाव पैदा करना रामदेवजी तंवर ने प्रारंभ किया था। उन्होंने चौबीस प्रमाण दिए थे, किंतु वे जाट जाति को प्रभावित नहीं कर पाए, केवल अत्यंज जातियों को ही अपने निर्गुण मार्ग में बहुत थोड़े रूप में आकर्षित कर पाए। जांभोजी द्वारा विश्नोई संप्रदाय की स्थापना के ठीक सौ वर्ष पूर्व यानी संवत 1442 में वे महाप्रयाण कर गए, जबकि धनाजी द्वारा धनावंश की स्थापना के 110 वर्ष पूर्व वे दिवंगत हो गए।
जांभोजी से दस वर्ष पूर्व धनावंश की स्थापना के बावजूद धनावंश की वृद्धि तेजी से नहीं हुई, इसका कारण शायद यह रहा कि पंथ स्थापना के थोड़े ही अर्से बाद धनाजी महाप्रयाण कर गए। धनावंश का अधिक विस्तार बाद में ही हुआ। धनाजी कम संख्या में जाटों को धनावंश की ओर आकर्षित कर पाए लेकिन जांभोजी इस क्षेत्र में बहुत आगे रहे। जसनाथजी तो धनाजी से बहुत कम संख्या में जसनाथी बना पाए।
जांभोजी के चमत्कारी एवं सामाजिक जीवन के कारण भी उनसे जुड़ने वाले अनुयायियों की संख्या अधिक रही। उन्होंने 'थापण' एवं 'गायणा' की नियुक्ति करके भी अपने पंथ को मजबूती प्रदान की. जबकि धनाजी ऐसा कोई उपक्रम नहीं कर पाए। उन्होंने केवल घर में गृहस्थ पालन करते हुए वैराग्य भाव रखने पर जोर दिया।
यह वह काल था जब राजपूत राजा अपने अस्तित्व की लडाई लड़ रहे थे। केंद्र में मुस्लिम राज्य स्थापित हो जाने के कारण राजपूताने के राजाओं के समक्ष अस्तित्व पर संकट उत्पन्न हो गया था। धनाजी ने जिस क्षेत्र के जाटों को वैराग्य पालन की ओर उन्मुख किया, उस क्षेत्र के मोहिल (चौहान) राजपूतों के चार सौ वर्षों के सुदीर्घकालीन राज्य को अब जोधपुर के राठौड़ों से चुनौती मिलने लगी। राव जोधा ने अपने ही दामाद राणा अजीत मोहिल की हत्या करवा कर छापर-द्रोणपुर का राज्य अपने पुत्र राव बीदा को दिलवा दिया। इसी काल में राव जोधा के ही दूसरे पुत्र वीका ने भी जांगलू को प्राप्त कर संवत 1545 में बीकानेर राज्य की स्थापना कर डाली। इस समय धनाजी तो नहीं थे पर उनके द्वारा संस्थापित धनावंशी स्वामियों को संरक्षण देने में उन्होंने कोई कोताही नहीं की। राव बीदा ने भी जाटों से धनावंशी हो चुके जाटों के इस निजी निर्णय में कोई हस्तक्षेप नहीं किया। वैसे बीका ने अपने विस्तारवादी रवैये के कारण अपने क्षेत्र के सभी खांप के जाटों को बिना युद्ध किए, केवल समझौतों के बल पर अपने अधीन कर लिया था। हालांकि बीकानेर राज्य में जाटों को भोमियाचारा, चौधरी का सम्मान तथा ढोल गवाड़ी अधिकार प्रदान किया गया। बीकानेर के पूर्व महाराजा करणीसिंह का कथन है, "बीकानेर के आस-पास बहुत-सा इलाका जाटों के अधिकार में था। केंद्रीय सत्ता (दिल्ली की सत्ता) ने उनकी ओर कभी ध्यान नहीं दिया, अतः वे पूर्ण स्वतंत्रता का उपयोग करते थे। जाटों की यहां कई जातियां थीं और प्रत्येक का अपना प्रदेश था, पर वे बहुधा आपस में लड़ते रहते थे। "27 लंबे काल तक स्वतंत्रता का उपयोग करने के कारण तत्कालीन समय में जाट अपनी मर्जी के मालिक हो चले थे, इसलिए उनमें थोड़ा अराजक भाव उत्पन्न होना स्वाभाविक था। कुनबा बड़ा था, किंतु धार्मिक आध्यात्मिक भावों से दूर थे।
यहां हमारा उद्देश्य जांभोजी, जसनाथजी और धनाजी के कार्यों में तुलना प्रस्तुत करने का नहीं है, किंतु जहां जांभोजी को अपने अनुयायियों को उपदेश देने के लिए 51 वर्ष की लंबी अवधि प्राप्त हुई, वहीं धनाजी को केवल कुछ माह का समय। जांभोजी अपने पदों में इस क्षेत्र की जाट जाति के प्रति बहुत तरह के कथन करते हैं। वे सबसे पहले तो गुरु पहचानने की ताकीद करते हैं। वे कहते हैं कि जो अपने गुरु को नहीं पहचानता, वह 'थूळ' व्यक्ति होता है। थूळ व्यक्ति विश्वसनीय नहीं होता, उसकी संगत से बचना चाहिए। अपने मन से चलने वाले को उन्होंने 'मनमुखी' कहा हैं। वे कहते हैं- मनमुखी की तुलना पानी में पड़े हुए पत्थर से की जा सकती है। पानी में रहते हुए भी वह भीतर से सूखा ही रहता है। मनमुखी मन का हठी होता है, बदलने के लिए आसानी से तैयार नहीं होता।
जांभोजी ने जाटों के लिए कहा कि- "लोहे हूंता कंचन घड़िया, घड़िया ठांम सुठाऊं। जाटा हूंता पात करीलूं यह कृष्ण चरित प्रवाणा। अर्थात जो लोहे की तरह कठोर थे, उन्हें सोना बनाकर आभूषण की प्रतिष्ठा दी। कहा गया है-" जांभोजी के सारगर्भित उपदेश के प्रभाव से जाटों ने शिष्टाचार सीखा और लघुता द्योतक संबोधन 'तूं' के स्थान पर वे आदरसूचक 'जी' बोलने लगे। कितने ही मनुष्यों ने उनके प्रभाव में आकर क्रोध, कहर, कुबाण आदि दुष्कृतियों का परित्याग किया।
तात्पर्य यह है कि एक ही क्षेत्र में चालीस-पचास वर्षों के काल में जाट समुदाय को तीन श्रेष्ठ संत मिले। समाज में अकारण द्वैषी भी होते हैं- ऐसे ही द्वैषी जनों ने यह कहावत बनाई होगी- 'जाट बिगाड्या तीन-धनो-जांभो जसनाथ।' कहने का भाव यह रहा होगा कि उपरोक्त तीनों संतों ने जाट समुदाय में से ही तीन अलग संप्रदाय बना दिए और तीनों ही संप्रदायों का बाद में जाट समाज से रोटी-बेटी का कोई नाता नहीं रहा। तीनों जाट संप्रदायों में धनावंश का संबंध सीधा वैष्णवता से रहा।
धनावंश की स्थापना के समय राजस्थान के इस जाट बहुल क्षेत्र में हिंदू धर्म के अंतर्गत नाथ पंथ का प्रभाव था। विश्नोई संप्रदाय में नाथ पंथ के प्रभाव के संबंध में हीरालाल माहेश्वरी का कथन है- "राजस्थान में नाथों की प्रतिद्वंद्विता में विश्णोई संप्रदाय विशेष रूप से फैल रहा था।" 30 नाथपंथ में 12 पंथों का उल्लेख रहा है। राजस्थानी भाषा के तत्कालीन साहित्य में नाथपंथी हस्तलिखित साहित्य प्रचुर मात्रा में मिलता है। नाथपंथ में गोरखनाथ, जलंधरनाथ, गोपीचंद, भरथरी, हांडी भडंग आदि चर्चित नाम रहे हैं। स्वयं जांभोजी तथा जसनाथजी पर नाथपंथ का प्रभाव रहा। जबकि धनाजी पर ऐसा कोई प्रभाव नहीं रहा। तत्कालीन समय में धर्म के नाम पर बाह्याचार और पाखंड का बहुत अधिक बोलबाला था।
धनाजी ने धार्मिक पाखंड तथा हरिभक्ति विमुख समाज के एक वर्ग को धर्म का असली मर्म समझाते हुए वैराग्य धारण कर भक्तिपथ पर आगे बढ़ने की बात कही।
उन्होंने भक्ति के मार्ग में किसी प्रवंचना तथा प्रपंच को अपने जीवन में पास ही नहीं फटकने दिया और यही बात अपने अनुयायियों से कही। जिन आचरणों का पालन वे स्वयं करते थे. उन्हीं आचरणों के पालन की बात अपने अनुयायियों से की। उस काल में जाट वर्ग को धर्म तथा अध्यात्म की बात सिखाना खासा चुनौतीपूर्ण कार्य था, किंत उनकी वाणी का ही प्रभाव था. उन्होंने जिन स्वजातीय बंधुओं को अपना मंतव्य समझाया, वे सभी उनसे बहुत अधिक प्रभावित हए। उन्होंने प्रीतिपूर्वक धनाजी का शिष्यत्व स्वीकार किया और अपने दूसरे रिश्तेदारों को भी धनाजी की शिक्षाओं से अवगत कराया तो वे भी धनावंश में श्रद्धा रखने लगे।
जो जाट साधपन (वैरागी) धारण कर धनावंशी बन गए, उन्होंने अपनी बहुत-सी पूर्व परंपराओं का परित्याग कर दिया, जैसे- मृत्यु होने पर जाट जाति मुर्दे को लिटाकर ले जाते हैं, और मृत्युपरांत बारह दिनों तक शोक रखते हैं, जबकि धनावंश ने मृत्युपरांत वैरागी जनों के आचरणों को प्रश्रय प्रदान किया और साधुओं की भांति दिवंगत प्राणी की बैकुंठी निकालनी तथा सत्रहवीं का नियम रखा। जाटों में बेवा स्त्री के लिए नाता व्यवस्था रही है, पर धनावंश ने इसे अपने समुदाय में नहीं रखा। पहरान धनावंशी और जाट का एक ही जैसा रहा। खेती एवं पशुधन पालन भी एक जैसा ही रहा है। जाटों में अनेक यश के कथानक रहे हैं। जैसे जायल-खिंयाला के जाटों द्वारा दातारगीपूर्वक माहेरा भरने की बात पर उस जाति के धनावंशी भी अपने पूर्वजों का यश समझकर आज भी हर्षित होते हैं। 31
धनावंशी स्वामियों में आज भी अपनी पूर्व जाति की कर्मठता, सच्चाई आनुवांशिक रूप से मौजूद है। शारीरिक बनावट तथा पहनावे में भी वह साम्यता भली प्रकार दिखाई देती है। इसमें कोई शक नहीं है कि प्रत्येक धनावंशी ने जाट जाति का परित्याग करके ही धनावंशी संप्रदाय को अंगीकार किया था।
धनावंश प्राचीन उल्लेखों में
शोध-अनुसंधान के कार्यों में बहुत सावधानी की आवश्यकता होती है। एक-एक तथ्य की पड़ताल बहुत गहन छानबीन के साथ करनी चाहिए। धनावंश एक संपूर्ण वैष्णव संप्रदाय है। अनेक प्राचीन उल्लेखों में धनावंश से धनाजी का संबंध प्रतिपादित होता है। सन् 1891 में मारवाड़ के तत्कालीन शासक ने अपने राज्य की जनगणना, विस्तृत ब्यौरों के साथ करवाई। इस जनगणना के आंकडे बहत ही महत्त्वपूर्ण हैं। इस रिपोर्ट को 'रिपोर्ट मरद्मशुमारी राज मारवाड़- 1891 ई.' नाम दिया गया तथा इसमें जनसंख्या के साथ ही राजस्थान की जातियों का इतिहास तथा रीति-रिवाजों को भी प्रस्तुत किया गया। राजस्थान की जातियों के इतिहास अध्ययन में यह एक प्रामाणिक प्राचीन ग्रंथ है। इस ग्रंथ के पृष्ठ संख्या 303 पर 'धनावंसी साध' नाम से धनावंशी स्वामियों का ब्यौरा है, जो इस प्रकार है- "रामानंदजी के चेलों में १ धन्त्रा जाट भी थे, ये बड़े भगत हुए और इन्होंने अपनी जात के बहुत से जाटों को चेला किया और साधों का धरम सिखाया, ये सब धन्नावंशी कहलाए। इनमें कई खांपों के जाट हैं, इनका आचार व्योहार रामावत साधों के माफिक है, मारवाड़ और बीकानेर में बहुत हैं, भेस रामानंदी साधो का सा है तिलक भी रामानुज संप्रदाय का लगाते हैं।" 32 इस प्रामाणिक और प्रकाशित तथ्य के बाद धनाजी और धनावंश के अंतर्संबंधों पर किसी भी तरह के शक-शुबहे की कोई गुंजायश नहीं रह जाती। स्पष्ट है कि रामानंदजी के आदेश पर धनाजी महाराज ने अपनी ही जाति के लोगों को धनावंश संप्रदाय में समाहित कर साधपन यानी वैराग्य मार्ग में आरूढ़ किया था। इसी प्रकार पद्मश्री श्री सीताराम लाळ्स के 11 खंडीय 'राजस्थांनी सबदकोस' के चतुर्थ खंड में पृष्ठ 2528 पर 'धनावंसी' शब्द की व्याख्या में उल्लेख है-" (धनो वंशिन) रामानंदजी के शिष्यों में धन्ना जाट भी था। इसी के द्वारा दीक्षित साध धन्नावंसी कहलाए।" न केवल भारत बल्कि समूचे विश्व में इसे एक श्रेष्ठ और प्रामाणिक शब्दकोश माना जाता है। इस उल्लेख के उपरांत कोई संशय नहीं रह जाता कि धनावंश का प्रवर्तन किसने किया।
धनावंश के प्रवर्तक भक्त शिरोमणि धनाजी महाराज हैं। कुछ धनावंशियों को आज भी भूलवश जाट समझते रहे हैं, चूंकि धनावंशी समस्त एकमात्र जाट जाति से इस संप्रदाय में आए, इसलिए जाटों एवं धनावंशियों के जातिगत नख (उपजाति) सारण, गोदारा, बिजारणिया, कड़वा आदि लगभग सवा दो सौ की संख्या में एक ही जैसे हैं। जाट जाति को छोड़कर धनावंशी बने, इसलिए नख तो वही रहेंगे। जाट जाति पर अनेक ग्रंथ लिखने वाले डॉ. पेमाराम ने एक ग्रंथ में भ्रमपूर्ण बात लिखी -"हालांकि धन्ना ने अपना कोई पंथ नहीं चलाया, फिर भी उनके बहुत सारे जाट अनुयायी बने।" डॉ. साहब को नहीं पता कि धनाजी के जो अनुयायी बने उनके पंथ का नाम ही तो धनावंश है। मैंने डॉ. पेमारामजी से इस बारे में बात की तो उन्होंने इस त्रुटि को स्वीकार किया। असावधानी एवं शोध के अभाव में लिखी एक पंक्ति भी भ्रम उत्पन्न कर सकती है। इसी तरह 'भक्ति के धनीः धन्त्रा' नामक एक लेख में डॉ अनिल जैन ने भी भूल की। उन्होंने लिखा- "राजस्थान में धन्नावंशी जाट भी रहते हैं।" 35 मैंने उनसे निवेदन किया कि राजस्थान में धन्नावंशी जाट कहां रहते हैं? कृपया बताएं। मैंने उन्हें बताया कि धनावंशी जाट नहीं, स्वामी / वैरागी / वैष्णव कहलाते हैं। बेशक उनके उप गोत्र जाटों वाले ही हैं। उसका कारण उपरोक्त है। यही त्रुटि विद्वान ब्रजेन्द्रकुमार सिंहल ने की है। वे अपनी पुस्तक 'संत सप्तक' में धनाजी के अध्याय में लिखते हैं-" आज भी धन्नावंशी जाट रामानंद संप्रदाय से जुड़े हुए हैं। उनकी मान्यता है कि धन्ना भगवान सीताराम का उपासक, रामनंद स्वामी का शिष्य तथा गृहस्थाश्रम में रहते हुए भी 'स्वामी' कहलाता था। इसी कारण अब भी अनेक जाट अपने नाम के साथ 'स्वामी' शब्द का प्रयोग करते हैं।" 3" इन उपरोक्त पंक्तियों में धनावंशी स्वामियों को जाट भी बता दिया और स्वामी भी। सिंहल साहब बहुत बड़े विद्वान हैं, मैंने उनसे निवेदन किया कि इस ग्रंथ के आगामी संस्करण में भूल सुधार किया जाए, क्योंकि हम धनावंशी, धनाजी के अनुयायी बनने के उपरांत एक स्वतंत्र संप्रदाय और जाति के रूप में धनावंशी वैष्णव / स्वामी / साध हैं। विगत पांच सौ वर्षों में धनावंशी स्वामियों की पहचान जाट जाति के रूप में कभी नहीं रही है। राजा-महाराजाओं के अभिलेखों में भी धनावंशी साध के लेखे प्राप्त होते हैं न कि धनावंशी जाट के। धनावंशी के लिए जाट शब्द प्रयुक्त करना वैसे ही त्रुटिपरक है जैसे किसी ओसवाल को राजपूत कहना।
धनावंश भक्तप्रवर धनाजी महाराज का सदैव ऋणी रहेगा। उन्होंने अपने अनुयायियों को धर्म, अध्यात्म, भक्ति, वैराग्य का मार्ग प्रदान किया। राजा-महाराजाओं की बहियों तथा बहीभाटों की बहियों में धनावंश पंथ अंगीकार करने के अनेक लेखे प्राप्त होते हैं। बीकानेर राज्य की संवत 1824 की कागदों की बही में एक उल्लेख प्राप्त होता है, जो इस प्रकार है-"सांमी ध्यानदास पेमदास किसोरदास रामदास जात रा सहारण हुता, राजवी घीरतसिंह सिवसिंघोत घड़सीयोत भाडेरां रा हुता सु सांमी हुवा नू बरस घणा हुया नै घड़सीयोत वासो छोडै नीं सू हमै दरबार सू छोडावण री दरखासत पेस करी है।" 37 यह लेखा इस बात का प्रमाण प्रदान करता है कि सांमी ध्यानदास आदि पहले जाट (सहारण) थे, अब वे काफी वर्षों से स्वामी हैं। वे भाडेरां (लुनकरणसर तहसील का गांव) के निवासी हैं, जिनका विवाद राजवी घीरतसिंह के साथ चल रहा था। इस लेखा से इस बात पर भी प्रकाश पडता है कि जाटों से धनावंशी स्वामी बनने की प्रक्रिया लगभग अढ़ाई शताब्दी तक चलती रही। श्रीडूंगरगढ़ तहसील के गुसांईसर बड़ा गांव के भूकर (धनावंशी) लगभग दो सौ चालीस वर्ष पूर्व निकट के मणकरासर गांव के भूकर (नख के) जाट थे। मणकरासर के भूकर जाट तथा गुसांईसर के भूकर धनावंशी भली प्रकार इस बात की ताईद करते हैं। ऐसे और भी अनेक उदाहरण हैं।
बीकानेर राज्य की विभिन्न बहियों में धनावंशी स्वामियों तथा महंतों से संबंधित अनेक लेखे प्राप्त होते हैं। धनावंशी स्वामियों को राज्य की ओर से अनेक करों व बेगार से मुक्त कर तथा डोळी भूमि प्रदान कर उनका स्वागत किया जाता। बही छाप रै कागदां री संवत 1893-94 में 16 गांवों के वैरागियों के अलग-अलग नाम देकर उन्हें दरबार की ओर से भाछ नामक कर छोडा गया। 38 राज्य की ओर से धनावंशी स्वामियों के मंदिरों में पेटिया प्रबंध करने तथा उन्हें डोळी भूमि दिए जाने के अनेक उल्लेख बहियों में प्राप्त होते हैं। कागदों री बही संवत 1911 में उल्लेख है-" गांव भोलासर में श्री ठाकुरजी रो मींदर छै तेरी सेवा सांमी रूपदास करै छै सु इयै मींदर लॉरै डोळी रै छै तेरो पालो-घास अँ बाढसी, ठाकुरजी रै मींदर में गायां छै तीकी चरासी, दूजो इयै डोळी री खीयार करण पावै नहीं, आसोज बद-2।" 39 धनावंशी स्वामियों के प्रति राज्य की अनुग्रहपूर्ण दृष्टि रहती थी। गांव के किसी जागीरद्वार द्वारा बेअदबी करने पर धनावंशी गांव छोड़ दिया करते थे, पर दरबार (राजा) को जब इस बात का पता चलता तो वे आदेश जारी कर उन्हें सम्मानपूर्वक वापस बुलवाते। बही कागद रै तलबां री संवत संवत 1896-99 में उल्लिखित इस आदेश में लिखा है-
"गांव धीरासर रो वैरागी रूपदास कानड़दास गांव कंवलासर वसतो हो तीको नै हाडै खेतसी कंवलासर में पकड़वाया हुता ताहरी बेराजी हुव 'र सरसै जाय बैठा छै सु हमें जमाखातरी राख पूठा गांव धीरासर कंवलासर थे राजी हुवो जठै आय वसजो। था सूं बेहिसाबी खेचल कई बात री न हुसी। हुकम है। संवत १८९९ माह बद-५।"
अन्य अनेक आदेशों में भी धनावंशी स्वामियों के लिए 'कई बात री खेचल न हुसी' शब्द को काम में लिया गया है जिसका तात्पर्य है कि इन्हें किसी बात के लिए परेशान न किया जाए। राज्य की ओर से धनावंशी स्वामियों को धुंआ भाछ, ढोल गवाडी जैसे अनेक कर माफ थे. वहीं स्थानीय जागीरदार को उनसे बेगार न लेने का हुक्म था, वहीं धनावंशी मंदिरों में पूजा के लिए पेटिया (रोजाना आटा, शक्कर, बी) दिए जाने का प्रबंध राज्य की ओर से किया जाता था। बही तलबा री संवत 1896 में दर्ज है- "वैरागी साळगदास नै सदामद महीने १ रू. १२) आमालात कुरा व पेटीया रा पावै है तेरा मास १२ रा दीराया छै स खजानची लालचंद देदीज्यो । अकराख रा पावो ते गढ़ रा जमा खरच कर लेजो।" 41 इसी प्रकार डंगर बालाजी मंदिर के पेटिया प्रबंध के संबंध में छाप का कागज इस प्रकार है-" श्री सांमीजी पोकरदासजी चेलो गोरधनदासजी गांव गोपालपुरा से ठाकरां हमीरसिंहजी रा जै रुगनाथजी आपने हमारा ठीकाना से बनाकर पाहाड़ ऊपर श्री हनुमानजी रो मिंदर दियोड़ो है जकै रे धूप दीयै वास्ते श्री दरबार सूं मास १ रा २) अखरे रुपिया दोय बारै मास रा २४) चालू कर दीया है सो सुजानगढ़ हाकमा से मिलता रैसी और हमार पुरवजा रो बनाकर मंदिर आपने दान दियोड़ो है जी रो आप ही इंतजाम करोगा संवत १९३५ मिति पोह सुदी १३।" 42
यों तो धनावंशी वैरागियों को बेगार की छूट थी, किंतु राज्य में कई दफा ऐसी स्थितियां उत्पन्न हो जाया करती, तब धनावंशी महंतों से भी बेगार ली जानी आवश्यक हो जाती, इसे बेगार न कह सहायता भी कह सकते हैं। बीकानेर महाराजा रतनसिंह के समय, अजमेर में अंग्रेज अफसर की सेवा में ऊंट भेजने की आवश्यकता पड़ी। महंतों के ऊंट अच्छे पले हुए हुआ करते थे। संवत 1896 में इस आशय का पत्र महंतों को भेजा गया-" श्री दीवान बचनातु गांव गारबदेसर रा महंत बदरीदास, गांव बुकणसर रै मंडल रा महंत हरीदास, गांव कड़वासर रै मंडळ रा महंत गांनदास (ज्ञानदास) साहवा रै मंडल रा महंत गोपालदास वा देस रा वैरागियों समसुता जोग्य तिथि अजमेर अंगरेज नै ऊंठ मेलणा छै ते रा ऊंठ १२ अखरे बारै थां सारां ई वैरागी सालगै हसतु ठाहरीया है सु बैण दिन १५ रो कीवो है सु सालगो आवै छै सु फंटवाड़ कर ऊंठ ताकीद सु मेलो सु काम करजो ढील कीवी तो ओळमो खासो-द. मोहता सालमसिंघ, लीलाधर संवत १८९६ मीती आसाढ सुद ७ दूजी।"
अनेक ग्रंथों में धनाजी और उनके द्वारा स्थापित पंथ का अनुमोदन किया गया है। नानूराम संस्कर्ता उच्च कोटि के साहित्यकार हुए, उन्होंने अपने वृहद ग्रंथ 'खेडे रपट' में स्पष्टतः लिखा कि "जाट धन्ना भगवान के परम भक्त हुए, जिनके नाम पर धनावंशी वैरागियों का मत प्रचलित हआ।" 44 उन्होंने तो धनावंश में समाहित अनेक जातीय नखों का भी उल्लेख किया है।
धनावंश में एक महंत श्री गणेशदासजी लगभग एक शताब्दी पहले हुए। वे बड़े अग्रगामी सोच वाले कर्मनिष्ठ महंत थे। उन्होंने संवत 2007 में लाडनूं के निकट मंगलपुरा में वैरागी विद्यालय की स्थापना कर उस काल में अविश्वसनीय और महान कार्य किया। यह वैरागी विद्यालय अनेक वर्षों तक चलता रहा, पर दैवयोग से महंतजी का स्वर्गवास उसी वर्ष हो जाने से विद्यालय की प्रगति को थोड़ा विराम लगा। जोधपुर के बारठ कवि नवलदान ने उनकी प्रशस्ति में दोहे, सवैया तथा भजन प्रस्तुत किया, जो वैरागी विद्यालय की वार्षिक रिपोर्ट में प्रकाशित हुए। उनकी प्रशस्ति का प्रथम दोहा इस प्रकार है :
धना भक्त के वंश को, उज्ज्वल कीनो आप।
शुभ कारज कीना सदा, जप हिरदे हरि जाप ।। 45
उपरोक्त दोहे में स्पष्टतः धनावंश को धना भक्त का वंश बताया गया है। एक सदी पूर्व तक धनावंश के प्रवर्तक धनाजी महाराज के प्रति अन्यान्य समाज में भी श्रद्धा का भाव था। धनावंश को लेकर अन्य अनाप प्रमाण भी उपलब्ध हैं।
कतिपय धनावंशीय महंतद्वारों के शिलालेख एवं ताम्रपत्र
गारबदेसर मंडल
संत केशवदास संवत 1697 वैसाख सुदी 7 को गारबदेसर गांव में आए। वे कहां से आए और कौन थे, विस्तृत ब्यौरा प्राप्त नहीं है, पर उन्होंने सीतारामजी के पूजन का स्थान वर्तमान गारबदेसर सीतारामजी मंदिर की जगह किया। यहां मंदिर का निर्माण महंत प्रमाणदास ने किया। मंदिर निर्माण का शिलालेख इस प्रकार है-
श्री रामाय नमः संमत १८०३ वरषे
मिति असाढ वदी १२ श्री राम जी
रो मिंदर रुघनाथ जी को सांमीजी
श्री संतदास जी मिंदर करवायो।
अधकारी हर भगत केसुदास
सेवग कल्याणदास, कान्हो शिवराम कारीगर
गारबदेसर के महंतों में संवत 1850 में हरिदासजी महाराज बहुत प्रभावशाली महंत थे। बीकानेर के राजा सूरतसिंहजी ने उन्हें बहुत भूमि प्रदान की। हरिदासजी तपस्वी संत थे, उनके अनेक चमत्कार इस क्षेत्र में प्रचलित हैं। सूरतसिंहजी ने इन्हें सं. 1852 में ताम्रपत्र भेंट किया।
गारबदेसर पैंतीसी के गांव
(1) गारबदेसर (2) कालू (3) गुसांईसर बड़ा (4) जेतासर (5) श्रीडूंगरगढ़ (6) बिग्गा (7) हेमासर (8) देराजसर (9) गुसांईसर निमड़िया (10) नौरंगदेसर (11) डांडूसर (12) खारी (13) कुजटी (14) सहजरासर (15) लोढेरा (16) आडसर छोटा (17) डेलवां (18) लाछड़सर (19) आडसर पुरोहितान (20) उदरासर (21) लाधड़िया (22) कंवलासर (23) सोमासर (24) पनपालिया (25) रंगाईसर (26) सोनपालसर (27) कीकासर (28) अमरसर (29) मालकसर (30) हालासर (31) भानीपुरा (32) भोजासर छोटा (33) भोजासर बड़ा (34) अमरपुरा (35) करणीसर (36) मनाफरसर (37) खोडाला (38) शेखसर (39) नारसरा (40) हरदेसर
जायल महंत द्वारा
जायल महंत द्वारा राजसी महंतद्वारा था। यहां नृसिंह भगवान का मंदिर है। मंदिर बहुत सुंदर अलंकृत पत्थरों से बना हुआ है। मंदिर निर्माण का शिलालेख इस प्रकार है-
।। सुभ ।।
संमत १८५७ मिति आसाढ मासे शुक्ल पक्षे तिथि दुतीया भौम वासरे दिने ठाकुरजी श्री नृसिंहजी को मिंद हुवौ आज्ञा पालक महंतजी श्री बदरीदासजी
जोधपुर मंदिर का ताम्रपत्र
।। श्री परमेश्वरजी सत्पत्रै ।।
।। श्री जी साहब जी श्री सही ।। स्वस्ति श्री राज राजेश्वर महाराजाधिराज माहाराजा श्री विजैसिंघजी महाराज कुंवार श्री फतेसिंघ जी वचनात तथा सैहर जोधपुर में नागौरी दरवाजे ठाकुरजी श्री सीतारांमजी विराजै तठै श्री ठाकुर द्वारा तालकै धरती वीघा २०१ दोय सौ ओक गढ जोधपुर रो गांव सुरपुरियो सालवा कैन तठै हवेली रो तिण में चढाई है।
१५१ वीघा वरसालु ५० वीघा उनाळवै री एक तिण रो जाव, २०१ अखरे वीघा २०१ संवत १९१९ रा प्रथम असाढ सुद २ मुकाम पाय तखत गढ जोधपुर
दोतीणा का ताम्रपत्र
महाराज श्री प्रेम स्यंघजी वचनातु सांमी धीरजदासजी नै धरती बीघा ७०१) अंके सात सै एक पुनरथी दीनी। जी में थानै वसासे दोहते वाग सी वावो खेत दीयो वीघा पांच सौ।
दोतीणा के धनावंशी ठाकुरदासजी का रुतबा किसी बड़े जागीरदार से कम नहीं था। उनके संबंध में एक दोहा प्रसिद्ध है-
दोतीणो गढ़ द्वारका, ठावो ठाकुरदास।
आयां नै आदर मिलै, पावै राबड़ी छाछ ।।
कसूंबी महंत द्वारा
कसूंबी के महंत जीवणदास को ५०१ बीघा भूमि ठाकुर अजबसिंह बीदावत के सांसण पट्टे में दी। द. मुहता अनोपसिंह- संवत १८५४।
यह धनावंशी स्वामियों के प्रारंभिक महंतद्वारे में से एक है। यहां नृसिंह भगवान का मंदिर है। खारिया की गद्दी यहीं से जाकर अलग बनी। वहां भी नृसिंह भगवान का मंदिर है।
