भक्त श्री धनाजी एवं धनावंश
अध्याय : चतुर्थ - भक्त धनाजी की कथा
श्रीमद् भागवत महापुराण में भक्त अम्बरीष के प्रसंग में भगवान कहते हैं कि मैं भक्तों के अधीन हं. स्वतंत्र नहीं हूं, मुझे मेरे भक्तजन अत्यधिक प्रिय हैं। जैसे पतिव्रता स्त्री अपने शुद्ध प्रेम से श्रेष्ठ पति को वश में कर लेती है, उसी प्रकार मुझ में चित्त लगाने वाले सर्वत्र समदर्शी साधुजन भी अपनी शुद्ध भक्ति से मुझे अपने वश में कर लेते हैं। संत शिरोमणि धनाजी ऐसे ही भगवत्परायण भक्त थे। उन्हें बलि का अवतार बताया जाता है।'
धनाजी जाट कुल में उत्पन्न हुए। उनके जन्मवर्ष के संबंध से सभी विद्वान एकमत लगते हैं। मैक्स आर्थर मैकालिफ कहते हैं - Dhanna, generally known as Dhanna Jat, is said to have been born in the year A.D. 1415. 2 स्वामी नारायणदास दादूपंथी का भी ऐसा ही कथन है, वे कहते हैं- "धनाजी का जन्म अनुमानतः वि. सं. 1472 (सन 1415) में राजस्थान के धुआं ग्राम में जाट जाति में हुआ।" धनावंश के विद्वान महंत उनके जन्मवर्ष के संबंध में कथन करते हैं-" श्री धनाजी का जन्म क. व. 4516, वि. सं. 1472, ईस्वी सन 1415, श. सं. 1337 के माह बदी 8 शनिवार वृश्चिक लग्न, पूर्वाषाढा नक्षत्र में जाट जाति में हुआ था।" 4 परशुराम चतुर्वेदी भी धनाजी के जन्म के संबंध में मैकालिफ के कथन को ही सही ठहराते हैं। पर वे धनाजी को रामानंद का समकालीन नहीं मानते। रामानंदी भगवद्दास धनाजी के जन्म वर्ष पर कोई आपत्ति नहीं करते, किंतु धनाजी की जन्मतिथि के संबंध में उनका कथन कुछ अलग है, जो इस श्लोक में इस प्रकार अभिव्यक्त हुआ है-
वैशाखमासि बहुले च गिरौ तिथौ च,
वारे शनावथ शिवेऽपि च वृश्चिके हि।
आप्यां बलिर्बलवदिष्ट विरोधिरोधी,
नाम्ना वभूव भुवि भव्यगुणो धनेशः ।। 6
वैशाख मास, कृष्णपक्ष, अष्टमी तिथि, शनिवार, पूर्वाषाढा नक्षत्र सुंदर वृश्चिक लग्न में बलवान इष्ट विरोधियों को निवारण करने वाले श्री बलिजी पृथ्वी पर सुंदर गुणों वाले धनेश श्री धना होकर प्रकट हुए। इस कथन में वे अगस्त्य संहिता का आधार लेते हैं। यह बात अलग है कि अगस्त्य संहिता को कुछ विद्वान प्रामाणिक ग्रंथ नहीं मानते। भगवद्दासजी ने अपने श्लोक में धनाजी के लिए 'धनेश' शब्द प्रयुक्त किया है।
रामानंदजी के अधिकांश शिष्यों तथा स्वयं रामानंदजी के जन्मवर्ष को लेकर मतभिन्नता बहुत अधिक रही है, किंतु धनाजी के जन्मवर्ष को लेकर मतैक्य कहा जा सकता है। डॉ. गोविंद त्रिगुणायत कहते हैं कि, "रामानंद के शिष्यों में धना साहब का स्थान भी ऊंचा है। यह जाति के जाट थे। इनका जन्मकाल संवत 1472 के आस-पास निश्चित किया जाता है।"" इसी मत को समर्थन देते हैं, डॉ. विक्रमसिंह राठौड़, 8 डॉ. अनिल जैन तथा डॉ. धर्मपाल मैनी 10 तथा अन्य कई विद्वान भी। रैवासा पीठाधीश्वर अग्रदेवाचार्य की 'अग्र ग्रंथावली' के संपादक गणेशदास भक्तमाली धनाजी की जन्मतिथि वैशाख कृष्णा अष्टमी को मानते हैं। किंतु धनावंश संप्रदाय में लगभग एक शताब्दी से धनाजी की जन्मतिथि माघ कृष्णा अष्टमी को मनाई जाती रही है। वस्तुतः धनावंश के गोवर्धननाथ मंदिर, जोधपुर के महंत बदरीदास गोलिया, अपने गुरु हरिदासजी गोलिया के द्वारा वि. सं. 1990 में लिखी पुस्तक का हवाला देते हैं तथा स्वयं बदरीदासजी ने भी भक्त शिरोमणि धनाजी पर पर्याप्त अनुसंधान किया था। उन्होंने स्वयं धनाजी पर दो पुस्तकों का लेखन किया। दोनों ही पुस्तकों में वे धनाजी की जन्मतिथि माघ वदी अष्टमी का ही उल्लेख करते हैं। रामानंद संप्रदाय की आचार्यपीठ- श्रीमठ, पंच गंगा, वाराणसी ने बदरीदासजी की पुस्तक 'भक्त शिरोमणि धना' का प्रकाशन किया है, इसलिए गोलियाजी द्वारा उल्लेखित तिथि का खास महत्त्व है। इससे पूर्व बदरीदासजी ने बहुत पहले एक अन्य पुस्तक 'भगवद्भक्त श्री धन्नाजी की जीवनी' की रचना की। उसमें आप धनाजी का परिचय प्रस्तुत करते हुए कहते हैं कि धनाजी का जन्म माह बदी अष्टमी, शनिवार को वृश्चिक लग्न पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र की प्रभात वेला में जाट जाति में पिता नगराज माता गंगाबाई (पिता का गोत्र घेतरवाल तथा माता का गोत्र गढवाल) के घर हुआ था। उनके गांव का नाम खेरीपर था जो आजकल धुआ कलां के नाम से जाना जाता है।" धनाजी के माता-पिता के कुछ अन्य नाम भी प्रचलित हैं, किंतु हम यहां अनुसंधान प्रवृत्ति के महंत बदरीदासजी द्वारा उल्लिखित नामों को ही प्रधानता देंगे। धेतरवाल गोत्र (जाति नख) के जाट धनाजी के टाँक क्षेत्र में रहे हैं और कुछ लोगों का मानना रहा है कि धनाजी के पूर्वज चूरू, नागौर अंचल से ही टाँक क्षेत्र में गए थे। मैकालिफ धनाजी का गांव धुआं बताते हुए कहते हैं - Hi lived in the village of Dhuan in Tonk territory. धार्मिक संतों एवं पंथ-संप्रदायों के इतिहास लेखन करने वाले विद्वान ब्रजेन्द्रकुमार सिंहल कहते हैं कि "मैकालिफ ने अपनी पुस्तक 'द सिख रिलीजन में धनाजी विषयक जानकारी का स्रोत नहीं लिखा है।" 12 जबकि मैकालिफ धनाजी विषयक जानकारी प्राप्त करने का स्रोत बताते हुए लिखते हैं कि उन्हें यह जानकारी देवली (धुआं कलां) तहसील के मजिस्ट्रेट कर्नल ई.आर. पेनरोज ने प्रदान की। 13 धुआं कला के पूर्व नाम खेरीपुर, खीरपुर, खेरागढ़ अलग-अलग विद्वानों ने धनाजी के प्रसंग में लिखे हैं। यह मानना चाहिए कि यह एक ही गांव के नाम हैं। इस संबंध में हमें अधिक कष्ट कल्पना नहीं करनी चाहिए। धना के भक्तिमय प्रसंगों में जिस खेत की चर्चा की जाती है, वह धुआं कलां के निकट आज भी है और धनाजी का मंदिर, उनका पारंपरिक कुआं भी उसी खेत में है। मैकालिफ तो यहां तक वर्णन करते हैं कि उन्हें ब्राह्मण के द्वारा जो शालिग्राम प्राप्त हुआ था, वह भी उनके मंदिर में मौजूद है। धना भगत के इस खेत को धना भगत का खेत या 'धना भगत की पाटी' कहा जाता है। अब खेत के निकट सिख पंथ द्वारा निर्मित धनाजी का गुरुद्वारा भी अवस्थित है। विगत वर्षों में राजस्थान सरकार ने यहां पैनोरमा का निर्माण करवाया है तथा धनावंशी स्वामी समाज ने अपने पंथ प्रवर्तक के मंदिर के निकट एक सुंदर सत्संग भवन का निर्माण कराया है। इस मंदिर, गुरुद्वारे तथा ऐतिहासिक खेत के दर्शन करने के लिए वर्ष में हजारों श्रद्धालु आते रहते हैं। सैकड़ों वर्षों से जन सामान्य में यह मान्यता रही है कि धनाजी के खेत की मिट्टी फसल को नीरोगता प्रदान करती है, इसलिए किसान लोग बड़ी श्रद्धा से धनाजी के खेत की मिट्टी अपने साथ ले जाते हैं और फसल में किसी प्रकार का रोग आने पर इस मिट्टी का
फसल पर छिडकाव किया जाता है। धनाजी के इस खेत से संबंधित अनेक चमत्कार ग्रंथों तथा जन सामान्य की किंवदंतियों में प्रचलित रहे हैं।
धनाजी का ननिहाल फागी (जयपुर) के निकट चौरू गांव के गढवाल गोत्रीय जाट परिवार में था। चौरू गांव में भी धनाजी के ध्यान, भक्ति तथा गोधन चारण के अनेक प्रसंग प्रचलित रहे हैं। आज भी इस गांव के निकट स्थित नाडी, धूणा को धनाजी से संबंधित बताया जाता है। गांव के उदार तथा धार्मिक प्रवृत्ति के लोगों ने चौरू में धनाजी के भव्य मंदिर का निर्माण हाल ही में करवाया है। धनाजी के जातीय नख के संबंध में कुछ लोग यह मानते हैं कि वे हरचतवाल थे, जबकि ऐसा सही नहीं है।
धनाजी का धर्म अनुप्राणित परिवार
धनाजी के पिता नगराजजी तथा मां गंगाबाई में धार्मिक संस्कारों का बाहुल्य था। थे तो वे सद्गृहस्थ, पर मन उनका संत सेवा तथा परमात्म भक्ति में लगता था।
पति-पत्नी दोनों स्वभाव से अंतर्मुखी थे, उनकी अंतरात्मा में सदैव भगवद्भाव रहता। उनका घर तीर्थराज के समान था। मैकालिफ सहित अन्यान्य विद्वानों का मानना है कि घर के भक्तिमय वातावरण के कारण ही धना की मति भक्तिमय बन पाई। बाल्यकाल में ही उसकी प्रतिभा को अध्यात्म का आलंबन प्राप्त हो गया। अध्यात्म विद्या के प्रकांड विद्वान हनुमानप्रसादजी पोद्दार का कथन है कि, "छोटी अवस्था में ही इनके हृदय में प्रेमबीज अंकुरित हो उठा था और वह संत सुधा समागम से जीवनी शक्ति भी पा चुका था। धनाजी के पिता खेती का काम करते थे। पढ़े-लिखे न होने पर भी उनका हृदय सरल और श्रद्धासंपन्न था। वे यथाशक्ति संत महात्मा और भक्तों की सेवा करते थे।" कृषि और गोपालन से जो भी उपार्जन होता, उसे वे लोक कल्याण के धार्मिक कार्यों में व्यय किया करते। धनाजी की माता गंगादेवी अपने घर की दीवारों पर गेरू से भगवान के चित्र बनाती तो धनाजी उन्हें बहुत गौर से देखा करते तथा मन हो मन उन चित्रों से बतियाते। पांच वर्ष की बाल अवस्था में वे भगवान के प्रसंगों को सुनकर तन्मय हो जाया करते। उनकी इस मनोवृत्ति से नगराज दंपती को भारी प्रसन्नता होती. वे अपने पत्र में किसी बड़े संत के चिह्न देख रहे थे। रामस्नेही दयालदास धनाजी की बाल भक्ति के संबंध में अपने काव्यमय उद्गार प्रकट करते हुए कहते हैं-
बालपणो दिढ प्रीत, सेव भगवद अनुरागी।
परसापरस सुप्रीत, दरस परसण बड़भागी ।। 15
संस्कारवश बाल्यकाल में ही भगवद्प्रेम का बीजांकुर धनाजी में हो गया। घर पर आने वाले संत-महात्मा भी सदैव भगवप्रेम के ही प्रसंग कहा करते। नन्हा बालक उन प्रसंगों तथा भजन-वाणियों को बडे भाव तथा गौर से सुना करता। बालकों में अनुकरण की प्रवृत्ति बहुत अधिक हुआ करती है। नन्हीं बालवय का एक प्रसंग बहुत अधिक प्रसिद्ध रहा है। सभी भक्तमालों में इस प्रसंग को अपने-अपने ढंग से विवेचित किया गया है। धनाजी का घर एक सत्संगी का घर था, इसलिए साधु-संत-महात्मा और पंडितजन साधिकार वहां आया-जाया करते थे। त्रिलोचन नामक पंडित को नगराज अपना घरेलु पंडित समझते थे। नैमितिक पूजा पाठ कर गृहस्थी का संचालन करने वाला त्रिलोचन अपने यजमान के घर चार-छह माह से आया करता था। इस बार त्रिलोचन घर आए तो उनके धार्मिक क्रियाकलापों को बालक धना ने बड़े गौर से देखा। त्रिलोचन स्वच्छता का बड़ा ध्यान रखा करते थे। स्वयं ही कुएं से पानी खींचकर उससे नहाते और शालग्राम को नहलाने के लिए पंचपात्र भरकर ले आते। त्रिलोचन ने बड़े प्रेम से अपने पास विग्रह रूप रखे शालग्राम को मलमलकर नहलाया। बाद में चंदन लगाकर, मस्तक पर तुलसी को रखा। षोडशोपचार से पूरी पूजा की। बालक धना के लिए ये सभी क्रियाकलाप बड़े कौतुहलपूर्ण थे। भगवद् पूजा के बाद त्रिलोचन ने घर में से आए हुए भोजन का भी प्रथम भोग ठाकुरजी (शालग्राम) को लगाया और तदुपरांत स्वयं ने प्रसाद प्राप्त किया। बड़े शालीन से शालग्राम धना को बड़े मनभावन लगे। छह-सात वर्षीय धना ने देखा कि भगवान की पूजा करना कोई कठिन काम नहीं है। उसने साहस कर पंडित त्रिलोचन से कहा- बाबा, मुझे भी भगवान की पूजा करनी है, इस पर पंडित ने कुछ अधिक गौर न करते हुए कहा कि हां बेटा, भगवान की पूजा तो सभी को करनी चाहिए। बालक धना ने और अधिक स्पष्टता से पंडित त्रिलोचन के शालग्राम की ओर इशारा करते हुए कहा- मुझे भगवान की यह मूर्ति चाहिए। मैं भी आपकी तरह इसकी पूजा करूंगा। बालक की बात सुनकर पंडित पशोपेश में पड़ गया। यजमान का सुपुत्र है और मूर्ति की मांग की है, पंडत ने कुछ विचार कर अपने झोले से वैसे ही एक दूसरे शालग्राम को निकालकर धना को देते हुए कहा-अगर रोजाना मन से पूजा नहीं करोगे तो ठाकुरजी नाराज हो जाएंगे।
बालक ने शीघ्रता से हां भरते हुए कहा- मैं ठाकुरजी को आपसे अधिक सुख से रखूंगा। 'धनै सेविया बाल बुधि' बाल बुद्धि का अनुराग सर्वाधिक निर्मल, निश्छल हुआ करता है। ध्रुव ने भी इसी अबोध अवस्था में परमात्मा को प्राप्त किया
था। शालग्राम मूर्ति पाकर धना का हृदय पुलकित हो गया। पांडित्य का प्रदर्शन करते पंडित त्रिलोचन ने पूजा की सभी विधियां पंचोपचार, दशोपचार, षोडशोपचार बता डाली।" गुरु गोविंदसिंह तो मानते हैं कि त्रिलोचन की नन्हे धना से मित्रता ही हो गई, इसलिए वह अपने बालमित्र को पूजा की सारी विधियां बताता है। धना पंडित द्वारा की गई पूजा को बड़े मनोयोग से देखा करता था। उसे पंडित की किसी भी बात पर अभरोसा नहीं था। पंडित से ठाकुर को प्राप्त कर धना ने उसे अपनी छाती से लगा लिया। धना को लगा जैसे उसके भीतर आनंद की लहर दौड़ गई है। असीम आनंद से उसकी आंखें मुंद गई। पंडित बालक के इस प्रेम को अनुभव कर रहे थे। बड़े प्रेम से समझा रहे थे, ठाकुर को रोज नहलाना, टीका लगाना, टीका लगाने से ठाकुर बहुत प्रसन्न होते हैं। ठाकुर को तुलसी समर्पित करना, और हां, ठाकुर के भोग लगाने से पहले स्वयं कुछ न खाना। धना सोच रहा था, ये सब बातें कौन कठिन है। अब ठाकुर मिल गए हैं तो सब-कुछ करूंगा। अनुराग दृष्टि डालकर पंडित त्रिलोचन उसी दिन दूसरे गांव चले गए। उस दिन की पूजा तो पंडित कर गए थे, अगले दिन की जिम्मेदारी धना की थी। गांव के निकट ही धना का खेत था, अपने कुछ बड़े बाल सखाओं के साथ सात वर्षीय धना भी गायें चराने अपने खेत चले जाया करते थे। धना ने बड़े चाव से अपनी पांवरी (थैला) में ठाकुरजी को विराजित किया और खेत में चला गया। वहां पहुंचकर बड़े मनायोग से एक थाली में बैठाकर ठाकुरजी को मलमलकर नहलाया। नहलाने के बाद बहुत कोमलता से ठाकुरजी के बदन को पौंछा और उनके टीका लगाया। पंडित की ही भांति धूप खेआ। चूरमें का पींडिया तो मां ने साथ भेजा ही था। अब धने को भी कुछ-कुछ भूख लगने लगी थी। एक पेड़ की जड़ में एक छोटा पत्थर रखकर धना ने ठाकुरजी को उस पर पधरा दिया और वह चूरमें का पूरा पींडिया ही उनके आगे धर दिया। अब वह प्रतीक्षा करने लगा कि ठाकुर भोग लगा ले तो बचा हुआ पींडिया वह भी खा ले।
धना थोड़ी-थोड़ी दूर पर टहलकर आए और देखे कि ठाकुरजी भोग लगा रहे हैं क्या ? बहुत इंतजार के पश्चात भी उसे निराशा ही हाथ लगी। ठाकुर ने एक कण का भी भोग नहीं लगाया। धना सोच में पड़ गया, ठाकुर भोग क्यों नहीं लगा रहे, जबकि उसने पंडित की ही भांति ठाकुर को प्रातः जगाया, अपनी ही कुंड के अछूते पानी से नहलाया था। गेरु का टीका लगाकर तुलसीदल भी चढ़ाया था। किसी कार्य में
त्रुटि नजर नहीं आ रही. फिर भोग नहीं लगा रहे हैं। याद आया, पंडित ने कुछ देर तक अपने अंगोछे का पर्दा किया था। ठाकुरजी अंगोछे के पीछे भोग लगाते हैं, सबके देखते भोग नहीं लेते। अब युक्ति समझ में आ गई। धना ने अपने थैले से अंगोछे को निकाला तथा चूरमा और शालग्राम विग्रह पर डाल दिया। कुछ देर प्रतीक्षा करने के बाद धना को विश्वास हो गया कि अब तक तो ठाकुर ने अवश्य ही भोग लगा लिया होगा। छोटे से ठाकुर हैं, थोड़े से पेट भर जाता होगा। बचे हुए प्रसाद का भोग मैं लगाऊंगा। नन्हे बालक ने आतुर भाव से जितनी देर में व्यक्ति भोजन करले, उतनी देर तक प्रतीक्षा की। इस प्रतीक्षा के बाद उसे लगा कि अब तक तो ठाकुरजी ने अवश्य भोग लगा लिया होगा तो उन्होंने धीरे से अपने अंगोछे को शालग्रामजी तथा उनके समक्ष रखे चूरमें पर से हटाया, पर यह देखकर कि अब तक ठाकुरजी ने एक कौर भी ग्रहण नहीं किया है, वह उदास हो गया और सोच में पड़ गया कि ठाकुर प्रसाद क्यों नहीं ग्रहण कर रहे हैं, मुझ से कहां त्रुटि हो रही है? पंडित त्रिलोचन की झोली में शंख भी था और उन्होंने घर पर पूजा के दौरान शंख-ध्वनि की थी। शंख में भरकर जल का अर्घ्य भी दिया था। कल घर से वह शंख भी लाएगा, आज तो भूल हो गई। त्रिलोचन ने ठीक कहा था, भगवान की पूजा ठीक प्रकार से करना। उससे कहीं न कहीं तो भूल हो ही रही है। पंडित ने कहा था, ठाकुरजी को भोग लगाने से पहले प्रसाद मत ग्रहण करना। इसलिए ठाकुर से पहले प्रसाद कैसे प्राप्त करलूं। यह प्रसाद तो अब इनके आगे ही चढ़ा रहेगा।
विचारों एवं संकल्प-विकल्प में डूबे रहे धनाजी। भगवान को मनाने के जितने उपाय ध्यान में आ रहे थे, सब किए। खुद को धिक्कारने लगे, ठाकुरजी को भूखा रखा जाता है क्या ? अगले गांव गए हुए पंडितजी, पुनः यहां आएंगे तो उनको क्या जवाब दूंगा ? बेबसी में धनाजी की आंखों में आंसू आ गए। भगवान ने नहीं खाया तो वे कैसे खा सकते थे।
वे भूखे-प्यासे शाम को घर लौटे तो मां ने उनका उतरा हुआ चेहरा देखकर चिंता प्रकट की। सिर पर हाथ फेरकर पूछा- बेटा क्या हुआ?
धनाजी चुपचाप शून्य में घूरते रहे। मां ने अधिक जोर देकर पूछा तो रो पड़े। रोते-रोते ही बताया कि मां, मैं पूरे दिन ठाकुरजी के भोग लगाने की प्रतीक्षा करता रहा, पर वे तो मेरे से रूठे हुए ही रहे, चूरमें का एक कोर भी नहीं खाया। सायंकाल को मैं उस चूरमें को चींटियों को डाल आया हूं, अब तुम ही बताओ, ठाकुर को भोग लगाए बिना में कैसे ग्रहण कर सकता हूं। चिंता के मारे मेरी भूख-प्यास ही गायब हो चुकी है। सच कहता हूं मां, जब तक ठाकुरजी प्रसाद नहीं ग्रहण करेंगे, मैं भी भोजन नहीं करूंगा।
अबोध बालक धना की प्रतिज्ञा सुनकर मां का हृदय व्याकुल-सा हो गया। वह सोचने लगी- इतना छोटा बालक पूरे दिन भूखा कैसे रहा होगा। इस तरह से तो यह बीमार ही पड जाएगा। मां झट से गाय का दूध लेकर आई और बोली- तुम यह दूध पी जाओ, ठाकुर को उलाहना देंगे।
बालक ने आंखें तरेरकर कहा- मां मैं यह दूध भी कैसे ग्रहण कर सकता है, यह रहे मेरी झोली में ठाकुर, तुम पहले इन्हें पिला दो, फिर मैं भी पी लूंगा। भगवान में गहन विश्वास तो मां का भी कम नहीं था, पर उन्हें यह स्पष्ट पता था कि शालग्रामजी तो दूध पीने से रहे। भगवान तो भाव के भूखे होते हैं, उन्हें तो सूक्ष्म रूप से भोग लगाया जाता है, वे भौतिक रूप में उपस्थित होकर वस्तुओं को कब ग्रहण करते हैं? मां ने हथेली के मध्य भाग में थोड़ा-सा दूध लेकर उसे अग्नि में छोड़कर कहा-देखो भगवान ने भोग ले लिया। हम भगवान के धूपिये पर ही भोज्य सामग्री भगवान को चढ़ाते हैं। अग्नि भगवान का मुख होती है, उसमें कोई भी वस्तु चढ़ाने पर वह भगवान को स्वमेव प्राप्त हो जाती है।
धनाजी ने कहा- मां, भगवान होते हैं न ? मां मना कैसे करती, उसने कहा-हां बेटा, भगवान होते हैं और सब जगह उन्हीं की सत्ता है। धना ने कहा- मां, वही तो... भगवान होते हैं, फिर मेरे से भोग ग्रहण नहीं किया, यही तो सोच की बात है। जरूर वे मेरे से रूठे हुए हैं, पर मैं भी अपने भगवान का भक्त हूं, उन्हें मनाकर ही मानूंगा। मां, मैं भगवान को खिलाकर ही कुछ खाऊंगा।
माता-पिता ने अधिक जिद्द की तो धना रोने लगा। प्रातः गायें चराने का समय हुआ तो वह अपने नित्यकर्म कर खेत जाने को तैयार था। मां ने चूरमें एवं रोटी का भाता देते हुए कहा-बेटा, ज्यादा जिद मत करना, भगवान को अर्पण कर भोजन कर लेना, भूखा मत रहना, तुमने कल पूरे दिन कुछ नहीं खाया। धना ने सिर हिलाया और गायों के पीछे-पीछे रवाना हो गया। खेत में पहुंचकर उसने बड़े अनुराग से भगवान को थैले से निकालकर नहलाया, श्रृंगार किया, उन्हें वृक्ष के नीचे कल के स्थान पर ही विराजित किया। थोड़ी देर में भोजन का वक्त हुआ तो धना ने आज पहले शंखध्वनि कर भगवान का आह्वान किया। शंख को धोकर उसमें जल भरा, अर्घ्य देकर फिर आह्वान किया, आज तो आ जाओ ठाकुरजी, आकर भोग लगाओ !
धना ने कल की भांति पंचपात्र में भरकर पानी रखा। चरम का लड्डू एक पात्र में रखकर ठाकुरजी के आगे धर दिया और कहा- ठाकुरजी, अगर आपको अधिक भूख लगी है तो अधिकांश खा जाना, मेरे लिए तो थोडा-सा छोड देना। आज अंगोछा भी ऊपर नहीं डाला। कहा- मेरे अलावा यहां कौन देख रहा है. आपको भोग लगाते, मेरे सामने ही प्रसाद पाओ भगवन। वह हाथ जोड़कर सामने बैठ गया। दो घंटे तक प्रतीक्षा की, भगवान नहीं आए तो स्वतः ही आंखों से आंसू बह चले, कहां हो भगवान ? मां तो कहती है, आप सब जगह रहते हैं। फिर क्यूं नहीं आ रहे ? क्यूं नहीं आ रहे, क्यूं नहीं आ रहे कि रटन लगाते-लगाते धना शिथिल हो गया और वहीं सो गया और सोने से उसकी आंख लग गई।
वह मुश्किल में आधी घड़ी सोया होगा कि उसने देखा, कोई बहुत प्यार से उसका सिर गोदी में लिए उसे थपकाकर जगा रहा है-उठो, मेरे भक्त धना, लो मैं तुम्हारा भोग प्राप्त करने आ गया। धना ने आंख खोली तो देखा, गोपाल उन्हें मीठी नजरों से निहार रहे हैं, उनके बदन से निकलती नीली ज्योति से उसकी आंखें चुधियाने लगीं। वह भगवद्रस्पर्श से आनंद के अतिरेक में डूब गया। उठो, मैं तुम्हारा लगाया भोग प्राप्त करता हूं, यह कहकर भगवान चूरमें का प्रसाद लेने लगे और कहा-धना, मैं आज धन्य हो गया, कितनी बड़ाई की बात है कि मेरे तुम्हारे जैसे निर्मल, निष्कामी, निष्कलुश भक्त हैं, तुम्हारे इस चूरमें में जैसा मीठास है, वैसा तो छप्पन भोग में भी कहां होता है ? वे बहुत रुच-रुचकर चूरमें को खा रहे थे। हर्ष से धना की आंखों से आंसू बह रहे थे। भगवान ने धना को अपनी गोदी में बैठाया और उसी चूरमें में से कुछ कौर अपने हाथ से धना को खिलाए। अपने घर के बने चूरमें में आज जो विलक्षण स्वाद था, वैसा तो कभी नहीं लगा। भगवान ने पुचकारकर कहा-धना, अब मैं तुम्हें कष्ट नहीं दूंगा, तुम्हारे पुकारते ही प्रसाद ग्रहण कर लिया करूंगा। धना यही तो चाहता था कि ठाकुरजी के भोग लगाते ही वे आकर उसे ग्रहण कर लेवें। धना विह्वल होकर ठाकुरजी को निहारने लगा। अब वे उसके सिर पर हाथ रखकर बोले- अच्छा मेरे नन्हे भक्त, अब मैं चलता हूं। धना ने हां में सिर हिलाया तो भगवान अंतर्धान हो गए। धना ने शालग्राम को उठाकर अपनी छाती से लगा लिया और बहुत देर तक इसी तरह से संज्ञाशून्य-सा बैठा रहा। वह भगवान के प्रेम से निहाल हो गया। ठाकुरजी तो एकदम मां की तरह प्रेम करते हैं। कितना अपनापन और दुलार था उनकी बातों में, अपने हाथों से मुझे प्रसाद कराया। ऐसी तृप्ति तो कभी नहीं हुई। वह खेत में दूर तक देखने लगा- भगवान कहां गए फिर खुद ही मुस्कुराकर सोचने लगा, भगवान कहीं नहीं जाते, वे तो सभी जगह रहते हैं।
घर जाने पर मां ने देखा, आज धना काफी प्रफुल्लित-सा था। मां ने सबसे पहले यही पूछा- बेटा, तुमने प्रसाद कर लिया था न ? धना ने हुलसकर कहा-हां मां, हमेशा भूखा नहीं रहने देते ठाकुरजी, आज हम दोनों ने आधा-आधा प्रसाद कर लिया था। मां को तो इस बात से खुशी हई कि आज उसके लाडले ने भोजन कर लिया, कल भी खामख्वाह भूखा रहा, अभी उसकी आयु उपवास करने की कहां है? मां ने देखा, बच्चा है. कल उसके मस्तिष्क में कुछ बात थी और आज कुछ और तो कोई बात नहीं. किसी भी बहाने से करे पर भोजन कर लिया तब ठीक है। मां ने धना की बातों पर कोई गौर नहीं किया। मां क्यों सोचती कि भगवान साक्षात् उपस्थित होकर प्रसाद लेकर गए हैं, वह तो इसे बच्चों का मनोविनोद समझ रही थी।
भक्तमाल की भक्तिरस बोधिनी टीका करने वाले संत प्रियादासजी इस प्रसंग में ठीक ही कहते हैं-
छाक नित आवै नीकै भोग को लगावै जोई
छोड़ै सोई पावैं, प्रीति रीति कछु न्यारियै ।।"
भक्त और भगवान की इस विलक्षण प्रेम-रीति को न जाने कितने भक्त चरित्रों में बखाना गया है।
अब धना भगवान को प्रतिदिन भोग लगाए और वे प्रत्यक्ष उपस्थित होकर उसको प्राप्त करते। भगवान अपने भक्तों के संग ऐसी मैत्री करते रहे हैं। पूरे जीवन धना ने भगवान के साथ मैत्री भक्ति के संबंध रखे। प्रियादासजी का कथन है कि एक दिन भगवान ने धनाजी को यह प्रस्ताव दिया कि 'जाकौ कोऊ खाय ताकी टहल बनाय करै।' अर्थात कोई किसी का रोज अन्न खाए और वह उसका कार्य नहीं करे, यह तो युक्तिसंगत बात नहीं है। तुम मुझे बड़े प्रेम से चूरमा खिलाते हो, बदले में मैं तुम्हारी गायें चरा दिया करूंगा। खेती के समय तुम्हारे पिताजी खेत में काम करने के लिए हाली रखते ही हैं, तुम मुझे अपना हाली जानो। धना को यह बात ठीक तो नहीं लगी, पर उसे भगवान का रोज आना, बहुत रुचता था, जितनी देर भगवान उसके पास रहते उसे असीम आनंद की प्राप्ति होती। इसलिए उसने इस बात की हामी भरली। धना देखते, भगवान बड़े प्यार से गौचारण करते, उनके कारण गायें भी उन्माद में रहतीं। वे अब अधिक दूध देने लगीं। मां को बड़ा आश्चर्य होता कि वे आजकल इतना अधिक दूध कैसे देने लगी हैं। धना से कारण पूछा तो उसने कहा- मां आजकल गायों को भगवान जो चराते हैं, दूध तो अधिक होना ही है। मां ने सोचा-सब गायों को भगवान ही तो चराते हैं, उनके बिना इस संसार में है ही क्या? सरल स्वभाव की गंगादेवी बातों को अधिक खोदती नहीं थी।
बहुत दिनों तक यह सिलसिला चलता रहा। एक दिन पंडित त्रिलोचन फिर घूमते-घामते खेरीपुर (धुआं कलां) में आ निकले। पंडित ने घर में देखा, वह जो शालग्राम शिला देकर गया था उसके पूजन का कहीं कोई स्थान नियत नहीं किया गया था। उसने धना को लगभग डांटते से कहा- भगवान की मूर्ति देकर गया था, क्या उसकी पूजा नहीं करते हो? धना ने कहा-काहे नहीं करते हैं, महाराज, ये रहे भगवान झोले में, हम रोज इन्हें अपने खेत ले जाते हैं, रोज नहलाते हैं, टीका, तुलसी करते हैं, फिर भोग लगाते हैं हो न ? पंडित ने कहा- यह तो अच्छा है, पर तुम भोग लगाने के बाद ही प्रसाद लेते
बालक धना कहने लगे- हां महाराज, अब तो भोग रोजाना हम दोनों साथ-साथ ही करते हैं। उनके हाथ लगा देने से भोग बहुत रसीला हो जाता है। आधा वे खाते हैं, आधा मैं पाता हूं। पंडित को बालक की बात कुछ समझ में नहीं आई। तब धना ने हुलसकर स्पष्ट किया कि पहले दिन तो ठाकुर ने भोग नहीं प्राप्त किया। मेरी विनती पर ध्यान ही नहीं दिया, पर दूसरे दिन बालक की विनती पर उनको दया आ गई, मैं तो दो दिनों का भूखा-प्यासा सो गया था, उन्हीं ने आकर जगाया और भोग प्राप्त किया। अब वे मुझे जरा भी कष्ट नहीं देते, उलटे गायें चराकर मेरा सहयोग करने लगे हैं। पंडित ने पूछा-धना, तुम किसकी बात कर रहे हो ?
हलका-सा झुंझलाकर धना ने कहा- दूजे की बात मैं क्यों करूंगा, मैं तो अपने ठाकुरजी की ही कहूंगा न, आप देकर गए हैं तो मैं इनको भूखा रखूंगा क्या ?
धना ने बहुत स्नेह से अपने शालग्राम की ओर देखा- "मेरे सखा हैं, ये ठाकुरजी।" सिर चकरा गया पंडित त्रिलोचन का। कितना पूजापाठ करते हैं, पर ठाकुर पास बैठकर कब भोग लेते हैं। उसने अभरोसे से कहा- ठाकुर तुम्हारी गायें चराते हैं ? "हाओ, रोज ही।" बालक धना ने अल्हड़पन से कहा तो बहुत देर तक पंडित त्रिलोचन की बोलती बंद हो गई। धना ने पंडित को झंझोड़कर कहा- "कल खेत आ जाना, मैं तुम्हें गोपाल से मिला दूंगा, वे बहुत अच्छे हैं।"
पंडित के लिए रात्रि निकालना मुश्किल हो गया। वह मुंहअंधेरे ही नहा-धोकर तैयार हो गया। जल्दी-जल्दी में पूजा-पाठ किए और प्रतीक्षा करने लगा कि कब धना खेत की ओर चले तो वह उसके साथ जाए और ठाकुरजी के प्रत्यक्ष दर्शन करे। पंडित की उतावल को भांपकर धना ने कहा कि आप भाते वक्त (पूर्वाह्न) के बाद ही खेत पधारें, ठाकुर तो भोग लगाने के समय ही पधारते हैं। बाद में वे गायें चराते हैं, आप उन्हें गायें चराते हुए देख लेना। पंडित तो ठाकुर के शीघ्र दर्शन करना चाहता था किंतु वह बालक की युक्तिपूर्ण बात को भी कैसे टालते।
बालक के बताए समय पर त्रिलोचन खेत में पहुंचे। उन्होंने देखा, बालक धना शांत भाव से एक पेड़ के नीचे बैठे हैं। अकेले हैं, भगवान तो नहीं हैं। शीघ्रता से पास पहुंचकर पूछा-धना, भगवानजी कहां हैं? बालक धना ने खेत के एक कोने में जहां गायें चर रही थीं, उस ओर हाथ का इशारा कर कहा- देख नहीं रहे, नीलमणि एक गाय के शरीर पर हाथ फेर रहे हैं। पंडित त्रिलोचन आंख फाड़-फाड़कर देखने लगा, उसे तो कोई नजर नहीं आ रहा था। उसने शीघ्रता से कहा- धना, तुम्हारी गायें तो स्वतः ही चर रही है, उनके पास तो कोई नहीं है।
धना ने देखा, ठाकुर उनकी ओर देखकर ही मुस्कुरा रहे थे। स्पष्ट तो दीख रहे हैं, उनके कानों के कुंडल की चमक से आंखें चुंधिया रही हैं, इस पंडित को क्यों नहीं दीख रहे! उसने फिर कहा- पंडितजी महाराज, कितने साफ-साफ दीख रहे हैं, गोपाल। वे हमें देखकर हंस रहे हैं।
पंडित ज्ञानी था, इसलिए अपने दृष्टिदोष को समझ गया। जहां चाह, वहां राह। वास्तविक दर्शन की अभिलाषा ही कब की थी जो भगवान दर्शन देते। सबकुछ समझकर त्रिलोचन ने धना से विनती की- धना, ठाकुर तुम्हारे मित्र हैं, अपने मित्र से कहो, मुझ अधम को भी एक बार दर्शन देवें, मैं तुम्हारा यह ऋण कभी नहीं भूल पाऊंगा।
धना ने अपने सखा भगवान से विनती की- भगवान, आप इन्हें भी दर्शन दीजिए, आपका विग्रह तो मुझे इन्होंने ही तो दिया है। भगवान ने हंसकर उत्तर दिया-भक्तमित्र, ये पंडितजी विग्रह को विग्रह ही मानते हैं, उसे भगवान कब मानते हैं, तुम्हारे कहने पर मैं इन्हें एक बार दर्शन देता हूं।
भगवद् दर्शन कर पंडित त्रिलोचन की आंखें मुंद गईं। वह बेसुध-सा हो गया। थोड़ी देर बाद भाव विह्वल होकर उसने आंखें खोलीं और धना से कहा-धना, पुनः दर्शन कराओ। धना ने कहा-ठाकुरजी का समय हो गया, वे तो चले गए।
भगवद् दर्शन कर पंडित धन्य-धन्य हो गया। वह मुदित मन संकल्पित होकर वहां से चला गया। उसने ठान लिया कि अब शेष जीवन भक्त आराधना में ही बिताना है। प्रसंग आता है कि त्रिलोचन को मुक्ति प्राप्त हई। उस दिन के उपरांत वह भगवद्भाव में डूब गया। उसे भगवदप्राप्ति की रीति मालूम हो गई।
बहुत से जिज्ञासुओं ने यह जानने का प्रयत्न किया कि धनाजी के साथ भगवान की यह नित्यलीला कितने दिनों तक चली। इस पर नित्यलीलालीन भाईजी महाराज श्री हनुमानप्रसादजी पोद्दार का कथन है कि "अब धनाजी की बाललीला समाप्त हुई। साथ ही साथ भगवान का धनाजी के साथ बालोचित व्यवहार भी छूट गया।" 20 धनाजी के भीतर बाल्यकाल में ही उत्कट भगवप्रेम जाग्रत हो गया। इस अनन्य भक्ति के कारण वे सर्वोपकारक स्वभाव के हो गए। उनके शेष जीवन में संतोचित उत्कृष्ट कोटि के गुण परिलक्षित होते हैं। वे अकृतद्रोह, करुणावान, अमानी, अकिंचन और अप्रमत्त होते हैं। उच्च कोटि की भगवनिष्ठा के कारण धनाजी श्रेष्ठ भक्त के रूप में विख्यात हुए।
धनाजी के भगवद् साक्षात्कार का यह प्रसंग पंचाद्धं शती से आज भी उतना ही लोकप्रिय है और भक्तमाली जन इसे बहुत मधुर शब्दों में, लालित्य के साथ व्याख्यायित करते थकते नहीं हैं। सभी भक्तमालों में भी इस प्रसंग को प्रश्रय मिला है। सखा भक्ति का यह अप्रतिम उदाहरण है। भक्तमाली समुदाय में तो यह भी प्रचलित है कि जो जन धनाजी महाराज के उपरोक्त प्रसंग को नित्य प्रति स्मृत करता है, पढ़ता है तो उसका भी भगवान से साक्षात्कार संभव है।
धनाजी की साध प्रीति
धनाजी की भक्ति का एक अंग, उनकी साधु-संतों के प्रति गहन प्रीति का है। वैसे तो साधु-संतों की सेवा का भाव तो उनका पारिवारिक रहा है। उनके परिवार में साधु-संतों के प्रति आदर-सम्मान का भाव सदैव से ही था। बाल्यकाल में भगवद् साक्षात्कार और सान्निध्य के समय भी उन्हें भगवान के द्वारा संत सान्निध्य ग्रहण करने की सीख दी गई थी और बाद में काशी गमन में भी उन्हें संत-सेवा का महत्त्व समझ में आया। वहां कुछ दिन संत सान्निध्य में रहकर वे संत-सेवा के आनंद से भली प्रकार परिचित हो गए।
धनाजी में संतोचित आठ गुण सहज ही थे। दूसरों का दुख वे देख नहीं पाते, इसलिए उनमें दया का गुण जन्मजात था। उनमें क्षमा का भाव सदैव ही रहता, इसलिए क्रोध से कोसों दूर थे। वे किसी की भी निंदा नहीं किया करते और न ही दोष दर्शन करते। धनाजी ने अपने अनुयायियों को अभक्ष्य वस्तु कदापि न खाने की सीख दी, वे स्वयं अभक्ष्य वस्तुओं से बेहद दूर रहते । मंगल भाव रखकर सदैव ठाकुरजी से शुभकर्म करवाने की प्रार्थना किया करते। हर किसी का सहयोग करने की खातिर वे कीमती वस्तु का परित्याग करने में जरा भी नहीं झिझकते। उन्हें वैभव जरा भी प्रिय नहीं था। उनके युवाकाल में ही गांव के लोग उन्हें स्वामी, बैरागी कहने लगे थे। संतोष उनके वैराग्य का प्रथम सोपान था। उन्हें किसी भी कार्य के लिए कोई चाह नहीं थी, उसे कर्तव्य समझकर किया करते।
कल्याण के संपादक पूज्य भाईजी हनुमानप्रसादजी पोद्दार का कथन है-
"भगवान की आज्ञानुसार धनाजी ने काशी जाकर श्री रामानंदजी से भगवन्नाम की दीक्षा ले ली और घर पर रहकर भगवद्भजन और साधु-सेवा करने लगे।" 2' साधु-सेवा के लिए धनाजी अपने कृषिकर्म को पूरा मन लगाकर किया करते। अनेक प्राचीन किंवदंतियों में उनकी कर्मठता के उल्लेख प्राप्त होते हैं। अपने कर्मठ स्वभाव के कारण वे अपने ठाकुरजी से यह कह दिया करते थे कि, 'सांवरा कोनी थोरै सारै।' 22 इस लोकभजन में वे भगवान से परिहास करते हुए कहते हैं कि भले ही आप बड़े वैभवशाली हैं, आपके पास उपभोग की नामी गरामी चीजें हैं, पर काम तो मेरा भी नहीं अटकता है। वस्तुओं में तो मैं भी आपकी बराबरी करता हूं और इनकी प्राप्ति के लिए आपकी सहायता की कोई खास जरूरत नहीं है। एक सद्गृहस्थ के रूप में वे पारंपरिक रूप से अपनी खेती-किसानी का कार्य मनोयोग से किया करते थे।
किशोर अवस्था में भगवद्संग प्राप्त होने की घटना से धना की प्रसिद्धि दूर-दूर हो चुकी थी तथा उनके प्रति कितनी ही किंवदंतियां चर्चित हो चुकी थीं। संतों-भक्तों में यह माना जाने लगा था कि अगर किसी का मन भगवद्भजन में नहीं लगता तो उसे धने के हाथ के पवित्र अन्न का भोग करना चाहिए। भक्त के हाथों प्रसाद पाने से भीतर-बाह्य शुद्धि हो जाएगी। उस समय यह कहावत प्रसिद्ध थी कि, 'धने भगत रो रोटियो जगत पसारे हाथ।' भक्त धना खेती के कार्य से लौटने के बाद सत्संग अवश्य किया करते। धनाजी ने धनावंश की स्थापना के समय धनावंशी पंथ ग्रहण करने वालों से भी नित्य सत्संग की बात विशेष रूप से कही।
धना के संबंध में कहा जाता है कि, 'धना रे मन विस्वास घणो।' अर्थात धना के मन में परमात्मा के प्रति अटूट श्रद्धा और विश्वास था। इस दृढ विश्वास ही के कारण वह ठाकुरजी का अनन्य सेवक था। धना की इस विश्वासरूपी भक्ति को जानकर ही रामानंदजी चमत्कृत हो गए थे। रामानंदजी जब गागरौन गढ़ में पीपाजी के पास आए, तब उन्हें धनाजी के भक्तिमय जीवन की गाथाओं का पता लगा तो वे गद्गद हो गए। 24 धना अध्यात्म मार्ग के शास्त्रीय ज्ञान के प्रति अधिक आकृष्ट नहीं हए। न उन्होंने शास्त्रीय ज्ञान की कभी काट की। निरंतर सत्संग और साधु-सेवा के कारण धना के घर में कई बार खाद्य सामग्री का अभाव हो जाया करता था। ऐसी स्थिति में उसे गांव के साहूकार का मुंह जोहना पड़ता।
वर्षाकाल में एक दफा धना के घर अन्न समाप्त हो गया तो वह साहूकार के पास एक मण अनाज लाने के लिए गया। साहूकार ने यह चेतावनी देते हुए अन्न दे दिया कि बरखा होने वाली है, तुम्हें इसी अनाज को खेत में बीज के रूप में भी काम लेना है। चाहे अभी साधुओं को खिला दो अथवा खेत में बीज रूप में बीज देना।
साधु सेवा के सामने धना सब हिदायतें भूल जाया करते। जब तक वर्षा नहीं हुई, तब तक सप्ताह भर में धना ने सारे अनाज को साधु-सेवा में खर्च कर डाला।
वर्षा होने पर धना अत्यधिक चिंतित हो गया। अब वह कौनसा मुंह लेकर साहूकार के पास जाए। पर धना ने सोचा, दूसरा कोई उपाय नहीं है। उसने पुनः साहूकार से खेत में बीजने के लिए अन्न की मांग की। साहूकार ने यह कहते हुए मना कर दिया कि पहले ही उसने बहुत अन्न उधार ले रखा है। धना ने समझाया कि वह सारा अन्न खेत में निपजने पर ही तो लौटाया जाना संभव होगा। अभी अगर खेत जुतेगा ही नहीं तो अन्न होगा कैसे ?
साहूकार ने कुछ देर सोचा और फिर कहा कि मैं अन्न एक शर्त पर ही दे सकता हूं कि तुम इस बीज को लेकर सीधे खेत को जाओ। तुम खेत जोतने के लिए बैलों को यहीं ले आओ। साहूकार की इस शर्त से धना को तनिक भी परेशानी नहीं हुई। उसे तो खेत जोतने जाना ही था। सेठ ने दस सेर अनाज खेत जोतने के लिए दे दिया। धना उसे लेकर रामधुन गाते हुए खेत की ओर रवाना हो गया।
धना अभी आधी दूरी भी नहीं पहुंचा था कि रास्ते में उसे अपने गांव की ओर आती हुई नाचती-गाती साधुओं की एक टोली मिली। रामभजन में मगन साधुओं को सामने पाकर धना को अच्छे शगुन का भान हुआ। वैसे भी साधु-संतों के दर्शन से धना का हृदय पुलकित हो जाया करता था। धना ने भजनों में खोये साधुओं को झुककर प्रणाम किया और पूछा- महाराज, आप लोग इतने प्रसन्न भाव से कहां पधार रहे हैं?
साधुओं में से एक युवा साधु ने उत्तर दिया-क्या करें भइया ! कई दिनों से हमारा मन भजन में नहीं लग रहा था, तब हमने अपने गुरु महाराज से इसका कारण पूछा तो उन्होंने बताया कि किसी कषाययुक्त व्यक्ति का अन्न पेट में गया है। उसका दूषित प्रभाव दूर करने के लिए किसी कर्मशील भक्त का अन्न ग्रहण करो। राजपूताने में एक अनूठा प्रभुभक्त है धना जाट। वह खेरीपुर में रहता है, तुम अगर उसके हाथ का जरा-सा भी अन्न खा लोगे तो तुम्हारा मन भली प्रकार भजन में लगने लगेगा, इसलिए अब हम धना के गांव की ओर जा रहे हैं।
धना ने साधुओं से पुनः पूछा- आप लोग अभी आ कहां से रहे हैं?
साधुओं की जमात में से एक साधु ने उत्तर दिया कि हम हरिद्वार से आ रहे हैं। धना ने विस्मित होकर पूछा- ऐसा धना के अन्न में कौनसा प्रभाव है, जिसे प्राप्त करने के लिए आपने इतनी लंबी यात्रा की।
साधुओं ने मगन होकर एक लंबी आह भरी और कहा-गुरु महाराज ने कहा है, उसके हाथ का एक दाना भी अंतःकरण को पवित्र करने में पर्याप्त है। मन की सारी वासनाएं समाप्त हो जाती हैं। धना भगवद् साहचर्य प्राप्त भक्त है, उसके तो दर्शन में भी भगवद् दर्शन जैसी साम्यता है। तुम बताओ, धना का घर इस सामने दीख रहे गांव में कहां है, हमें वहां पहुंचने की शीघ्रता है। वह भक्त दीखने में कैसा है? सुना है अभी तो वह युवा ही है।
अब धना से रहा नहीं गया। उसने कहा- वह जाट का छोरा धनिया में ही हूं, पर मुझ में बाकी कोई गुण नहीं है, मैं तो भक्ति की रीत ही नहीं जानता।
मैं ही धनिया हूं, यह सुनकर साधुओं की टोली धना के चरण स्पर्श को लालायित हो गई। धना पीछे सरकने लगा। पर साधु कहां मानने वाले थे, वे उसके चरणों की धूलि सिर में डालने लगे, कुछ वहां की रेत में लोटने लगे।
अब धना बड़ा धर्मसंकट में पड़ गया। खेत जोतने के लिए यही दस सेर अन्न है और इधर भूखे साधुओं की टोली है। धना ने पोटली खोली और एक-एक अंजूरी अन्न सब साधुओं को भेंट करने लगा। उसने झोली का सारा अन्न बांट दिया। साधु आशीष देने लगे-धना, हमने जो अन्न खाया है, वह सहस्र गुना हो जाए। तुम्हारी भक्ति दिन दूनी रात चौगुनी बढती रहे। हमारा अंतःकरण पवित्र किया है, तुम्हारा सदैव पवित्र रहे। जो व्यक्ति तुम्हारा स्मरण मात्र कर लेगा, उसमें भक्ति के भाव उदय हो जाएंगे। इस प्रकार आशीषं देती हुई साधुओं की टोली वापस मुड़ गई।
धना सोचने लगा-मेरे कैसे पुण्य हैं, आज प्रातःकाल ही सिद्ध संतों के दर्शन हो गए। मैंने तो हरिद्वार का नाम भर सुन रखा है, इतनी दूर से चलकर आए संतों ने घर बैठे गंगा बहा दी, मुझे मेरे ही गांव में पुण्य दर्शन लाभ दिया। हे ठाकुरजी, मैं आपका यह एहसान कैसे चुकाऊंगा ?
मन में अपार प्रसन्नता का भाव लिए हुए धना अपने खेत पहुंच गया। दोनों बैलों को धना ने थोड़ा-सा चरने को छोड़ा। धना का हाली धना के साथ ही गांव से यहां तक आया था। उसने रास्ते में देखा था, बिना सोचे-समझे धना ने बीज साधुओं को खिला दिया था। यह भी नहीं कहा कि अब उसे दूसरा बीज साहूकार नहीं देगा। हाली मन ही मन जल-भुनने लगा। उसने धना से कहा कि बिना बीज के हम अब क्या करेंगे ? धना ने कहा- हल चलाएंगे।
हाली को लगा, धना बौरा गया है। उसने कहा- बिना बीज के हल चलाने से जमीन तो उर्वरा होगी, पर ऊगेगा क्या ?
धना ने बेफिक्री से कहा- वह ठाकुरजी जाने।
हाली को क्या उजर था। वह मन ही मन हंस रहा था और सोच रहा था, यह अपने माता-पिता के डर से बिना बीज के खाली हल चलवाना चाहता है, पर हमारा क्या ? धना और हाली ने मिलकर सायंकाल तक सारा खेत जोत डाला। खेत से घर लौटते समय हाली ने रुंआसा होकर धना से कहा- इस वर्ष तो भूखा ही मरना पड़ेगा। धना धैर्य की प्रतिमूर्ति था। उसने हाली के कंधे पर हाथ रखकर कहा- तुम क्यों चिंता करते हो, तुम्हारा आधा वांटा (भाग) कहीं नहीं जाने वाला - 'पाड़ौसी के निपजै जेतो, तूं थारो भर लीजै तेतो।' 24
धना के कहने से हाली एक बार आश्वस्त तो हो गया, किंतु उसे घर पहुंचकर बार-बार हंसी आ रही थी, अपनी व धना की मूर्खता पर। बिना बीज पूरे दिन हल चलाकर समूचा खेत जोत डाला।
हाली की हंसी को चीह्न कर उसकी स्त्री ने बार-बार मुस्कुराने का कारण पूछा तब हाली से कहे बिना नहीं रहा गया। उसने सारा वृत्तांत सुना दिया और कहा-इसलिए हंसी आ रही है कि बिना बीज के खाली हल कोई चलाता है क्या ? पति से सारा प्रसंग सुनकर हालिन गमगीन हो गई और फिर धना की इस हरकत पर क्रोधित होकर अपने ही पति से झगड़ा करने पर उतारू हो गई, तुम क्या अंधे-बहरे हो गए थे ? अब हम सब क्या खाएंगे? वह धना तो वैरागी है, साधुओं का संग करता है, अन्न नहीं होगा तो, मांगकर खा लेगा, पर तुम तो खेतिहर हो, तुम्हें मांगने से कौन देगा? अब उस हालिन को विश्राम कहां? वह तो झगड़ा करने को उतारू होकर धना के घर आ गई। धनाजी की पत्नी धनाजी की ही भांति ऊंचे दर्जे की भक्त महिला थीं। वे भगवान पर दृढ़ भरोसा रखकर सदैव निश्चिंत रहा करती थीं। पतिव्रता, दया, क्षमा, सहिष्णुता की प्रतिमूर्ति हरिदासी का हरेक के साथ प्रेमपूर्ण व्यवहार रहता था। हालिन को अविश्वास करते देखकर उसने कहा- देख बाई, तुम्हारे हिस्से का अनाज कहीं नहीं जाना है, तुम्हें विश्वास नहीं है तो मेरे दो प्रिय बैलों में से एक बैल अभी बेच दूं और उसकी रकम से तुम्हारे घर अनाज डलवा दूं ?
इतने में वहां पर धना भी उपस्थित हो गए। उन्होंने नाराजगी प्रकट करते हुए कहा कि हमारे हाली को खाली हल चलाने की बात को गुप्त ही रखना चाहिए था। सारे कार्य इस संसार में भगवद्प्रेरणा से घटित होते हैं। हम लोग तो व्यर्थ ही सब प्रकार के हिसाब-किताब लगाते हैं। सारा किया धरा तो भगवान का होता है। भगवान की मर्जी पर निर्भर है, कई बार डाला हुआ बीज भी नहीं उगता और कई दफा अड़क धान से भी बोरे भर जाते हैं। व्यक्ति को अपना कर्तव्य पवित्र भाव से करते रहना चाहिए। राग-द्वेष रहित होकर जो व्यक्ति कार्य करता है, उसके शुभ-मंगल की चिंता श्री ठाकुर को रहती है।
धनाजी की वाणी सुनकर हाली पत्नी शांत और निश्चिंत हो गई। उसका मन धना के प्रति श्रद्धा से भर गया। बलि के अवतार धना भक्तिमान पुरुषों में श्रेष्ठ कहे जाते थे। भले ही वे एक कृषक पिता के पुत्र थे, किंतु उनमें भक्ति के संस्कार पूर्वकृत थे। संत, महात्माओं की निरंतर सेवा से उनमें डाह, द्वेष का लवलेश नहीं था। वे जितेन्द्रिय, निष्काम, शांत तथा सर्वहितैषी प्रवृत्ति के थे। उनके मन में हर किसी का भला करने की भावना सदैव रहा करती। ऐसे हरिनाम सुनते ही पुलकित हो जाने वाले भक्त की वाणी सुनकर कोई प्रभावित क्यों न हो जाए ?
'सन्तः स्वयं परहिते विहिताभियोगा।' धनाजी का सारा ही चिंतन परहित के लिए था। वे स्वजाति के लोगों की ईश्वर विमुखता देखकर सोच में पड़ जाया करते थे। उनकी जाति अन्न उत्पन्न कर सब का भरण पोषण करती है। उसके उत्पन्न किए अन्न में जब तक शुद्धता के भाव नहीं होंगे, उस अन्न से पोषण पाने वाले व्यक्ति के विचार शुद्ध कैसे होंगे ? जब धनाजी ने धनावंश पंथ की स्थापना की तो उन्होंने अपने धनावंशी भाइयों को प्रमुख सीख यही दी थी कि भगवसेवा परायण भाव से कृषिकर्म करना है। तुम्हारा अन्न खाकर व्यक्ति में उच्च एवं मानवीय भावों का उदय हो जाए। साधु का उत्पन्न किया अन्न बड़ा कीमती होता है इसलिए कृषिकर्म के समय भगवद्भक्ति को साथ रखें। सच्चा धनावंशी वही है जो गुण एवं शील का स्मरण सदैव रखे।
धनाजी महाराज के जीवन में पग-पग पर चमत्कार घटित हो रहे थे, वे चाहते तो एक चामत्कारिक पुरुष के रूप में प्रसिद्ध हो सकते थे, किंतु उन्होंने ऐसा नहीं किया। उनका लक्ष्य चमत्कार पैदा करना नहीं था बल्कि भगवद्कृपा प्राप्त करने का था। परमात्मा की प्राप्ति किसी चमत्कार से संभव नहीं है। बिना प्रभु शरणागति के उसे प्राप्त करना कोई हंसी-खेल नहीं है। जो व्यक्ति ब्रह्मके मार्ग में प्रतिष्ठित नहीं हो सका, उसकी तो गति संभव नहीं है।
धनावंश के प्रवर्तक श्री धनाजी महाराज कोई सामान्य व्यक्ति नहीं थे। उन्होंने मन, कर्म और वचन को परमात्मा के प्रति समर्पित कर दिया था। उनके कर्म चिन्मय हो चुके थे, क्योंकि वे प्रतिक्षण मनसा, वाचा और कर्मणा परमात्मा को ही भजते थे। जो व्यक्ति माया के प्रपंचों और प्रबंधों में उलझ जाता है वह एकनिष्ठ भक्ति नहीं कर पाता। जो सदाचारी नित्यप्रति मानस में प्रभु की ही लगन लगाए रखता है, वही दिव्य तथा पुण्यशाली है। धनाजी महाराज ऐसे पुण्यशाली लोगों में से एक थे।
यह कहा जाता है कि अनेक जन्मों के अभ्यास से आत्मसिद्धि प्राप्त होती है और धनाजी महाराज के बारे में भी यही प्रसिद्ध है कि वे भगवान बलि के अवतार थे। इसलिए उन्हें भगवद्प्राप्ति में कोई अधिक कठिनाई नहीं हुई। कठिनाई तब होती है जब व्यक्ति योग से विचलित हो जाता है। विचलित तथा व्यथित व्यक्ति को भगवद्याप्ति संभव नहीं है। जो अकल्याण के मार्ग पर चलना प्रारंभ करता है उसका तो कल्याण संभव ही नहीं है। धनाजी महाराज के जीवन वृत्त को देखते हैं, तो पाते हैं कि वे किसी पर संशय करते ही नहीं थे। संशयहीन हो जाना कम मुश्किल नहीं है। जब बाल्यकाल में एक संत ने यह कहा कि तुम्हें जो शालग्राम प्रदान कर रहे हैं, यह भगवद्रस्वरूप ही है। धनाजी ने पंडित की इस बात पर जरा भी अभरोसा नहीं किया।
कहा भी जाता है कि 'संशयात्मा विनश्यति' संशय से आत्मा का विनाश होता है। धनाजी ने भगवद्माप्ति के मार्ग में संशय को तनिक भी अपने निकट नहीं फटकने दिया। यही कारण है कि उनके सभी सांसारिक कार्य स्वतः ही फलित होते गए। हम भले ही उन कार्यों को किसी चमत्कार की श्रेणी में रखते रहे हैं, पर धनाजी के लिए तुंबों में से निकलने वाले मोती कोई आश्चर्य नहीं था। हां, टोंक के नवाब के लिए अवश्य यह एक अचंभे में डाल देने वाली घटना थी। किंतु, भक्त जानता है कि जो परमेश्वर के अधीन हो जाता है, जिसकी भगवद् शरणागति हो जाती है, वहां सबकुछ चमत्कार ही है। धनाजी महाराज अपने जीवन में केवल एक ही बात को सोचते थे कि मेरे द्वारा कोई ऐसा अपराध न हो जाए जिससे मैं प्रभु की मैत्री से वंचित हो जाऊं। उनका प्रेम भगवान के साथ मैत्री का यानी अटल मित्रता का था। वे भगवान को अपना मित्र जानकर निश्चिंत हो गए थे। उनके सारे कार्य उनके मित्र परमात्मा ही संपादित किया करते थे। स्वयं, भगवान का कथन है कि तुम मेरी मैत्री में निश्चिंत हो जाओ। मेरे प्रति निश्चिंत होजाने वाले को मैं सभी तरह से अलंकृत कर देता हूं। अलंकरण भक्ति का भी होता है और वैभव का भी।
हम धनाजी के जीवन पर दृष्टिपात करते हैं तो देखते हैं कि उनका जीवन सर्वथा निश्चिंतता और निर्भयता पर टिका हुआ था। धनाजी का जीवन परमात्मा की आज्ञा और गुरु सन्निधि पर पूर्णतया निर्भर था। गुरु के वचन उनके लिए शिरोधार्य थे। लोह की लकीर थे। गुरु रामानंदजी ने उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर, उन्हें यह आदेश प्रदान किया कि तुम्हें अपने जाति वर्ग में भगवद्भक्ति की स्थापना करनी है। बताओ, कल्याणकारी शिष्य इस गुरु आज्ञा को वे कैसे नकार देते ? धनाजी ने तनिक भी संशय नहीं किया गुरु आज्ञा पर और धनावंश जैसे वैष्णव पंथ की स्थापना कर डाली। उन्हें किसी पंथ स्थापना की आवश्यकता नहीं थी। किंतु, गुरु ने कहा- धर्म बचाना है और इसकी वृद्धि भी करनी है। गुरु कह रहे हैं तो कुछ सोचकर और कल्याणप्रद है, इसलिए कह रहे हैं। तब धनावंश की स्थापना से वे कैसे मुकरते ? धनावंश की स्थापना के पीछे उनकी यह मंशा थी कि मेरे सभी अनुयायी भगवद्प्रेरणा से भावित होकर, भक्ति के मार्ग पर चल पड़ेंगे। पंथ की स्थापना से वे सभी जो धार्मिक अवधारणाओं से अनभिज्ञ हैं, धर्म अनुप्राणित आचरणों से संवलित होकर सदाचार के मार्ग पर चलना प्रारंभ कर देंगे। उनकी यह सोच सही निकली। धनावंश में शामिल लोगों ने वैष्णव धर्म व्रत धारण किया। धर्म मार्ग पर चलने वाले व्यक्ति के लिए परमात्म प्राप्ति कठिन नहीं है।
विभिन्न प्रकार के सुख और ऐश्वर्य में फंसकर व्यक्ति ईश्वर से विमुख हो जाता है और ईश्वर से विमुखता बड़ी दुखदाई होती है। क्योंकि किसी भी प्राणी के जन्म धारण करने का मूल उद्देश्य तो उच्च स्थिति की प्राप्ति ही तो है। और वह उच्च स्थिति मोक्ष के अलावा दूसरी क्या हो सकती है? धनाजी का बताया हुआ मार्ग, हर धनावंशी के लिए उद्धार का मार्ग है। साधपन का सेवन ही धनावंश का मुख्य उद्देश्य है।
जब से खेत में पूरे दिन बिना बीज के हल जोता था, तब से हाली की स्थिति बड़ी विचित्र थी। वह मन ही मन सोच रहा था कि बीज साधुओं को बांटने के पश्चात धना के मन में तो माता-पिता का डर समाया हुआ था, बिना जोते खेत को देखकर वे उलाहना देते, इसलिए धना ने यह प्रपंच किया, पर वह इस प्रपंच में क्यों शामिल हुआ ? धना ने उसको यह भी समझा दिया था कि खाली हल चलाने की बात किसी से कहनी नहीं है, किंतु हैरत में पड़े हाली से रहा नहीं गया और उसने चौपाल में यह बात सब को बता दी कि धना के संग उसने पूरे खेत में बिना बीज के हल चलाया है। उसने व्यंग्य में कहा कि देखें, इस बार बिना बीज की खेती किस तरह निपजती है ?
चार-पांच रोज बाद हाली कुतुहलवश खेत को देखने गया तो दंग रह गया। जिस खेत में उन्होंने एक बीज नहीं डाला था, वहां हरी-भरी फसल खड़ी दिखाई दे रही थी। अब हाली से रहा नहीं गया, पहले तो वह स्वयं के घर आया और सबसे पहले हालिन यानी अपनी पत्नी को यह समाचार सुनाया। हालिन समझ गई कि भक्तों के सब कार्य भगवद्प्रेरणा से होते हैं। उसने अपने पति से कहा कि हमें त्वरित चलकर भक्त धना के घर जाना चाहिए और इस प्रसंग में क्षमा मांगनी चाहिए। हमने बेवजह एक भक्त के क्रियाकलापों के संबंध में अविश्वास किया और धैर्यहीनता का परिचय दिया।
धना के घर आकर हाली दंपती उनके चरणों में गिरकर क्षमा मांगने लगे। धना ने पूछा- आप दोनों हमारे पांवों में क्यों गिर रहे हैं, ऐसा क्या हो गया? उन्होंने कहा-हमें क्षमा करें, हम आपके किसी कृत्य को नहीं जान सकते, आप तो स्वयं अंतर्यामी ही हैं। हम अपने भाग्य की सराहना करते हैं कि हमें आपका संरक्षण मिला है।
धना ने हाली को पैरों से उठाते हुए कहा- कुछ बताओ तो सही कि आखिर हुआ क्या है? हाली ने डरते-डरते कहा- स्वामी, जिस खेत को हम ने बिना बीज के जोता था, उसमें अब फसल लहलहा रही है। यह कैसा चमत्कार हो गया। स्वामी, आपकी लीला को कोई जान नहीं सकता। मैं तो अब भी नहीं समझ पा रहा हूं कि यह हुआ कैसे ?
धना ने हाली की पीठ पर हाथ धरकर कहना प्रारंभ किया-इस संसार के नियंता ठाकुर स्वयं हैं। वे धरणीधर यूं ही नहीं है। इस संसार को उन्होंने धारण कर रखा है, तभी वे धरणीधर कहलाते हैं। परमात्मा की प्रेरणा से सारा कार्य होने पर सारा आश्रय उन्हीं का रहता है, उनके लिए कुछ भी कठिन नहीं है। धना ने हाली को घर जाने को कहा और जाते-जाते परिहास किया कि परमात्मा को तुम्हारे बाटे की चिंता हो गई, इसलिए यह सब हुआ है।
हाली दंपती प्रणाम कर निकल गए। धनाजी की परची में वर्णन मिलता है कि उस वर्ष धना के खेत में अनाज पड़ौसियों से दुगुणा हुआ।
न केवल बिन बाहे अन्न उगने की बात थी। धनाजी के जीवन में जब भी कोई अभाव या मुश्किल उत्पन्न होती तो भगवान उसे किसी न किसी रीति से हल कर दिया करते। प्रकृति भी धनाजी के लिए महरबान हो गई थी। संत धनाजी के सान्निध्य में धुआं क्षेत्र में हवा-पानी का दूषितपन दूर हो गया। अधिकांश अच्छी वर्षा हुआ करती, जिससे सारे गांव में किसान प्रसन्न रहा करते। भक्त के सान्निध्य का लाभ उन्हें भी प्राप्त हो रहा था।
धनाजी का काशी गमन
धुआं गांव में मान्यता है कि धना भगत में श्रद्धा रखने वाले निकट के बारह गांव हैं, इन्हें प्राचीन समय से धना भगत के बारह गांव कहा जाता है। इन बारह गांवों की सूची इस प्रकार है- (1) धुआं कलां (2) महमूदगंज (3) थली (4) पालगंज (5) छोटा धुआं (6) इन्दोरा (7) हाडोती (8) सांकणा (9) गैरोटी (10) सांकणी (11) गहणिया तथा (12) आगस्या। धना भगत मंदिर के निमित्त किए जाने वाले किसी भी कार्य में इन गांवों के श्रद्धालुओं का सैकड़ों वर्षों से योगदान रहा है। इन गांवों में परंपरा से धना भगत जी की अनेक कथाएं तथा किंवदंतियां प्रचलित रही हैं। महमूदगंज के पंडित केदार शर्मा के अनुसार धनाजी का जन्म तो फागी के निकट चौरू में हुआ, जो कि उनका ननिहाल था लेकिन उनका लालन-पालन यहां धुआं में ही हुआ। उनके अनुसार धनाजी घेतरवाल जाट थे। उनका घर धुआं में गढ़ के निकट था। धना अपने माता-पिता की एकमात्र औलाद थे। चाचा, ताऊ भी नहीं थे, पर गांव की सभी जातियों के लोग धनाजी महाराज में गहन श्रद्धा रखते थे। वे गांव के हर व्यक्ति से प्रेम करते थे। यहां जन में किंवदंती रूप बहुत से प्रसंग प्रचलित हैं।
माता-पिता के एकमात्र पुत्र होने पर सोलह वर्ष की अवस्था में ही धना का विवाह निकट के ही किसी गांव में हो गया। परचियों तथा कतिपय अन्य उल्लेख में धनाजी की भार्या का नाम हरिदासी बताया गया है। वह किस गोत्र से थी, इसका उल्लेख नहीं मिल रहा है। धनाजी की धर्मपत्नी के स्वभाव का उल्लेख अनंतदासजी ने अपनी परचई में मुखर होकर किया है-
और धनां कै घर में नारी।
सो है पति की आग्याकारी ।। 22
महंत बदरीदासजी धनाजी की धर्मपत्नी के चरित्र का वर्णन करते हुए लिखते हैं-"धना की शादी हो गई। पुण्य के प्रभाव से स्त्री भी बड़ी धर्मात्मा मिली, वह पति की पूर्ण आज्ञाकारी थी। पति के बगैर किसी की दी हुई चीज स्वीकार नहीं करती थी। संसार से बड़ी उदास रहा करती थी। पति की तरह प्रभु का ध्यान करती और सब को रामरूप ही समझती थी। 28 (समदृष्टि दृढ ध्यान लगावें, सब घट अंतर राम पिछाणे) कहा जाता है कि भक्ति के क्षेत्र में धना अग्रगण्य अपनी धर्मपत्नी के कारण ही गिने गए। उनके बाल्यकाल के भक्ति संस्कारों को युवा एवं प्रौढ़काल में बनाए रखने में हरिदासी का बड़ा योगदान था। रामानंदजी के शिष्य पीपाजी की धर्मपत्नी सीता सहचरी की ही भांति भक्ति के क्षेत्र में हरिदासी भी कम नहीं गिनी जाती हैं। धनाजी से संबंधित अनेक दिव्य प्रसंगों में हरिदासी के उल्लेख भी अत्यधिक महत्त्वपूर्ण हैं।
किंवदंतियों में बताया गया कि जब धना ने रामानंदजी को गुरु बनाने के लिए काशी जाने का निश्चय किया तो उनके समक्ष प्राथमिक तौर पर जो संकट उपस्थित हो रहा था, वह राह खर्च जुटाने का था। धनाजी ने यह परेशानी अपनी धर्मपत्नी को बताई तो उसने कहा, आप एक बार अपने मित्र से यह बात कहो। आपके भोग लगाने पर वे स्वयं उपस्थित होकर भोग ले लिया करते थे तो अब मदद क्यों नहीं करेंगे ?
धनाजी को पत्नी का सुझाव तो उत्तम लगा, किंतु चूरमें का प्रसाद ग्रहण करने और बदले में गायें चराने की बातें तो पुरानी हो चुकी। बालभक्तों के प्रति तो भगवान वैसे ही अधिक दयालु होते हैं, पर मैं अभी भी अपने ठाकुर को आजमाऊंगा अवश्य। रामानंदजी के पास जाने की प्रेरणा भी तो स्वयं उनकी ही रही है। निश्चय ही वे ही वहां तक पहुंचने का प्रबंध करेंगे। धना के सामने दूसरा संकट उनकी गायें चराने का भी था। काशी तक जाने-आने में कई माह का समय लगता है।
पत्नी ने आज पुनः ठाकुर को चढ़ाने के लिए चूरमें का प्रसाद बनाकर दिया। धना शालगराम को साथ लेकर खेत में चला आया। वहीं उसी स्थल पर शालगराम को विराजित कर ठाकुर की प्रतीक्षा करने लगा। थोड़ी ही देर में ठाकुर प्रकट हो गए। उनके हाथ में एक छोटी-सी थैली थी। आते ही धना को अपने गले लगाया और हाथ की थैली दिखाते हुए कहा, बताओ, इसमें क्या है? धना कुछ समझा नहीं, असमंजस में रहा तो भगवान ने उस थैली को अपनी हथेली पर उलट दिया। उसमें चांदी के सात रुपए थे। भगवान ने कहा-धना, तुम इन रुपयों को काशीजी की यात्रा के दौरान आवश्यक मद में खर्च करना, ये कभी समाप्त नहीं होंगे। इस थैली में ये सदा बने रहेंगे।
धना रुपए पाकर गद्गद हो गया। अब गुरुदेव तक जाने में कोई दुविधा नहीं होगी, पर थोड़ी ही देर में उसका चेहरा मुरझाने लगा। वह सोच में डूब गया। भगवान ने धना के कंधे का स्पर्श कर कहा- अब उदास क्यों हो रहे हो ?
धना ने संकोच से कहा- भगवन्, इतने दिनों तक मेरी गायें कौन चराएगा, खेत की रखवाली कौन करेगा ?
- तुम्हारा हाली बनकर यह कार्य तब तक मैं करूंगा, जब तक तुम काशीजी से लौटकर न आ जाओगे। भगवान ने आश्वासन दिया।
धना गिड़गिड़ाने लगा-भगवन्, आप कभी मेरी गायें चराते हैं, कभी हाली बनने के लिए तैयार होते हैं, मैं आपका यह एहसान कैसे चुका पाऊंगा ?
भगवान ने कहा-धना, तुम सारे संसार में अपनी भक्ति का निर्मल प्रकाश फैलाकर मेरा एहसान चुका सकते हो। मेरा स्वभाव है, मैं अपने भक्तों की मदद करता ही हूं। इसमें अनोखा कुछ नहीं है।
अगले ही दिन धना काशीजी की यात्रा के लिए रवाना हो गया। पीछे से भगवान धना की पत्नी के पास एक हाली का रूप धरकर आए और कहा कि में निकट के गांव का रहने वाला है, धनाजी ने मुझे गायें चराने के लिए रखा है. में प्रतिदिन गायें ले जाऊंगा और सायंकाल को आपके घर छोड़कर अपने गांव चला जाया करूंगा। धनाजी की पत्नी और माताजी को इसमें क्या एतराज था। कहते हैं, धनाजी
के पिता का देवलोक गमन धना के युवाकाल में ही हो गया था। वे एक भारी और बलिष्ठ शरीर के व्यक्ति थे। कुछ अरसे पूर्व ही उनकी हठात मृत्यु हो गई थी। अब घर का मुखिया पुरुष रूप में धना ही था। धना अपनी माता गंगाबाई से आज्ञा ग्रहण कर काशी यात्रा को रवाना हो गया। धना ने रास्ते के दूसरे तीर्थस्थलों का भी पड़ाव व दर्शन किए। उनके साथ धुआं तथा आस-पास के दूसरे कुछ गांवों के तीर्थयात्री भी थे।
जब अपने साथियों के साथ धनाजी प्रयागराज पहुंचे, उस समय स्नान कर वे लोग एक मंदिर प्रांगण की ओर बढ़ रहे थे, उसी समय धना ने आकाश की ओर मुंह कर अपने एक साथी को संबोधित कर कहा-पटेल हमारे गांव पर ओले (गड़े) पड़ने वाले हैं। पटेल जानता था कि धना झूठ नहीं बोलता है, रास्ते में वह धना के अनेक चमत्कारों को देख चुका था। उसे धना की बात सही लगी। पटेल ने कहा-धना, अभी फसल उगती हुई है, अगर गड़े (ओले) पड़ गए तो पूरा गांव बरबाद हो जाएगा। धना, तू चाहे तो उन गड़ों को अपनी पावड़ी (जूती) में समेट सकता है। धना ने उपस्थित जनों को आश्वासन दिया। कहते हैं, धना ने उसी समय ठाकुरजी के समक्ष अरदास लगाई तो गड़े प्रारंभ होकर वहीं रुक गए, केवल गांव की नाडी पर बरस कर रह गए। वापस लौटने पर गांववालों ने पटेल को यह बात बताई। तब पटेल ने सब को बताया कि यह बात तो धना को वहां बैठे ही पता चल गई थी, उसी ने हमें ओलों की बरसात से बचाया है। धना ने उस समय पावड़ी खोलकर यह प्रार्थना की थी कि गड़े केवल पर नाडी पर पड़कर रह जाए और ऐसा ही हुआ। 29
काशी में पहुंचने के बाद एक-दो दिनों में धना ने अपने संग के तीर्थयात्रियों को रवाना कर दिया तथा स्वयं पंच गंगाघाट के श्रीमठ में रुक गए। यही जगद्गुरु रामानंदजी का स्थल था। यहीं से वे पूरे भारत में राष्ट्रीय चेतना जगाने का ऐतिहासिक कार्य कर रहे थे। श्रीमठ में पहुंचकर धनाजी चमत्कृत हो गए। पूज्य रामानंदजी के अनेक बड़े-बड़े संत शिष्य-प्रशिष्य थे। वैष्णवता के संप्रसार का यह महान स्थल था। सुरसुरानंद जैसे शिष्य उनसे तत्त्व ज्ञान से संबंधित प्रश्न कर रहे थे और आध्यात्मिक संत रामानंदजी उनके प्रत्युत्तर बहुत सहज भाव से दे रहे थे। 30 वे देवभाषा के रूप में संस्कृत तथा जनभाषा के रूप में देसी भाषा में अपना प्रबोधन दे रहे थे। धनाजी को यह जानकर आश्चर्य हुआ कि श्रीमठ में श्रीराम सीता के साथ हनुमत पूजन को भी बड़ा महत्त्व दिया जाता है। हनुमदस्तुति के रूप में रामानंदजी कृत- हनुमान आरती' गाई जाती। " स्वयं उनके जाट समाज में भी हनुमानजी पूज्य देव हैं। धना को यह देखकर और भी आश्चर्य हुआ कि रामानंदजी अपने यहां सभी जातियों, वर्णों, धर्मों को मान्यता दे रहे थे। उनके यहां कोई शास्त्र बंधन नहीं था। श्रीमठ के चरणों पर लोट रही गंगा सबको पवित्र कर देती है।
धनाजी श्रीमठ आश्रम में जाते ही स्वामीजी के चरणों में गिर पड़े। स्वामीजी का दर्शन कर उनकी आंखें निहाल हो गईं, वे उन्हें अपने सखा गोपाल जैसे ही प्रतीत हो रहे थे। उन्हें वे किसी भी रूप में ठाकुरजी से कम नहीं लग रहे थे। गुरुजी ने उन्हें उठाकर गले से लगा लिया। धनाजी ने धूजते कंठों से अपना परिचय दिया-महाराज, यह धनिया है, राजपूताना से आया है, अपना कल्याण चाहने के निमित्त।
"अरे लाडले, तुम धनिया नहीं धनेष्ठ (श्रेष्ठ धन) हो। भक्ति के क्षेत्र में तुम्हारी कीर्ति अमर रहेगी, तुम्हें एक निर्मल भक्त के रूप में याद किया जाएगा।"
धना ने कहा- मुझे अपनी शरण में लीजिए महाराज। मुझ में अल्हड़ जाट बुद्धि है, भक्ति की तनिक भी समझ नहीं है।
रामानंदजी ने कहा-ना धना, ऐसी बात नहीं है। भारत भू की कोई जाति उपेक्षणीय नहीं है, सब में भक्ति के सहज संस्कार हैं। तुम्हारी जाति तो स्वभाव से ही सेवा के संस्कारों से ओतप्रोत है। कृषि उद्यम के नाते उसका विरुद अन्नदाता का है। और किसको अन्नदाता कहा गया है? सेवा से सिद्धि बहुत शीघ्र प्राप्त होती है। हर किसी की सेवा करो, सहज ही में परमात्म प्राप्ति हो जाएगी।
धना ने कातर वाणी में कहा- पर महाराज, मैं तो कुछ भक्ति विधान जानता ही नहीं, मेरी नैया कैसे पार लगेगी? गुरुदेव ने हंसकर कहा- तुम्हें ब्रह्मवाद और तत्त्व ज्ञान को जान लेने से क्या तात्पर्य है। तत्त्ववादियों की गायें भगवान कब चराते हैं? हजारों वर्षों तक तप कर तपस्वी जिसे हासिल करने की चाहत रखते हैं, वह तो तुम्हें सात वर्ष की अवस्था में ही मिल गया। पर याद रखो धना, जो मिलता है, वह बिछुड़ता भी है। उपास्य को सदैव प्राप्त कर लेना ही आत्मज्ञान है। वैष्णव होने के नाते तुम्हें अगर कोई ऊपरी वृद्धि ही करनी है तो मैंने सुरसुरानंद को यह सब भली प्रकार समझाया है कि वैष्णवों का तत्त्व क्या है, उनका जाप्य मंत्र क्या है, इष्ट स्वरूप को कैसे जाने, वैष्णवों का चिंतन कैसा रहे? ये सब बाह्यांतर की बातें हैं। इनका ज्ञान करना कठिन नहीं है। तुम जैसे भी हो, मुझे शिष्यरूप में स्वीकार हो।
धना गुरु महाराज की ऐसी वाणी सुनकर आह्लादित हो गया। वह पुनः चरणों में गिर पड़ा। उसने देखा, उपस्थित बहुत सारे संत उन्हें अनुरागमयी दृष्टि से देख रहे थे। थोड़ी ही देरी में गुरु महाराज ने सब को संबोधित कर कहा-यह मेरा नन्हा शिष्य
दिव्यातिदिव्य है। तादात्म्य की प्रतिमूर्ति है। भगवान इसके अनुराग में बंध गए। इसका प्रपत्ति मार्ग विलक्षण है। परमात्म सामीप्यता के कारण यह प्रणम्य है।
सभी उपस्थित संत उठकर ठाकुर प्रिय धना को प्रणाम करने लगे। धना संकोच में डूब गए। वे आंख मींचकर भगवान से प्रार्थना कर रहे थे, हे गोपाल, सहाय करो, क्या इसलिए यहां भिजवाया था! ऐसे दिव्य गुरु महाराज और ऐसी ही इनकी दिव्य शिष्य मंडली। कहां मैं परम गंवार। दयालु गुरु महाराज ने कह दिया तो ये प्रणिपात कर रहे हैं, वरना मैं तो कुछ विधान ही ना जानूं। धना संकोच में डूबते ही जा रहे थे किंतु उनका मान करने वाले रुक नहीं रहे थे। क्योंकि वे जानते थे कि जिनकी भक्ति की प्रशंसा स्वयं गुरु महाराज कर रहे हैं, वह सामान्य वैष्णव नहीं हो सकता। गुरु महाराज के सभी शिष्यों में अनंतानंद स्वयं ब्रह्माजी के अवतार, सुरसुरानंद नारद मुनि थे, शंभु के अवतार सुखानंद, नरहरियानंद साक्षात् सनत्कुमार के अवतार, पीपाजी स्वयं मनुजी के अवतार, प्रह्लाद के अवतार कबीरजी, भीष्म के अवतार सेनजी, यम के अवतार रैदासजी, ऐसी विद्वत मूर्तियों के मध्य मैं वाणी का मर्म न जानने वाला ग्रामीण क्या कहूं ! धना ने आंखें मूंद लीं। विख्यात मूर्तियों के साथ बहुत से अविख्यात संत भी उपस्थित थे। सभी ने धनाजी की भक्ति निपुणता को जाना तो वे धनाजी की प्रपति की शोभा करने लगे।
तब धनाजी को और कुछ नहीं सूझा, वाणी लूंठित हो गई। वे खड़े हुए और साष्टांग दंडवत मुद्रा में पसर गए तथा हे ठाकुर, हे ठाकुर कहने लगे। तेजस्वी सुरसुरानंद उन्हें कक्ष में ले गए। उन्हें गुरु महाराज के मंतव्य से परिचित कराया। भीतरी कक्ष में रामानंदजी के पास ले गए, वहां उन्होंने धना को प्रतापी, समर्थ मोक्षदायी राममंत्र की दीक्षा प्रदान की। कहा- धना, समष्टि का तारण करने के लिए यह अमोघ मंत्र है। इसे छुपाने की आवश्यकता नहीं है, इस मंत्र को हर किसी में फूंकने का यत्न करो। तुम सद्गृहस्थ हो, तुम्हें संन्यास की दीक्षा नहीं दी जा सकती है। जाओ, वैष्णवता के सूर्य का प्रकाश करो।
धना पुनः गुरु महाराज के चरणों में गिर पड़े और निवेदन किया-हे गुरुदेव, आपके गुणों तथा उदारता का वर्णन नहीं कर सकता, मुझ गंवार पर आपने जो अहेतुक कृपा सहज में की है, उससे मुझे अनुभव होता है कि मुझ पर गोपाल की असीम कृपा है। गोपाल ने मुझे आपसे दीक्षित होने के लिए किसलिए भेजा, वह मर्म अब मेरे समझ में आ रहा है।
मृदुल स्मित हास करते हुए रामानंदजी ने कहा- तुम जिस मार्ग पर हो, वह अति उत्तम और कल्याणकारी है। सामान्य जन और संतों की सेवा करते रहो, आज से तुम भी वैरागी हो। वैराग्य का संप्रसार करो। कल्याणकारी प्रभु का निरंतर ध्यान रखो, वही योगक्षेम करने वाला है। कलियुग के प्रताप से यह संसार अधर्ममय होता जा रहा है। धर्म-कर्म में प्रीति छूटती जा रही है। गृहस्थ में रहते हुए सद्कर्ममय जीवन देखकर दूसरे जन को तुम्हारे से कृत्य-अकृत्य की प्रेरणा प्राप्त होगी। शुभ मार्ग भूले हुए जन को धर्मपथ पर आरूढ़ व्यक्ति के कर्म से अधिक प्रेरणा मिलती है।
स्वामी रामानंद को धना की नैसर्गिक भक्ति भावना ने बहुत अधिक प्रभावित किया था। ऐसे निस्पृह भक्त बहुत कम मिलते हैं। वे संपूर्ण भारत में भक्ति को ही स्थापित करना चाहते थे। स्वयं रामानंदजी ने 'वैष्णव मताब्ज भास्कर' में कहा है कि मोक्ष सम्प्राप्ति में भक्ति से श्रेष्ठ कुछ भी नहीं है। मुमुक्षुजन भगवान की शरण में चले जाएं तो उन्हें उद्धार हेतु दूसरे किसी मार्ग का चयन करना आवश्यक नहीं है। " रामानंदजी का मत था कि भगवद् शरणागत को किसी व्यर्थ प्रपंच में नहीं लगाना चाहिए। वह जिस मान्यता के बल पर परमात्मा के साथ तादाकार है, उसके लिए वही मार्ग उत्तम है। 32
रामानंद इस बात के पक्षधर थे कि जब ऋषियों के नाम पर कुल, गोत्र, जाति, समूह बन सकते हैं तो भगवान के भक्तों के नाम पर भक्ति समूह क्यों न बने ? रामानंद के शिष्यों-प्रशिष्यों के नाम पर बने पंथ संप्रदाय उनकी इस भावना को ही कहीं न कहीं पोषित करते हैं। "स्वामी रामानंद के नेतृत्व में वैरागियों ने काशी, मथुरा, चित्रकूट, प्रयाग तथा मिथिला में भक्ति आंदोलन को विशेष धार प्रदान की। उनके द्वादश शिष्यों ने पश्चिमी और उत्तरी भारत में भक्ति का परचम लहरा दिया। इनमें कबीर, रैदास, पीपा, धना, सेन, नरहरियानंद ने भक्ति आंदोलन को व्याप्ति देने में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया।" 33
पंथों की स्थापना कर भक्तिमार्ग को सुगम बनाने की धारणा रामानंदजी की सदैव रही। उनके देवलोक गमन के पश्चात भक्तिधारा मंद न पड़े इसलिए भी भक्ति पंथ आवश्यक थे। काशी में पंच गंगा घाट स्थित श्रीमठ से भक्ति आंदोलन का प्रवर्तन करने में उनके शिष्य अनंतानंद का भी कम योगदान नहीं रहा है।
रामानंदजी अपने इस नव शिष्य धना से बहुत आशान्वित हुए। उन्हें भक्ति का संप्रसार करने का आदेश प्रदान किया। राजनीतिक दृष्टि से यह अपकर्ष युग था। देसी राजाओं का पतन होता जा रहा था तथा विदेशी शक्तियां यहां सुदढ़ होती जा रही थी। इस समय दिल्ली पर सिकंदर लोदी का राज्य था, वह हिंदू धर्मपंथों के प्रति घोर असहिष्णु था। मंदिरों को नष्ट करने और ब्राह्मणों का वध करने में तो वह एक था। 34 वैष्णवता के उत्थान से आध्यात्मिकता और धार्मिक मूल्यों को बचाया जा सकता था। रामानंदजी का मंतव्य यही था, इसलिए उन्होंने उदार वैष्णवता के प्रचार का माध्यम अपनाया। उन्होंने विष्णु के सगुण-साकार तथा ईश्वर के निर्गुण निराकार दोनों रूपों को मान्यता प्रदान की। वे वैष्णव धर्म को येन केन प्रकारेण लोकधर्म बनाना चाहते थे। इसमें पौराणिक के साथ-साथ बहुत सी मान्यताएं वैदिक भी थीं। रामानंदजी चाहते थे कि हर संत के कुछ अनुयायी तैयार हों, अनुयायियों का समूह ही पंथ या संप्रदाय का रूप धारण कर लेता है। वे जानते थे कि ये पंथ ही कुछ काल बाद जाति का रूप धारण कर लेता है। रामानंदजी ने जब भारत भू की यात्रा की तो धर्म को लेकर उनकी दृष्टि संकुचित नहीं रही। "रामानंद ने इस सिद्धांत का दृढ़ता के साथ प्रतिपादन किया कि राम की शुद्ध मन से उपासना करने वाले बिना किसी जाति भेद के एक साथ खा-पी सकते हैं। उन्होंने छोटों को ऊपर उठाया और उनको सामाजिक और धार्मिक एकता दी।" 35 उनके धर्म संस्थापन एवं प्रसार के मंतव्य को अपने प्रवास काल में धनाजी ने भली प्रकार से जानने का यत्न किया।
कतिपय दिन काशी में रहकर अनेक संभावनाओं से संयुक्त होकर धना अपने गांव की ओर रवाना हो गए।
घर पहुंचने पर धनाजी की धर्मपत्नी अत्यधिक प्रसन्न हुई। धनाजी की धर्मप्राण माताजी की प्रसन्नता का तो कोई पार ही नहीं रहा, उनका पुत्र काशीजी से लौटा है। काशी तो वह स्थान रहा है, जहां पांच दिन रहने पर भी व्यक्ति पढ़ा-लिखा हो जाता है। पुत्र के गले में गुरु महाराज की डाली हुई तुलसी की माला, ललाट पर श्री टीका उनके पुत्र की आभा बढ़ा रहा था। बांह पर शंख चक्र गदा पदम की छाप लगी हुई थी। इससे सौभाग्य की दूसरी कौनसी बात। पत्नी ने कहा- आप बड़े भाग्यशाली हैं, मोक्ष नगरी में जा आए, भगवान शिव अपने चरणों में आने वाले हरेक प्राणी को एक ही वरदान देते हैं और वह है मुक्ति का वरदान। दूसरे गुरु महाराज ने सुगरा कर दिया, भला बताओ नुगरे का भी कोई जीवन होता है ? धना मुस्कुराकर रह गए। धना ने माता को प्रणाम किया। गुरु महाराज के यहां से लाई हुई वैष्णवीय सामग्री माता को भेंट की। सामग्री पाकर उनको स्वयं यह लगा कि वह भी यात्रा कर आई है।
जब कुशल मंगल के उपरांत खेत की बात चली तो मां ने बताया कि तुम्हारा रखा हुआ हाली बड़ा स्याना है। अधिक बोलता नहीं, प्रातः काल गायें ले जाता है, खेत को भी रुखाल देता है तथा सायंकाल को गाएं छोड़कर अपने गांव चला जाता है। जिस दिन खेत में गड़े पड़ने वाले थे, उस दिन उसकी चिंता हुई, उसके पास तो भाखला भी नहीं था, गड़ों की चोट लगती, पर भगवान ने गड़े औसरते ही सुनली, केवल तलाई के इर्दगिर्द पड़कर रह गए। पराए आदमी का उलाहना आ जाता।
मां की बात से धना को अपने हाली की सुध आई। वह खेत जाने को उतावला हो गया, शीघ्रता से वह अपने गोपाल से मिलना चाहता था। खेत पहुंचा तो देखा गोपाल बहुत मनोयोग से गायों को चरा रहे थे। वह भागकर चरनों में गिरने को हुआ तो गोपाल ने थाम लिया। कहने लगे - धना तुम तो मेरे ही स्वरूप हो, तुमने रामानंदजी को गुरु करके अद्भूत कार्य किया है, अब तुम पूरे वैरागी हो चुके हो।
प्रत्युत्तर में धना से कुछ बोल ही नहीं फूट रहे थे, वह भगवान के एहसान के संबंध में कुछ कहना चाहता था, किंतु गोपाल तो मुस्कुराते मुस्कुराते तुरंत अदृश्य हो गए। वह हतप्रभ-सा स्वप्नलोक में विचरता-सा रह गया।
श्राद्ध निमंत्रण
एक दिन धनाजी तथा उनकी धर्मपत्नी हरिदासी ने परस्पर विचार-विमर्श कर श्राद्ध के दिनों में पितृ श्राद्ध करने तथा इस अवसर पर कुछ संत-साधुजन को भोजन कराने का निश्चय किया। धुआं कलां के निकट एक छोटी पहाड़ी पर कुछ साधु भजन किया करते थे। धना ने वहां पहुंचकर साधुजनों को कल प्रातः उनके निवास पर पधार कर प्रसाद ग्रहण करने का निवेदन किया और यह भी कह दिया कि महाराज और भी कोई साधु मिले तो उन्हें भी साथ ले आइएगा।
धना के निमंत्रण पर पहाड़ी वाले साधुगण आ गए और उन्होंने कहा कि हम तो स्वपाकी हैं। आप तो हमें सीधा दे दो, हम अपने हाथ से प्रसाद को पकाएंगे। धनाजी और उनकी धर्मपत्नी हरिदासी को इसमें क्या ऐतराज था, उन्होंने आटा, घी, शक्कर, तरकारी आदि आवश्यक खाद्य सामग्री दे दी। थोडी देर बाद साधुओं की कुछ और मंडली आई तो अपना अहोभाग्य समझते हुए उन्हें भी प्रसाद की सामग्री दे दी, पर धना के यहां आने वाले साधुओं की मंडली का तांता लग गया। घर की खाद्य सामग्री समाप्त होने लगी तो हरिदासी भागकर साहकार के यहां से सामग्री और ले आई. पर उस सामग्री को भी समाप्त होते देर नहीं लगी।
साधुजन उस सीधे (भोजन सामग्री) को लेकर गांव में जगह-जगह बैठकर भोजन बनाने लगे। भोजन प्रसादी बनाने वाले साधुओं की इतनी अधिक संख्या हो गई, जिससे गांव में धुएं का चौतरफ धकरोल हो गया। धना ने देखा साधुओं के आने का सिलसिला थम नहीं रहा है तो वह पहाड़ के निकट जाकर छुप गया। अब तो साहुकार ने भी उधार देने से मना कर दिया था। वे समस्त इंतजाम हरिदासी के भरोसे छोड़कर आ गए। उधार लाए सामान को भी समाप्त होते देखकर हरिदासी ने सामग्री के ऊपर तुलसी चढ़ाकर शालग्राम को विराजित कर दिया और कहा- धरणीधर, आपकी माया निराली है, इसे आप ही जानो। यह कहने के बाद सामग्री समाप्त नहीं हुई। हर कोई साधु धना की बड़ाई कर रहा था। "साधुओं ने अपनी-अपनी सामग्री ली और धना के घर के बाहर गांव में जगह-जगह रोटे (बाटे) बनाने के लिए छाणों (कंडों) की धूणी लगाई। इतने साधु आ गए कि पूरे गांव व उसके आस-पास के खेतों में भी जगह-जगह धूणे धुकने लगे। पूरा गांव धुएं में डूब गया। अतः उस दिन से उस गांव का नांव खेरीपुर से धुवां हो गया।" 36 गांव में साधुओं की धूणी का प्रसंग धनाजी के कथानक के संबंध में अन्य अनेक जनश्रुतियों में भी कहा जाता रहा है। सारी जनश्रुतियां इस बात में एकमत हैं कि धनाजी को साधु-सेवा का चाव बाल्यकाल से था और उन्हें ये संस्कार अपने माता-पिता से मिले थे। धनाजी के माता-पिता धनाजीकी युवावस्था में ही हरिशरण हो गए। पहले पिता, फिर मां का भी स्वर्गवास हो गया।
साधु निमंत्रण के इस प्रसंग में कहा जाता है कि स्वयं भगवान ने पहाड़ में छुपे हुए धनाजी को ढूंढ़ लिया और कहा कि इस प्रकार साधुओं को निमंत्रित कर सद्गृहस्थ का घर छोड़कर भाग जाना तो अत्यंत लज्जाजनक कार्य होता है, यह तो अच्छा हुआ तुम्हारी भार्या साधुजन हितैषी है, उसने एक भी साधु को भूखा नहीं जाने दिया। उसने सब को तृप्त किया है, पर अब हम सब साधु यहां से अपने-अपने ठौर-ठिकाने जाएंगे, पर बिना चींपी (भेंट) लिए जाएंगे तो तुम्हें प्रसाद करवाने का पूर्ण पुण्य प्राप्त नहीं होगा। अतः चलकर सब साधुओं को कुछ न कुछ भेंट दो। धना सोचने लगा कि साधुओं को कौनसी वस्तु भेंट करे, जो उनके काम भी आए।
घर आकर उसने सोचा, साधुओं के लिए जलपात्र के रूप में तबे का बड़ा महत्त्व होता है। गत वर्ष उसके खेत में असंख्य तूबे हुए थे, जिन्हें उन्होंने घर के पिछवाडे में इकट्ठे कर रखे थे। उसने सभी साधुओं को बडे-बडे तुंबे भेंट किए। साधुओं ने देखा कि क्यों न तुंबों की सफाई कर इन्हें जलपात्र के रूप में काम में ले लिया जाए। एक साधु ने तुंबे को चीरा तो वह अन्न से ठसाठस भरा हुआ था। उस साधु के देखादेखी सभी साधुओं ने अपने तुंबों को चीरा तो उनमें भी अन्न भरा हुआ था। साधुओं ने धना के घर में अन्न की ढेरी कर दी और आशीर्वाद देकर, तुंबे लेकर चले गए। धना और उपस्थित जनों ने देखा कि साधु को कराया गया भोजन व्यर्थ नहीं जाता। साधुओं को भोजन कराया था, उससे ज्यादा अन्न तो उन तुंबों से प्राप्त हो गया।
धुआं कला क्षेत्र में धनाजी के तुंबों को लेकर अनेक कथाएं प्रचलित हैं। यह भी कहा जाता है कि धनाजी ने टाँक के नवाब को कुछ तुंबे प्रदान किए, जिनमें से नवाब को बहुमूल्य मोती प्राप्त हुए। उसके बाद नवाब ने धना के खेत का लगान हमेशा के लिए माफ कर दिया। इस क्षेत्र में प्रचलित लोकभजन की पंक्तियों में भी तुंबा का उल्लेख प्राप्त होता है-
बनवारी म्हारा लाल थानै सोच भगत का लाग्या
धना भगत की खेती निपजाग्या
गांव धूवा में आग्या
लेय 'र बीज साधां नै बांट्या
तुंबा में मोती निपजाग्या
सोच भगत का लाग्या
धनाजी का बाल्यकाल बड़ा चमत्कार पूर्ण रहा। वे संतों को देखते ही उदार तथा भाव विगलित हो जाया करते थे। अपनी माता की अनुपस्थिति में वे संतों को दूध पिला देते थे, रोटियां खिला देते थे, किंतु ये चीजें कभी कम नहीं पड़तीं। ” उनका अतिथि सत्कार बड़ा गजब का था।
धुंआ क्षेत्र में यह किंवदंती भी प्रचलित रही है कि धनाजी ने टाँक के नवाब को जो तुंबे भेंट किए, उनमें बेशकीमती मोती निकले, जिससे उपकृत होकर नवाब ने धुंआ कलां के निकट एक तालाब का निर्माण करवाया, जिसे मोतीसागर नाम दिया गया। यह भी प्रचलन में रहा है कि धर्मपत्नी हरिदासी की प्रेरणा से धनाजी ने अपनी माता की स्मृति में एक छतरी का निर्माण भी कराया।
भक्त धनाजी की निष्ठाएं
बाल्यकाल से ही धनाजी का जीवन कतिपय निष्ठाओं से ओत-प्रोत है। वे भगवान श्रीकृष्ण की ही भांति बाल्यकाल से गो-चारण में लग जाते हैं। कल्याणमयी गोओं का बाल्यकालीन सान्निध्य बुद्धि को पवित्र कर परमात्मा में लगाता है। भगवान श्रीकृष्ण की ही उम्र में धनाजी भी गायें चराने जंगल में निकल जाते। उनके संपूर्ण जीवन में कृषि एवं गोरक्षा के कर्म, भक्ति में कहीं भी आड़े नहीं आते हैं। धनाजी की गायों को जो आनंद प्राप्त हुआ, वह तो दुर्लभ कोटि का था। स्वयं गोपाल ने उनकी गायों को चराया। धनाजी की गायें चराने के लिए ठाकुरजी लालायित रहते हैं। यह कार्य उन्होंने दो बार किया। पहले सखा बनकर गायें चराईं। दूबारा धनाजी के काशी गमन पर हाली बनकर यह कार्य किया। सदैव संत सेवा में डूबे रहने वाले धनाजी दंपती के लिए उनकी गायें बड़ा सहारा थीं। वे घी-दूध से संतों की सेवा कर पाते। संतों की सेवा के कारण उनके घर में घी दूध-दही आदि के गो-रस भंडार अक्षय रूप से भरे हुए रहते। अनेक बार उनकी भार्या हरिदासी अन्न न रहने पर दूध-दही से संतों की सेवा कर दिया करती, फिर भी इनका भंडार अक्षय रहता।
परदुख-कातरता धनाजी में अत्यधिक भरी हुई थी। वे किसी के किंचित दुख को भी देख नहीं पाते थे। उनकी भक्ति भी लोकमंगल पर्यवसायिनी है। बालवय में वे सत्य स्वरूप परमात्मा का सान्निध्य प्राप्त कर चुके थे। एक ब्रह्मदर्शी को अथक प्रयास के बावजूद जो नहीं प्राप्त होता, उसे तो उन्होंने अपनी एकल निष्ठा के माध्यम से बहुत पहले प्राप्त कर लिया था, फिर भी वे सेवा और भक्ति के मार्ग का परित्याग आजीवन नहीं करते हैं। यहां उनकी परम भागवती निष्ठा कार्य कर रही है। भक्ति में आनुकूल्य भाव को तो वे छह-सात वर्ष की लघु वय में ही जान गए थे। जीवमात्र के प्रति उनकी सदाशयता थी। भक्तमाल के टीकाकार प्रियादास कहते हैं- 'पाथर लै दियो, अति सावधान कियो, छाती मंह लाय जियो सेवै जैसी नेह नीति है।' ऐसी स्वीकारोक्ति और कहां प्राप्त होगी। शालग्राम पत्थर का सेवन वैसे ही करना है जैसे कोई अपने जी का करे। कोई संशय नहीं, पंडित की इस हिदायत को बालक धना ने पूरी की पूरी हृदयंगम कर ली। अब दूजा भाव कौन रखे। यह गोल-गोल शालग्राम ही ठाकुरजी हैं। ठाकुरजी चाहे अश्म के हों अथवा प्राकट्य रूप में, धना में दोनों के प्रति निष्ठा में कोई अंतर नहीं। भगवद् नेह नीति का पालन संपूर्ण जीवन किया। इसीलिए उनके इस नेह पालन के लिए प्रियादास कहते हैं- 'प्रीति रीति कछु न्यारियै।' धनाजी इस करुणा से आप्लावित थे कि उनके स्वजातीय जन भी भगवद् प्रपत्ति को जाने। इसलिए उन्होंने धनावंश की स्थापना की और उनसे नेह नीति के पालन की कामना की।
भगवान अपने भक्त धनाजी के संबंध में यह जान गए कि मेरे प्रेम में विह्वल इस साधक के लिए मेरी माया को तैरना 'दुरत्य' नहीं है, क्योंकि इसके भजन में नैरंतर्य है, प्रपत्ति से बढ़कर शरणागति है। अब इसके लिए कुछ भी शेष नहीं है। पर भगवान अपने भक्त से कुछ अलग चाहते थे। इसलिए वे इतने आत्मरत भक्त को भी कुछ अलग आदेश प्रदान करते हैं- 'धना कौ दयाल व्है कै, आज्ञा प्रभु दई ढरौ, करौ गुरु रामानंद, भक्ति मति हरी है।'
उपरोक्त आज्ञा में भगवान, रामानंदाचार्य की भी प्रतिष्ठा तथा महत्त्व प्रतिपादित करते हैं। भारत-भू पर आताताइयों के बढ़ते अनाचार के अनंतर रामानंद का प्राकट्य धार्मिक मर्यादाओं के पुनर्स्थापन हेतु संजीवनी की भांति था। कलिकाल के प्राबल्य में रामोपासना ही एकमात्र संतरण की नाव थी और इस नाव के खेवटिया रामानंदजी थे। भक्ति के विराट संप्रसारक रामानंदजी से धनाजी को मिलाना भी भगवदेच्छा थी। रामानंद ही भक्ति में डूबे धना को संप्रदाय का महत्त्व समझा सकते थे।
भगवान ही चाहते थे कि धना केवल स्व. कल्याणार्थ भक्ति करके न रह जाय, भक्ति मार्ग विस्तृत होना चाहिए। महाभागवत कोटि के जन इस मार्ग का उत्तरोत्तर विस्तार करते हैं। रामानंदजी से दीक्षा प्राप्त करने की प्रेरणा के पीछे भगवान का यही मंतव्य था। बाल्यकाल में ही संसार का छद्मावरण भंग कर चुके भक्त को इतनी दूर काशी तक जाने की प्रेरणा देने के पीछे निहित्त उद्देश्य था। रामानंद इस भारत भू पर अपने शिष्यों के माध्यम से धर्म की अवतारणा, पुनर्व्याख्या तथा विस्तार कर रहे थे। उनके अन्य शिष्यों की भांति धना भी उसमें योग कर सकते थे।
दिव्य दृष्टि प्राप्त रामानंद जैसे धनाजी का इंतजार ही कर रहे थे। धनाजी के पहुंचते ही उन्हें छाती से लगाय, सिर पर वरदहस्त रख दिया। 'भए शिष्य जाय आप छाती सों लगाय।' ये सब क्रियाकलाप महज संयोग मात्र नहीं थे। रामानंद, धनाजी के लिए भगवान से तनिक भी कम नहीं थे। भक्त धना की कीर्ति से श्री रामानंदजी भली प्रकार सुपरिचित थे। राजपूताना में भक्ति प्रसार के लिए धना जैसे तेजस्वी संतों की जरूरत महसूस करते थे- रामानंदजी। आचार्य के रूप में रामानंदजी की नियामक भूमिका को यहां देखा जा सकता है। स्वयं श्री संप्रदाय में दीक्षित होने के बावजूद उन्होंने शिष्यों के सगुण-निर्गुण भाव पर अधिक ध्यान नहीं दिया। यही नहीं, गृहस्थी और गृहत्यागी का भी उनके यहां कोई विचार या आग्रह नहीं था। भारतीय समाज की सामाजिक संरचना पर उनकी गहन दृष्टि थी। उनकी लड़ाई केवल मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा उपस्थित स्थितियों मात्र से नहीं थी। भारतीय जन के तात्कालिक आंतरिक विक्षोभ तथा आचरण शैथिल्य को भी समझ रहे थे। सत्य की प्रतिष्ठा के लिए उन्हें कबीर, रैदास, सेन, धना, पीपा जैसे शिष्यों की बहुत आवश्यकता थी। रामानंद को पता था कि धना एक वृहत्तर समाज से हैं, जहां अब तक कोई लोकमान्य प्रतिष्ठित संत नहीं हो पाया है और यह बड़ा समाज अनेक विसंगतियों का शिकार होकर अपनी निर्मलता को खो रहा है। कहना न होगा, रामानंद के विस्तारवादी सोच में धना कहीं न कहीं उपयुक्त सिद्ध हो रहे थे। सरल से स्वभाव वाली, कृषि जैसे उत्तम कर्म में लगी जाट जाति को धना सत्य अनुप्राणित आत्मविचार दे सकते हैं। इन सब बातों को सोचकर रामानंदजी ने धना को अनंतानंदजी के साहचर्य में छोड़ दिया। रामानंदजी सतसई में उल्लेख है :
धना आयउ हरषजुत कासी राम दुआरि।
मिलेउ अनन्तानंद सों स्वामी कहत बिचारि ।।
धना को अनंतानंदजी से मिलवाने का तात्पर्य, आधुनिक भाषा में ट्रेनिंग (यानी पांथिक प्रशिक्षण) देना कह सकते हैं। भक्ति प्रसार के साथ-साथ लोक कल्याण के भाव का प्रसार हो, युग प्रवर्तक रामानंदजी का यह भी महत्त उद्देश्य था।
गुरु की भावना का धनाजी ने आदर किया और धनावंश की स्थापना की। प्रारंभ में गृहस्थ में रहते समय ही उनकी पहचान एक वैरागी के रूप में हो चुकी थी। उनकी निष्ठा साधपन में थी। गुरु ने उन्हें 'नाम जप' की जो सीख दी, उसका पालन करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। कहते हैं, धना ने इतना अधिक नाम स्मरण किया और करवाया जिससे उस काल में अनेक किंवदंतियों का निर्माण हो गया। जैसे धना से संबंधित किंवदंती है कि 'नाम लियां हर तारे।' यानी मुक्ति का एकांगी साधन प्रभु स्मरण, नाम जप है। धनावंश की स्थापना के बाद भी उन्होंने हरि कीर्तन पर अधिक जोर दिया। धनावंश में तब से अद्यावधि हरि कीर्तन की एक परंपरा-सी पड़ गई। धनाजी का अपने सद्गुरु के प्रति सदैव निष्ठाभाव रहा। उन्होंने जो-जो कहा, उसे अक्षरशः पूरा किया। गुरुजी ने गृहस्थ में रहकर साधु-सेवा का कहा तो उसमें किसी बात की कमी नहीं आने दी। आभ्यंतरिक शुद्धि के लिए धना का अन्न खाना एक मिथक बन गया। दूर-दूर से साधुजन धना के गांव खेरीपुर की यात्रा करने लगे। धना भक्त की रोटी पाने के लिए जगत हाथ पसारने लगा। धना के अन्न में इतनी पवित्रता के भाव क्यों थे ? कहा जाता है कि खरी कमाई का अन्न पवित्र होता है। धनाजी के संबंध में कथा प्रचलित है कि वे जब अपने खेत में हल चलाते तो निरंतर राम-राम रटते हुए बीज बीजते। फिर खेत की निराई-गुड़ाई राम-राम करते करते और इसी राम-राम के साथ खलिहान निकालते। उनके द्वारा पैदा किए हर अन्न कण में राम नाम की ध्वनि भर जाया करती। खेती के हर कार्य में 'रामभणत' की परंपरा के पीछे यही उद्देश्य रहता है कि उसमें पवित्रता समाविष्ट हो जाए।
धनाजी के संपूर्ण चरित्र में एक चीज बहत अधिक स्पष्ट नजर आती है, वह है-उनकी स्वाभाविक भक्ति। कहीं कोई तैयारी नहीं, प्रयास नहीं, स्वाभाविक रूप से हो जाने वाली भक्ति। वह भक्ति उनकी दिनचर्या का एक भाग है। उसके लिए गृहस्थ का त्याग या संन्यास, वैराग्य को अपनाना नहीं है। किसी एकांत को नहीं ढूंढ़ना है। गणेशदास भक्तमाली ने उनकी इस भक्ति को 'स्वाभाविकी भक्ति' नाम प्रदान किया। सप्रयास से इतर जो भक्ति हो जाए, उस मनमौजी की भक्ति को हम साधना भी नहीं कह सकते। धनाजी साधक भी नहीं कहलाना चाहते। वस्तुतः उनके जीवन का ध्येय ही भक्ति है, तब धनाजी का आग्रह अपने नव प्रवृत्तित धनावंशी साधों से भी स्वाभाविकी भक्ति का रहा। यही कारण रहा कि धनावंश में धर्म-अध्यात्म को लेकर आनुष्ठानिक कर्मों का अधिक प्रवेश आज तक भी नहीं हो पाया है।
गुरु आज्ञा का पालन करना था, इसलिए धनाजी उत्तर दिशा के जाट बहुल क्षेत्र में पंथ संस्थापन के लिए आए। फिरवांसी में उन्होंने शालग्राम देकर यही कहा कि भूखों को भोजन देवो और ठाकुरजी को अपना सर्वस्व मानो। एकदम अनभिज्ञ और वैरागी कर्मों को लेकर असमंजस से भरे लोगों ने जब जोर देकर कहा कि हम अपनी विलग पहचान कैसे स्थापित कर पाएंगे, तब उन्होंने एक निष्ठावान वैरागी के 21 सूत्र कहे, जिनमें से अधिकांश सूत्रों का परिपालन धनावंशी आज तक करते आए हैं। पंथ में बहुत-सी धार्मिक अन्य प्रवृत्तियां तो बाद में जुड़ती गईं। एक पंथ के अपने विधान और आचार होते हैं, जिनमें बहुत कुछ नया जुड़ता जाता है और बहुत पुराना छूटता रहता है।
जिस प्रकार गणेशदास भक्तमाली ने धनाजी की भक्ति को स्वाभाविकी भक्ति का नाम प्रदान किया, उसी प्रकार रामस्नेही संत दयालुजी महाराज (द्याल बाल) ने धनाजी की भक्ति को 'परसापरस' भक्ति का नाम दिया। परस्पर स्पर्श की भक्ति। दूर-दूर की भक्ति नहीं। इतनी नजदीक की भक्ति की भक्त हाथ बढ़ाकर भगवान का स्पर्श करले। भक्ति में ऐसा विरद धनाजी जैसे विरल भक्तों को ही प्राप्त है। यह तो समर्पण से भी आगे की निष्ठा है।
भक्ति नामक संज्ञा को धनाजी ने एक नव आयाम प्रदान किया, जिसे हम कोई सुसंगत नाम भी नहीं दे सकते। उनकी परम भागवती निष्ठा को प्रणाम ही किया जा सकता है।
