भक्त श्री धनाजी एवं धनावंश
अध्याय : तृतीय - अनंतदास और धना की परचई
नाभादास के बाद धनाजी पर लिखने का कार्य अनंतदास ने किया। अनंतदास ने भक्तिकाल के अनेक संतों का चरित्र परचइयों के रूप में लिखा। अनंतदास की परंपरा रामानंद से जुड़ती है। अनंतदास ने भक्त पीपा की परचई में अपनी गुरु परंपरा का उल्लेख किया है-
रामानंद के अनंता नंदू, सदा प्रगट पूनम ज्यूं चंदू।
ताकै किसनदास इधकारी, सब कोई जाणै दूधाधारी ।। 27 ।।
अग्रदास को इधको प्रेमू, लीण भयो सिंवरत हर नेमू।
ताकै सिष विनोदी पाई, ताकै दास अनंत कहाई ।। 28।।
यह शिष्य परंपरा इस प्रकार थी- रामानंद के 12 प्रमुख शिष्यों में प्रथम शिष्य अनंतानंद। अनंतानंद के शिष्य कृष्णदासजी पयहारी, कृष्णदासजी पयहारी के शिष्य अग्रदासजी। अग्रदासजी के नाभाजी, विनोदीजी तथा अन्य पंद्रह शिष्य। नाभाजी के गुरुभाई विनोदीजी ही अनंतदास के गुरु थे। "नाभादास - संप्रदाय वंशावली में अनंतदास के चाचा होते हैं।" अनंतदास ने संवत 1645 के लगभग कबीर, नामदेव, पीपा, त्रिलोचन, रैदास तथा धना की परचियों का लेखन किया। नामदेव की परचई में उन्होंने अपना समय संवत 1645 दिया है।
अनंतदास द्वारा रचित धना भगत की परचई में उद्धृत निम्न पंक्तियां-
धना भगत को चिरत सुनाऊं,
आंख्यां देखी कह समझाऊं।
हळ के गळ नाय न बांधी,
धनै सांप्रत मूठी नहीं सांधी ।।
उपरोक्त पंक्तियों में 'आंख्यां देखी कह समझाऊं' के आधार पर एक विद्वान ने धना को अनंतदास के समकालीन मान लिया, जबकि इन दोनों में तीन पीढ़ी का अंतर था। विद्वान ने लिखा है-" अनंतदास धना भगत के समकालीन थे, क्योंकि 'आंख्यां देखी' बात कहने वाला कोई समकालीन ही हो सकता है।" वस्तुत उपरोक्त पंक्तियां धनाजी की परचई में अभिव्यक्त घटनाक्रम के तहत धना का हाली कह रहा है, जिसे विद्वान सज्जन ने लेखक अनंतदास कहा मान लिया। अनंतदास के संबंध में अन्वेषकों का मत रहा है कि उन्होंने बहुत प्रामाणिकता के साथ परचई ग्रंथों की रचना की।
रामानंद, कबीर, पीपा, धना की समकालीनता में भी अनंतदास की परचइयां खासा उपयोगी है। रामानंद-कबीर, पीपा, धना आदि के गुरु थे। इसका मतलब वे अपने शिष्यों के काल में मौजूद थे। भक्तमालों में सभी जगह प्रसंग आता है कि स्वयं भगवान ने धना से रामानंदजी को गुरु बनाने का आग्रह किया। यह भी उल्लेख आता है कि उन्होंने धना को शिष्योचित कतिपय आदेश दिए, उनमें पंथ स्थापना का भी एक आदेश था। रामानंद का समय सन 1475 तक ठहरने पर ही धना द्वारा रामानंद आदेशित पंथ स्थापन की बात उचित ठहरती है। क्योंकि धना ने इसी वर्ष (सन 1475) में धनावंश की स्थापना की। अनंतदास की परचियों पर गहन अध्ययन करने वाले डेविड एन. लॉरेंजन का मत उल्लेखनीय है। वे लिखते हैं, "असल में रामानंद के समय को जानने का उचित तरीका यह है कि हम कबीर, अनंतदास और नाभादास की सुपरिचित तिथियों से पीछे गिनना शुरू करें। यदि हम अनंतदास के समय को 1600 ई. मानें (नामदेव परचई के रचनाकाल 1588 ई. के आधार पर) तो रामानंद का समय 1475 ई. के आस-पास ठहरता है।""
अनंतदास रचित धना की परचई की अलग पांडुलिपियों में थोड़ा पाठ भेद अवश्य मिलता है। पर वह अंतर कोई बहुत अधिक नहीं है। यहां हम भारतीय विद्या मंदिर शोध प्रतिष्ठान की प्रति दे रहे हैं।
।। अथ धनैजी की परची लिख्यते ।।
गुर गोमंद की आज्ञा पाऊं, दास धना की कथा सुनाऊं।
हर की किरपा होय गुण गाऊं, जथा सक्त हूं वरण सुनाऊं ।। 1 ।।
धिन धनौ जिन रांम रिझायौ, बाल अवस्था हरि गुण गायौ।
विप्र ओक जजमांना जाई, सौ खेरापुर निकस्यौ आई ।। 2।।
पिता धना कौ गिरसथ भारी, ब्राह्मण की कीनी मनुहारी।
दिनां च्यार कीनौ विसरांमा, पायौ पोख बहुत आरांमा ।। 3।।
सौ तौ द्विज हरि का गुण गावै, रांम भगति सबके मन भावै।
धनौ चरावै घर की गाई, भगति अंकर छिपै नहीं भाई || 4 ||
धनौ कहै सुण हौ द्विज देवा, मैं भी करूं रांम की सेवा।
विप्र कहै तम बालक भाई, हरि की सेवा बहुत कठणाई ।।5।।
बालक हठ बहुत ही कीनौ, तब ही विप्र सिला टुक दीनौ।
सेवा कीजै प्रीत लगाई, बहुत भांति हरि का गुण गार्ड ll 6 11
ओ है रांम इन हि लिव लावौ, यां पहलां भोजन मत पावौ।
इतनी कह विप्र उठ गड्यौ, धना के मन आनंद भड्यौ ।। 7।1
बालक वन में गऊ चरावै, आई रोटी भोग लगावै।
नेतर बूंद रु ध्यान लगाई, जो देखै तो कछु नहीं पाई ।। 8 ।।
तब ही धनौ मन में पछतावै, ना जानू यौ कबहू पावै।
मैं विप्र पैं लीयौ छुडाई, या कूं तौ अब ओळू आई ।। 9।।
दिना दोय लूं नाही पायौ, धनै आप ही अन्न छिटकायौ।
दिना तीसरै भोग लगायौ, जो देखै तौ कछू न पायौ ।। 10।।
तब तौ देख्यौ यो मर जासी, मैं भी खाय मरूंगौ पासी।
धनै भगत जब भोजन छाड्यौ, मनसा वाचा मरणौ मांड्यौ ।। 11 ।।
तब ही कृपा कर हरि आए, आधौ भाता प्रीत कर पायै।
महा प्रसाद सीस धर लीनौ, बहुस्यूं भोजन धनै कीनौ ।। 12।।
विश्राम-साखी
अरध प्रसाद सूं रहण दै, आधौ जावै पाय।
बारी आपो आपणी, ल्यावै गऊ चराय ।। 13 ।।
चौपाई
केते इक दिन असैं गईया, धनौ रांम दोउं हिल मिल रहीया।
एक समै विप्र फिर आयौ, देख रीत तब ही सुख पायौ ।।14।।
बहुस्यूं विप्र आप घर गईयौ, वाही कूं हरि दरसन दईयौ।
प्रगट रांम यूं बोल्यां बांणी, साखी भगत धना नहीं जांणी ।15 ।।
अब तुम बात हमारी मानौ, कासी कुं तक करौ पयानौ।
जाय करौ गुरु रामानंदू, ताकै दरसण होय अनंदू ।।16 ।।
राम धना कूं अग्या दीनी, रामानंद की दिछा लीनी।
तब ही तिनके भयौ अनंदू, दिख्या लेत गए दुख दंदू ।।17 ।।
दिछ्या लई परम सुख पायौ, अग्या लै खेरापुर आयौ ।
रामानंद की दिख्या पाई, घर ही भगति करौ लिव लाई ।।18 ।।1
हरि गुण साध एक कर पूजौ, कबहु भाव धरौ मत दूजौ।
सिंवरौ रांम साधपण सेवौ, अरु भूखां कूं भोजन देवौ ।।19 ।।
और धना कै घर में नारी, सो है पति की आग्याकारी।
आन देव की करै न आसा, निस दिन जग तैं रहत उदासा ।।20 ।।
समदिस्टी द्विधा नहीं आनै, सब घट आतम राम पिछानै ।
घर में रहै उदासी असैं, जल कै निकट वटाऊ जैसें ।।21 ।।
घर धरणी संपत विध सरबू, हरि कै हेत कियौ सब दरबू।
गुर क्रिपा तैं राह बन आई, घर ही रहै रांम लिव लाई ।।22 ।।
विश्राम-साखी
दास धना की परचरी, सुण लीज्यौ प्रीत लगाय।
दास अणंत कथा कहै, हरि की अग्या पाय ।। 23 ।।
चौपाई
धनै कै धीरज मन मांही, हरि सूं हेत और सूं नांही।
रामनाम नित हिरदै राखै, मिथ्या मुख तैं कबू न भाखै ।।24 ।।
सकल अंग सेवा कौ सूरौ, भगत वछल गोविंद गुण पूरौ।
ओक दिना हरि असैं कीनै, आय वाट में दरसन दीने ।।25 ।।
सेवग नांम तमारौ भाई, सब संतन की टहल कराई।
खीर खांड घृत आटा दीजै, मिनख जनम का लावा लीजै ।।26 ।।
बोल्यौ धनौ सुणौ हो स्वामी, तम हौ मेरे अंतरजामी।
मैं तो बीज खेत ले जांही, गैलां में सामग्री नांही ।।27।।
अब तम रांम द्वारै जावौ, मनसा व्है सो भोजन पावौ।
मेरे घरां सुलखणी नारी, बहु विध सेवा करै तमारी ।।28।।
इतनै उठ वैरागी बोल्यौ, धना भगत को सत मत तोल्यौ।
सेवग हुय उतर क्यूं दीजै, खोळ समेत पोट पुन दीजै ।।29 ।।
सेवग के मन जैसी आई, जन कौ वचन न मेट्यौ जाई।
धनै सुणत सो ढील न कीनी, खोळ समेत पोट पुन दीनी ।।30 ।।
विश्राम-साखी
गोहूं ले हरिजन गए, धनौ पहुंतौ खेत।
तातैं दास अणंत कहै, सेवग सरबस लेत ।। 31 ।।
चौपाई
तब हाळी को मन विलखाणौ, स्वामी बीज और तम आणौ।
धनौ कहै तम सुणरै भाई, तेरो वांट्यौ कहूं न जाई ।। 32 ।।
पाड़ौसी कै निपजै जेतौ, तूं थारौ भर लीजै तेतौ ।
तब हाळी दोउं बळद उलाड्या, आथण सूधौ खेत जु फाड्या ।।33 ।।
दिन आंथ्यौ हाळी घर आयौ, सो हाळण सूं चिरत सुणायौ।
स्वामी मतौ ओक एक कीनौ, बीज सर्व भगतां कूं दीनौ ।।34 ।।
सारे दिन खाली हळ फेरयौ, गोहूं चीणौ ओक नहीं गेस्यौ।
इतनौ सुण हाळी की नारी, करै क्रोध अरु देवै गारी ।।35 ।।
जायै बावरा तूं के खासी, ऊ तौ मोडो मांग र लासी।
इतनौ सुन बोली हरि दासी, तब हाळण कुं खरी बिसासी ।।36 ।।
भगतण कहै सुण हाळण बाई, थारी वांटौ कहूं न जाई।
एक बळध अब ही दयूं खोई, जो तेरे विसवास न होई ।।37 ।।
धनौ कहै कड़वा मत भाखौ, दिन दस वात गुपत कर राखौ।
कीयौ कीयौ हरिजी को देखौ, पीछे तम कर लीज्यौ लेखौ ।। 38 ।।
भया पंच दिन तब ही ऊगा, एक दिन हाळी जाइ पूगा।
हाळी के मन भयौ अनंदा, भै तो कृपा करी गोविंदा ।।39 ।।
हाळी जाय हथाई कहीयौ, स्वामी की गति कुणी न लहीयौ।
इनकौ मतौ बहुत है भारी, ग्यान ध्यान धीरज मन धारी ।।40 ।।
विश्राम-साखी
धना कै धीरज घणी, साचौ हरि विसवास ।
दास अनंत विचार कहै, प्रभुजी पूरै आस ।।41 ।।
चौपाई
इतनी सुन बोलै सब कोई, स्वामी की गति कैसी होई।
हाळी कहै सकळ सुण वातां, खेत गयौ इक समै प्रभाता ।। 42 ।।
धना भगत को चिरत सुनाऊं, आंख्यां देखि कहि समझाऊं।
हळ कै गळि नाई न बांधी, धनै समर्थ मूठी नहीं सांधी ।।43 ।।
सारौ दिन ठालौ हळ फेस्यौ, गोहूं चिणौ ओक नहीं गेस्यौ।
अब देखौ तो उगा घणा, बिन वाह्यां ई गोहूं चीणा ।।44 ।।
अती सुणी अचंभो होई, गोबिंद की गति लखै न कोई।
हाळी हाळण दोऊं डरीया, जाय धना कै पावां परीया ।।45 ।।
चूक हमारी बकसौ स्वामी, तम दयाल हौ अंतरजामी।
धनौ कहै चूक कछु नांही, सब घट मांहि एक है सांई ।। 46 ।।
अब तक वात हमारी मानौ, जन सेवन की संक न आनौ।
हरि भगतां कूं सरबस दीजै, जीवन जनम सफल कर लीजै ।।47 ।।
तब हाळी कौ संसौ भागौ, साध संत की सेवा लागौ।
हाळी बहुर खेत में आयौ, गोहूं देख बहुत सुख पायौ ।।48।।
च्यारूंमेर ओकसा कृणा, पाड़ौसी सूं निपज्या दूणा।
जो करै है सो आगै त्यारी, हरि कूं ए वृति लागै प्यारी ।। 49 ।।
विश्राम-साखी
साचै मन सिमरण करै, रांम जनां सूं हेत।
तातै दास अनंत कहै, हरि निपजायो खेत ।। 50 ।।
चौपाई
बहुस्यौ देख्या ओक अचंभा, मेर मेर ऊगा बहु तूंबा।
स्वामी दोळी बाड़ कराई, ते सब ही बेलड़ियां छाई ।।51।।
बहुर वायरा आछा वागा, तूंबा बहुत सुगठा लागा।
धनै भगत भेळा कर लीना, संतां काज रामजी कीना ।। 52 ।।
बहुयूं मंडळी जैसी आई, ता में संत बहुत सुखदाई।
ते सब धना भगत के आए, स्वामी देख बहुत सुख पाए ।।53 ।।
धनौ कहै धन्य भाग हमारे, आवो स्वामी भलां पधारे।
कर डंडोत चरण जल लीनौ, दया करी तम दरसन दीनौ ।।54 ।।
सब कूं आसण दीया बिछाई, ता पीछे हरिदासी आई।
बैठ-बैठ कीनौ परनामा, आज हमारे पूरण कामा ।।55 ।।
तातौ पांणी तब ही दीनौ, चरण खोळ चरणामृत लीनौ।
सब संतां जैसी विधि देखी, यो तौ सेवग बडौ विमेखी ।।56 ।।
जैसी ही है घर की नारी, अग्याकार रांम की प्यारी।
धनौ कहै अब अग्या दीजै, करौ रसोई विलंब न कीजै ।।57 ।।
साध कहै अग्या हरि केरी, लाव रसोई इछा तेरी।
चोकौ दीनौ जळ भरवायौ, धनौ भगत सामग्री ल्यायौ ।।58।।
आटो, घिरत, मिठाई लायौ, चावळ घणा दूध मंगवायौ।
औ कछु तरकारी कीजै, धीणौ घणो दही पण लीजै ।।59 ।।
विश्राम साखी
तन मन धन अरपण करै, इण विधि सेवै संत।
ताकूं राम निवाजसी, गावै दास अनंत ।।6011
चौपाई
पाय प्रसाद रु कथा उचारी, दरसण कूं आवै नरनारी।
कथा कीरतन बहु विध कीना, भये अनंद प्रेम रस भीना ।।61 ।।
धनौ कहै अब कृपा कीजै, ओक ओक तौ तूंबा लीजै।
धनै भगत तूंबा मंगवाया, देख डोळ सबके मन भाया ।। 62 ।।
ले तूंबा सब कूं देखाई, इतनौ बोझ कहां है मांहि।
आण करोती मुंहडा करीया, देखै तो गोहवां सूं भरिया ।। 63 ।।
देख भयौ अचंभौ भारी, धन्य हो रामजी कला तमारी।
कर कर मुंहडा धस्या उतारी, रास भई गोहवां की भारी ।।64 ।।
गोहूं धना भगत कूं दीया, तूंबा तौ वैराग्यां लीया।
जेता कण भगतन कूं दीना, तेता मण खेती में लीना ।।65 ।।
औ अचरज मानौ मत कोई, करता, करतां कहा न होई।
धना भगत को खेत निपजायौ, जन कबीर घर बाळद लायौ ।।66 11
नामदेव की छान छवाई। पीपै कूं द्वारका दिखाई ।
सब संतन के कारज सारे, केताई पतित पार उतारे ।।67 ।।
विश्राम-साखी
दास अनंत जु कही कथा, धना कौ जस गाय।
रामानंद के सिस की, महमां कही न जाय ।।68 ।।
।। इतिश्री धनाजी की परचरी संपूर्ण ।।
परचरी (परचई) साहित्य की परंपरा
परची का तात्पर्य होता है, किसी संत का जीवन परिचय। इस जीवन परिचय के अंतर्गत अधिकांश भक्तिपरक प्रेरणीय घटनाओं का काव्यमय वर्णन किया जाता है। परचियां अधिकतर संतों भक्तों के जीवन परिचय को लेकर रची गई। 'परची' शब्द को परचीकारों ने अनेक रूप में काम लिया है, यथा- परची, परचि, परचई, परचरी, प्रची, परिचई इत्यादि । सोलहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध से लेकर 18वीं शताब्दी तक परचियां लिखी गई। परचीकारों में अनंतदास, सुख सारण, जनगोपाल, हरिरामदास, दयालदास, परमानंद, मयाराम आदि प्रमुख नाम कहे जा सकते हैं।
ऐसे परचीकारों में अनंतदास का नाम सर्वोपरि है। उन्होंने भक्त धनाजी के अलावा भी अंगद, कबीर, नामदेव, रांका बांका, रैदास, पीपा, सेऊ समन, त्रिलोचन तथा शेख फरीद के चरित्रों पर परची लेखन किया। सुख सारण धनावंशी जाति से थे, वे रामस्नेही संप्रदाय में दीक्षित हो गए थे। उन्होंने अधिकांश परचियां महिला भक्त चरितों पर तैयार की, यथा- भक्तमति मीरां बाई, मुक्ता बाई, किस्तूरां बाई, करमां बाई, करमैती बाई, रानां बाई, सिंवरी बाई, फूली बाई आदि। फूली तो स्वयं सुख सारण की बुआ ही थी। सुख सारण 19वीं शताब्दी में हुए। जनगोपाल दादूजी के प्रमुख शिष्य थे। इन्होंने 'दादू जन्मलीला परची' का लेखन किया, जो अत्यंत प्रसिद्ध हुई। जनगोपाल डीडवाना के महाजन थे। युवाकाल में ही दादूजी के शिष्य बन गए। जनगोपाल ने 'ध्रुव चरित्र' तथा 'प्रह्लाद चरित्र' जैसे अनेक दूसरे ग्रंथ भी रचे।
धनाजी की परची लिखने वाले अनंतदास को विद्वान प्रामाणिक जीवनीकार मानते हैं। कबीर, पीपा और धना पर हुए शोधकार्यों में अनंतदास की उपरोक्त भक्तों के जीवन पर लिखी परिचयों को सर्वाधिक प्रामाणिक माना गया है। वस्तुतः अनंतदास एक सहिष्णु परचीकार हैं। वे भक्तों के चामत्कारिक व्यक्तित्व को तो अनेक आध्यात्मिक घटनाओं के माध्यम से प्रकट करते ही हैं, पर उन भक्तों पर आगामी शोध की गुंजायश भी बहुत छोड़ते हैं। कबीरदास पर अनुसंधान करने वाले विद्वान डॉ. पुरुषोत्तम अग्रवाल का अभिमत है कि, "अनंतदास की परिचइयों में बाकायदा जीवनी लिखने की बजाय, बल संतों की साधना और लोक मान्यता का परिचय देने पर है।""
अनंतदास चौदहवीं सदी के भक्त नामदेव को वैष्णव भक्ति का उद्घाटक मानते हैं। अनंतदास कहते हैं-" कलियुग प्रथम नामदेव भडयो।" अर्थात कलियुग में वैष्णव भक्ति के प्रस्फूठन में नामदेव अग्रणी हैं। स्वयं धना की भी यही धारणा है. भक्ति के क्षेत्र में वे भी नामदेव को उच्च आसन विराजित करते हैं। निर्गुणी कबीर, रविदास, सेन को भी सम्मान प्रदान करते हैं। उपरोक्त भक्त धना के प्रेरणास्रोत हैं।
अनंतदास कल्पनाओं में नहीं उलझाते। धनाजी की परचई में वे धना के पूर्व जन्म का उल्लेख नहीं करते। जबकि हमारे भक्तों के पूर्व जन्म का उल्लेख एक परिपाटी सी रही है। धनाजी को भी बलि का अवतार मानते हैं। रामानंदीय ग्रंथों में इसके उल्लेख मिलते हैं, किंतु अनंतदास पूर्वजन्म का उल्लेख नहीं करते। अनंत स्वयं वैष्णव थे, इसलिए वे अपनी परचियों में वैष्णव छवि को बरकरार रखते हैं।
अनंतदास द्वारा रचित धनाजी की परचरी की गद्य टीका
प्रथम चौपाई के प्रारंभ में अनंतदास कहते हैं- गुरुजी की आज्ञा प्राप्त कर मैं भगवान के दास भक्त धना की कथा सुना रहा हूं। यह वर्णन मैं परमात्मा की असीम कृपा के बल पर सुना रहा हूं। मैं इस कार्य में यथाशक्य अपना पूर्ण प्रयास करूंगा। भक्त धना धन्य-धन्य हैं, जिन्होंने बाल अवस्था में ही प्रभु को रिझाने तथा गुण संकीर्तन का कार्य प्रारंभ कर दिया था। एक ब्राह्मण अपने यजमानों के घर जाया करता था, एक दिन वह खेरापुर आ गया।
खेरापुर में धना के पिता का बड़ा और समृद्ध परिवार था। ब्राह्मण उनके घर आया तो उसकी सुंदर आवभगत की गई। वह वहां चार दिनों तक रुका, उसे वहां बड़ा सुख प्रतीत हुआ। ब्राह्मण ने बड़ी भाव भक्ति के साथ धना के घर कथा-सत्संग की, साथ ही अपनी नित्य प्रति की पूजा-पाठ को भी सुंदर ढंग से संपन्न किया। धना हमेशा अपनी गाय चराने जाता था, गौ चारण करते उसमें भक्ति के अंकुर उगने लगे। उस धना ने जब ब्राह्मण को मनायोग से पूजा करते देखा तो उससे कहा कि वह भी भगवान की सेवा करना चाहता है। ब्राह्मण ने कहा- धना, तुम अभी बालक हो, भगवान की सेवा बड़ी कठिन होती है, तुम से यह सब कैसे होगा ? ब्राह्मण देवता ने अनेक प्रकार से समझाने का यत्न किया, किंतु धना जब सेवा करने के हठ पर उतर आया तो उसका मन रखने के लिए ब्राह्मण ने एक शालग्राम का पत्थर धना को दे दिया तथा उसे सेवा करने की रीति समझाते हुए कहा-बड़े प्रेम अनुराग से भगवान की पूजा करना,
परमात्मा को भांति-भांति की सेवा से रिझाने का कार्य करना। शालग्राम की ओर इशारा करते हुए कहा कि यही भगवान हैं. सदैव इनमें लीन रहना। पूजा करते समय प्रतिदिन इस बात का खयाल रखना कि प्रभु को प्रसाद कराने से पहले
प्रसाद प्राप्त मत करना। सेवा-पूजा की सब बातें समझाकर विप्र दसरे गांव चला गया। भगवान की शालग्राम प्रतिमा प्राप्त कर धना के मन अपार आनंद की लहर छा गई।
अब धना उस शालग्राम को अपने साथ ही रखते। जंगल गाय चराने जाते वक्त अपनी छाक (भोजन) में लाई हई सामग्री शालग्राम के आगे रख देता, ब्राह्मण की भांति 'लीजिए महाराज' कहता। उस पंडित की ही तरह आंखें मूंद कर भगवान का ध्यान लगाता, हाथ जोड़ता। थोड़ी देर बाद आंखें खोलकर देखा तो भोजन सामग्री तो ज्यों की त्यों पड़ी थी। धना के मन में पछतावा होने लगा, उसने सोचा, ब्राह्मण से भगवान को ले तो लिया है, पर ब्राह्मण के कहे अनुसार वह भली प्रकार से सेवा नहीं कर पा रहा है, तभी तो भगवान ने प्रसाद ग्रहण नहीं किया। पता नहीं यह भगवान भोजन प्रसादी को किस रीति से प्राप्त करता है, मुझे तो वह रीति भी नहीं आती। मैंने इसे ब्राह्मण से प्राप्त कर बड़ा अपराध कर लिया है, इसे शायद ब्राह्मण की याद आ रही है। धना ने दो दिनों तक बड़ा प्रयास किया कि यह ठाकुर किसी प्रकार से भोजन प्राप्त कर ले, पर जब भगवान ने प्रसाद नहीं लिया तो उसने स्वयं भी भोजन नहीं करने की ठानी। ब्राह्मण ने कहा था- भगवान को प्रसाद कराए पहले भोजन मत प्राप्त करना। ब्राह्मण की बात का तो पालन करना ही था। तीसरे दिन धना ने पुनः भगवान को भोग लगाया, कई उद्यम किए, पंडित की भांति गमछे से पर्दा भी लगाया, पर सारे प्रयत्न विफल गए, देखा तो भगवान ने फिर भी भोजन नहीं पाया। बालक धना ने सोचा, ऐसे भूखे रहते तो यह मर ही जाएगा, मैं ब्राह्मण को क्या मुंह दिखाऊंगा, इसीलिए तो वह भगवान को मुझे सौंप नहीं रहा था। अगर यह मर गया तो मैं भी मर जाऊंगा। आखिर धना ने तय किया कि जब तक यह भोजन नहीं करेगा, तब तक वह भी नहीं करेगा। मन और वचन से कहा- तुम मरोगे तो मैं भी साथ मरूंगा। बालक के इस हठ को भगवान अदेखा कैसे कर सकते थे। वे प्रकट हुए और आधा भाता (छाक) बड़ी रुचि से प्राप्त कर लिया। धना के मन में आनंद का पारावार न रहा, उसने भगवान द्वारा छोड़ी महाप्रसादी को सिर पर लगाया और फिर बड़ी रुचि से प्राप्त किया।
अब यह रोजाना का क्रम हो गया। आधा प्रसाद भगवान करते और आधा धना। धना को गायें चराते देखकर भगवान ने प्रस्ताव दिया कि धना देखो, तुम्हें घरवाले यह भाता इसलिए देते हैं न कि तुम दिन भर गायें चराते हो, पर तुम्हारा आधा भाता मैं खा लेता हूं, तब तुम्हारा आधा कार्य मुझे करना चाहिए? धना को यह बात युक्तिसंगत लगी।
कितने ही दिन इस प्रकार व्यतीत हो गए। दो प्रीत करने वाले सखा की भांति धना और राम (भगवान) हिल मिल कर रहने लगे। कुछ दिनों उपरांत वह ब्राह्मण पुनः धना के घर आया और धना से शालग्राम रूपी भगवान की पूजा के संबंध में पूछा कि क्या तुम बिना त्रुटि के भगवान की पूजा करते हो और यथासमय प्रसाद चढाते हो ? तब धना ने सारा वृत्तांत ब्राह्मण को कह सुनाया। उसने कहा- भगवान ने तीन-चार दिनों तक तो प्रसाद ग्रहण नहीं किया, पर जब मुझे भूखा देखा तो वे पसीज गए और अब मेरे भाते में से आधा प्रसाद वे कर लेते हैं तथा आधा मेरे लिए छोड़ देते हैं। आधा प्रसाद लेते हैं, इसलिए वे आधे दिन मेरी गायें भी चराते हैं। ब्राह्मण को बहुत देर तक कुछ समझ नहीं आया तो उसने कहा कि आज वह भी उसके साथ खेत चलेगा और भगवान को प्रसाद प्राप्त करते तथा गायें चराते देखेगा। धना की भक्ति रीति देखकर ब्राह्मण को अत्यधिक प्रसन्नता हुई।
धना से ब्राह्मण को ज्ञान हुआ कि भगवान को कैसे पाया जाता है? अपने घर आकर उसने तन्मयता से भक्ति की और हरि के दर्शन प्राप्त किए।
एक दिन भगवान ने प्रकट होकर धना से कहा कि हे धना! तुम साक्षी भाव से भक्ति करो, मेरी बात मानकर तुम काशी की ओर प्रयाण करो। वहां जाकर रामानंदजी को अपना गुरु बनाओ, उनके दर्शन से तुम्हें बड़ा आनंद प्राप्त होगा। धना ने भगवान की आज्ञा का पालन किया और रामानंद से दीक्षा प्राप्त की। विधिवत दीक्षा से उन्हें बड़ा आंनद प्राप्त हुआ, उनके दुख और द्वंद्व जाते रहे। रामानंद से दीक्षा प्राप्त करने पर उन्हें परम सौभाग्यशाली होने का अनुभव हुआ। कुछ दिन गुरु रामानंदजी के पास रुककर उनसे आज्ञा प्राप्त कर धना अपने गांव खेरीपुर लौट आए।
दीक्षा प्रदान करने के दौरान रामानंद ने धना को गृहस्थी जानकर घर पर ही पूर्ववत भगवद् भजन करने की आज्ञा प्रदान की। उन्होंने धना से कहा कि, भगवान, गुरु और साधु में एक ही भाव रखना चाहिए, यही भक्ति की रीति है, इनके प्रति अन्य भाव न रखें। गृहस्थ में रहकर साधु सेवा करो और भूखे प्राणियों की अन्न से सेवा करो। धना ने अपने गुरु की उपरोक्त सीख को शिरोधार्य कर लिया। धना के घर में उनकी धर्मपत्नी भी धना की भांति ही उदार तथा पति की आज्ञा में चलने वाली सुशील नारी थी। उसकी भी भगवद् भाव में निष्ठा थी, अन्यान्य देव पूजा में उसकी कोई निष्ठा नहीं थी। सांसारिक कार्यों में उसका उदासी भाव था। वह किसी समता पुरुष से कम नहीं थी, घट-घट में आत्मराम का दर्शन करने वाली नारी थी। गृहस्थी में रहते हुए भी उसकी घर में आसक्ति नहीं थी, राह में फैली जल संपदा के प्रति राहगीर की कैसी प्रीति ? वैसे ही वह संसार के सुखों को समझती थी। जिस घर में ऐसी सुभार्या हो, उसमें किस बात की कमी । धना के घर का सारा द्रव्य परमात्मा के निमित्त ही था। गुरुकृपा से धना के सब सुख हो गए, वह घर में रहकर परमात्मा के ध्यान में मगन रहने लगा।
परचीकार अंनतदास कहते हैं कि मैं आपको इस परची के माध्यम से भगवद् दास धना की गाथा सुना रहा हूं, इसे दत्तचित्त होकर प्रेमपूर्वक सुनें। मैं भी यह कथा भगवद् आज्ञा से ही आपको कह रहा हूं।
अनंतदास कहते हैं- धनाजी महाराज धैर्य की प्रतिमूर्ति थे। अन्य किन्हीं वस्तुओं की बजाय उनकी प्रीति एकमात्र परमात्मा में ही थी। हर समय वे राम-राम की रटन लगाए रहते। असार बातों में उनका तनिक भी मन नहीं था। अपने मुख से वे कभी भी मिथ्या कथन नहीं करते। वह संपूर्ण रूप से अर्थात तन-मन-धन से सेवा को तत्पर रहते। भक्तवत्सल गोविंद के गुणगान में ही डूबा हुआ रहने लगा। एक दिन वह अपने खेत की ओर जा रहा था तभी रास्ते में भगवान ने दर्शन दिए। भगवान साधु रूप में थे। उन्होंने धना से कहा-सेवा में तुम्हारी बराबरी कोई नहीं कर सकता, तुमने बहुत संतों की सेवा की है। आज इस साधु को भी दूध, शक्कर, आटा, घृत देकर मनुष्य जन्म को सफल बनाओ। सेवा करने में तुम अग्रणी रहे हो, तुम्हारे द्वारे पर जो भी संत आए हैं, तुमने प्रीतिपूर्वक सब की यथायोग्य सेवा की है। धना कहने लगा-स्वामी मैं आपको पहचान गया, आप मेरे अंतर्यामी हैं। इस समय मैं खेत जाने के निमित्त रास्ते में हूं। वर्षा हो चुकी, इसलिए हल जोतने का कार्य करना है और मेरे पास आपने जो-जो सामग्री मांगी है, उसकी बजाय केवल बीज रूप में अन्न है। आप कृपा कर मेरे घर-द्वार को पवित्र कीजिए, वहां आपको अवश्य ही इच्छित भोजन प्राप्त होगा। सदैव ही संतसेवा को उद्यत रहने वाली मेरी घरनारी आपकी भली प्रकार सेवा करेगी। धना की इस बात पर वह वैरागी कहने लगा कि मैंने तो इस सत्य का पता लगाया है कि धना कभी भी साधुओं को किसी चीज के लिए मना नहीं करता है। तुम अपने सत्य पर अडिग नहीं हो। साधुओं की सेवा करने वाले होकर एक साधु को ना दे रहे हो ? तुम्हारे पास यह अन्न की जो पोटली है, वह दे दो, हम इससे भोजन प्राप्त कर लेंगे। धना को यह बात ठीक लगी, उसने आगा-पीछा सोचे बिना, बीज रूपी अन्न की वह पोटली पूरी प्रसन्नता के साथ साधु को सौंप दी।
साधु के साथ अन्य साधुओं की टोली थी। प्रभु भक्त साधुजन गेहूं की पोटली लेकर रवाना हो गए और इधर धना खाली हाथ अपने खेत पहुंचा। परचीकार अनंतदास कहते हैं कि सेवा का भाव रखने वाला भक्त बडा ही श्रेष होता है. वह अपना सब कुछ दान कर परमात्मा को प्राप्त कर लेता है।
धना को बीजविहीन देखकर उसके खेत का हाली उदास हो गया। उसने धना से कहा कि अब तुम गांव जाकर दूसरा बीज लाओ ताकि हल चलाएं। धना ने समझाया कि तुम तो बिना बीज के ही हल चलाओ, तुम्हारे हिस्से का अन्न तुम्हें प्राप्त होगा। इस बार हमारे पडौसी के जितना अन्न उपजे, उस हिसाब से तू अपने अन्न की भरपाई कर लेना। अब अन्न लेने गांव नहीं जाएंगे। तब हाली और धना एक-एक बैल से हल चलाने लगे। सायंकाल तक बिना बीज के पूरा खेत जोत डाला। सायंकाल को हाली अपने घर आया और धना की पूरी रामकहानी अपनी घरवाली को सुना डाली। उसने बताया कि हमारे मालिक धना ने अपना सारा बीज साधु-भक्तों को दे दिया और मेरे समेत उसने पूरे दिन खेत में बिना बीज के हल चलाया। गेहूं-चना तो थे ही नहीं, तब क्या डालते ! अपने पति से सारा हाल जानकर हाली की धर्मपत्नी क्रोधित हो गई। क्रोधवश वह गालियां बकने लगी। पति को कहने लगी-तू तो एकदम बावला है, अब तुम और तुम्हारा परिवार वर्ष भर क्या खाएगा, अपना गुजारा कैसे करेगा ? वह तो (धना) मोडा है (स्वामी / वैरागी) है, मांगकर गुजारा कर लेगा। हाली की पत्नी से ऐसी जली-कटी बातें जब धनाजी की धर्मपत्नी हरिदासी (अर्थात परमात्मा में मन लगाए रखने वाली) ने सुना तो वह उसे विश्वास दिलाने लगी- वह भक्त नारी बोली-हालण बाई, तुम मन में दृढ़ विश्वास रखो, तुम्हारे हिस्से का अन्न कहीं नहीं जाएगा। अगर तुझे मेरी बात पर विश्वास नहीं है, तो दो बैलों में से एक को बेचकर तुम्हें उसके मोल का अन्न दिलवा दूं।
धनाजी ने एक गंभीर व्यक्ति की भांति समझाते हुए कहा कि व्यक्ति को क्रोधवश कभी भी कड़वी वाणी का प्रयोग नहीं करना चाहिए। क्रोध, व्यक्ति के सोचने-समझने की बौद्धिक क्षमता का हरण कर लेता है। दस दिनों तक इस प्रसंग (बिना बीज हल चलाने) को गुप्त ही रखो। सारे संसार के भरण-पोषण का जिम्मा ठाकुरजी का होता है, उसकी लीला अपरंपार है, उसके किए हुए को देखो, बाकी सारा हिसाब-किताब बाद में करना।
पांच दिनों के पश्चात एक दिन हाली खेत में गया तो उसके आश्चर्य का कोई आर-पार नहीं रहा, पूरे खेत में अनाज उग आया था, जबकि हल चलाते समय बीज तो डाला ही नहीं गया था। हाली के मन में आनंद छा गया। वह समझ गया कि यह कृपा भगवान ने अपने भक्त पर की है। हाली इस चमत्कार को मन में छुपाकर नहीं रख सका। उसने यह बात खेरीपुर गांव की चौपाल में हथाई कर रहे सब लोगों को बड़े आनंदित होकर बताई। उसने धनाजी की बड़ाई करते हुए कहा कि मेरे स्वामी की गति, मति और रति के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता। परमात्मा के प्रति इनको दृढ़ विश्वास है। एक उच्च कोटि के भक्त जैसे ये ज्ञानी, ध्यानी और धैर्य की प्रतिमूर्ति हैं।
परचीकार अनंतदास कहते हैं कि धना के मन में धैर्य का वास था और परमात्मा के प्रति गहन विश्वास था, तभी प्रभु ने उनकी आशा को फलित किया।
चौपाल में हथाई कर रहे, उपस्थित जनों ने कहा कि हे हाली, तुम्हारे स्वामी धना की परमात्मा के प्रति ऐसी दृढ़ धारणा कैसे बनी ? तब हाली ने कहा- मेरी बात को विस्तार से सुनो-एक दिन प्रभात के समय मैं धनाजी के खेत में पहुंचा। मैं इस भक्त की उन समस्त बातों को आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूं, जो मेरी आंखों के सामने घटित हुईं। हम दोनों धना के खेत में हल चला रहे थे, किंतु हमने बीज भरकर रखा जाने वाला बीजिया ही नहीं बांध रखा था, इसलिए हमें मुट्ठी में अन्न लेकर बीजणी में डालने की आवश्यकता ही नहीं पड़ी। संपूर्ण दिन हमने बीज डाले विना सूखा हल ही चलाया। बीज के रूप में गेहूं अथवा चने का एक दाना भी नहीं डाला। लेकिन कैसा आश्चर्य, अब आज मैंने जाकर देखा तो उसी खेत में खूब फसल उग आई है। बिना बीज डाले, गेहूं-चने सुंदर ढंग से उग आए हैं। हाली की इस बात को जिसने भी सुना उसे बहुत अधिक मात्रा में आश्चर्य हुआ। भगवान की लीला को कोई नहीं जान सकता।
अब हाली और उसकी धर्मपत्नी को धना के सामर्थ्य का बड़ा भय उत्पन्न हुआ। उन्होंने धना एवं उनकी धर्मपत्नी को जो अंट-संट बातें कुछ दिन पहले कह दी थी, उसका प्रायश्चित होने लगा। वे दोनों जाकर धना के पैरों में गिर पड़े। गिड़गिड़ाते हुए कहने लगे- हमारे से बहुत बड़ी भूल हुई है, आप तो अंतर्यामी की भांति दयालु हैं, हमारी भूल की क्षमा प्रदान करें। तब धनाजी ने कहा- आपकी कोई त्रुटि अथवा भूल नहीं है। आप और मेरे भीतर एक ही परमात्मा तत्त्व रूप से विराजित हैं। तुम पति-पत्नी दोनों को एक निवेदन करना चाहता हूं, उसका जीवन में निर्वाह करो। जीवन में सेवा के व्रत को ग्रहण करो, सेवा हेतु कभी भी मन में संकोच न लाओ। भगवान के भक्त वैरागीजनों की सेवा के लिए सदैव तत्पर रहो, हरिभक्तों के लिए सबकुछ लुटा कर जीवन सफल कर लो। तुम्हारे योगक्षेम की चिंता ठाकुरजी की है। धना के मुख से संतसेवा की महिमा सुनकर हाली दंपती का संशय भाग गया और वे दोनों साधुसंत की सेवा में लग गए। धना का हाली भी धना की ही जाति का अर्थात जाट था। हाली फिर खेत में आया और कृषि कार्य में लग गया। खेत में फसल को देखकर उसे बडी प्रसन्नता हई। पूरा खेत चारों कोनों तक भरपूर फसल से भरा हुआ था। धना के खेत में अन्य पडौसियों से दूगुना अन्न पैदा हुआ। सदकर्म हमेशा फलित होता है, वह कभी भी व्यर्थ नहीं जाता। भगवान को सदकर्म ही प्रिय हैं।
परचीकार अनंतदास कहते हैं कि धना की भक्ति सत्य पर टिकी हुई थी। उसका परमात्मा के पति निश्चय दृढ़ था और भक्तों के प्रति उसका सेवाभाव खरा था। जब इतनी बातें किसी के व्यक्तित्व में हो तो हरि उसका खेत क्यों नहीं निपजाए।
उसके बाद एक आश्चर्य फिर हुआ। धना के खेत की चौफेर मेड़ (सींव) पर बहुत-सी तुंबडी की बेलें उग आई। सूख जाने पर ये तंबिया साधू-संतों के जल रखने के काम आती हैं। खेत की सुरक्षा के लिए जो बाड़ बनी हुई थी उस पर वे तुंबियों की बेलें छा गई। सुकाल का समय था, उन बेलों के बड़े-बड़े और सुंदर तुंबे लगे। धना भगत ने यह सोचकर कि भगवान ने साधु-संतों के काम में आने के लिए इतने सुंदर तुबे दिए हैं, इसलिए उन तुंबों को एकत्र कर लिया। संयोग से एक दिन उच्च कोटि के संतों की एक मंडली वहां आई। धना की निश्छल सेवा-भक्ति के कारण अक्सर ही संतों की मंडली वहां आया करती थी। संतों की इस मंडली को देखकर वह बहुत प्रसन्न हुआ तथा अपने भाग्य की सराहना करने लगा-मेरे धन्य भाग हैं, स्वामी आप पधारे। दंडवत प्रणाम कर, संतों के पैरों को धोकर चरणामृत ग्रहण किया और कहा-हे संतजन, आपने मुझ पर अहेतुक कृपा कर दर्शन प्रदान किए हैं। सब संतों को उचित आसन देकर बैठाया गया, उसके पश्चात धना की पत्नी हरिदासी आई। उसने सब संतों के समक्ष बैठकर प्रणत भाव से बारी-बारी से प्रणाम किया और कहा कि आज हमारे सारे कार्य पूर्ण हुए अर्थात जन्म लेना सफल हुआ। थके हारे महात्माओं के चरण ऊष्ण जल से धोए। चरणों को धोकर उस जल का चरणामृत रूप आचमन किया। संतों ने जब पति-पत्नी के संतों के प्रति ऐसे उच्च भाव देखे तो उन्हें लगा कि यह सेवक दंपती बड़े विवेकी हैं। जितना सेवाभावी धना है, वैसी ही आज्ञाकारिणी उसकी धर्मपत्नी है। भगवद् विश्वास में आकंठ डूबी हुई। धनाजी अब साधुओं से भोजन तैयार करने की आज्ञा प्राप्त करते हैं। साधु कहते हैं, हां बिना विलंब किए रसोई तैयार करो। साधु कहते हैं, आज्ञा तो भगवान करते हैं। तुम्हारे घर में जो भी रसोई बनी हो, वह ले आओ। साधुओं के भोजन करने की जगह पर गोबर का चौका देकर पवित्र किया गया। जल के ताजा पात्र भरे गए, तब भक्त धना भोजन प्रसादी की सामग्री लेकर आया। आटा, घृत, मिठाई, खीर बनवाने के लिए चावल और दूध लेकर आया और कई प्रकार की तरकारी भी लाया। घर में गायें थीं, इसलिए दूध-दही की कोई कमी नहीं थी।
अनंतदास परचीकार कहते हैं, साधु सेवा में जिसने अपना तन-मन-धन सर्वस्व लगा रखा हो ऐसे भक्त शिरोमणि को भगवद्याप्ति क्यों न हो। अनंतदास ऐसे भक्त की गाथा गाता है।
संतों ने बड़े प्रेम से भोजन प्रसादी प्राप्त की तथा बाद में भगवङ्कथा सुनाने लगे। संतों के दर्शनार्थ नगर के नर और नारी आने लगे। प्रेमपूर्वक कथा-कीर्तन कर सत्संग की गई। सर्वत्र आनंद छा गया। तत्पश्चात धना ने संतों से निवेदन किया कि हमारे खेत में ये सुंदर तुंबे हुए हैं, आप लोग भेंट स्वरूप एक-एक तुंबे को ले जाइए। धना ने उन तुंबों को मंगवाया। इतने सुंदर तुंबे सभी साधुओं को मनभावन लगे। तुंबे हाथ में लेकर साधुओं ने कहा कि तुंबे तो हलके हुआ करते हैं, पर ये इतने भारी कैसे हैं। करौती मंगवा कर तुंबों का मुंह किया गया तो देखा, तुंबों के भीतर गेहूं भरे हुए थे। रामजी की इस माया को देखकर हर कोई अचंभे से भर गया। अब तो हर तुंबे का मुंह कर उसमें से गेहूं निकाले गए। तुंबों से निकाले गए गेहुंओं की एक बड़ी ढेरी लग गई। गेहूं तो साधुओं ने सारा धना भक्त को दे यिा और तुंबे वे ले गए। जितने कण भक्तों में बांटे गए, उतने मण खेती से प्राप्त किए। जब सब कृत्य परमात्मा के हों तब ऐसी बातों का आश्चर्य क्या ? वह परमात्मा अपने भक्तों के प्रति सदैव दयालु रहता है। उसने धना भक्त के खेत को निपजाया। कबीर के घर बालद लेकर आए। अपने हाथों नामदेव की छान छवाई तथा पीपाजी को द्वारिका के दर्शन करवाए। उदार परमात्मा ने सब संतों के कार्य पूरे किए और न जाने कितने पतितों का उद्धार किया।
इस प्रकार इस परची के माध्यम से अनंतदास ने भक्तप्रवर धनाजी महाराज के यश का गायन किया है। वे कहते हैं, रामानंद के शिष्य की भक्तिमय महिमा अवर्णनीय है, वह कही नहीं जा सकती है।
अनंतदास द्वारा रचित इस परची से धनाजी के भक्तिमय जीवन प्रसंगों पर सांगोपांग प्रकाश पड़ता है। यह कहा जा सकता है कि यह परची उनके भगवद् भक्त रूप को भली प्रकार उद्घाटित करती है।
