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भक्त श्री धनाजी एवं धनावंश

अध्याय : द्वितीय   -    भक्तमालों में धना चरित्र

 

भक्तिकाल और उससे पूर्व के भक्तों का पद्यमय चरित्रगान हमें नाभादास कृत 'भक्तमाल' के छप्पय छंदों में प्राप्त होता है। भक्तों के चरित्र गान से हृदय शुद्ध और निर्मल होता है। भगवान और उनके भक्तों के चरित्र की महिमा अद्वितीय है। भक्तों की पावन कथाएं कहने-सुनने से अंतःकरण पवित्र होता है तथा भगवान के प्रति अनुराग जाग्रत होकर भक्ति दृढ़ होती है। नाभादासजी भक्तमाल में भक्तों की कीर्ति को कल्याणकारी बताते हैं, उन्होंने एक दोहे में कहा है-

 

जग कीरति मंगल उदै तीनौं ताप नसायं।

हरिजन को गुन बरनते हरि हृदि अटल बसायं ।।'

 

अर्थात - भक्तों के यशगान से संसार में यश और कीर्ति का संप्रसार होता ही है, तीनों तापों से मुक्ति प्राप्त होती है, मंगल का उदय होता है और अटल रूप से हरि हृदय में वास करने लगते हैं। उपरोक्त दोहा तो 'भक्तमाल' के अंतिम पद में है, जबकि भक्तमाल के प्रारंभिक मंगलाचरण के प्रथम दोहे में ही नाभादासजी कह देते हैं-

 

भक्त, भक्ति भगवंत गुरु चतुर नाम वपु एक।

इनके पद वंदन किएं नासत विघ्न अनेक ।। 1 ।।

 

नाभादासजी कहते हैं- दिखने में भले ही, भक्त, भक्ति, भगवान तथा गुरु चार संज्ञाएं दिखाई दे, पर तत्त्व और स्वरूप से ये एक ही हैं। इनके चरण वंदन से सारे विघ्नों का नाश हो जाता है।

नाभादासजी ने अपने गुरु अग्रदासजी की आज्ञा शिरोधार्य कर इस अनुपम ग्रंथ भक्तमाल का लेखन किया। भक्तमाल के प्रारंभ में वे इस गुरु आज्ञा का वर्णन भी करते हैं।

 

(श्रीगुरु) अग्रदेव आग्या दई भक्तन को जस गाउ।

भवसागर के तरन को नाहिन और उपाउ ।। 4।।

 

भक्तों के यशोगान की आज्ञा को धारण करने वाले नाभादास ने 214 दोहों एवं छप्पय छंदों में इस सुंदर भक्त चरित्र ग्रंथ का प्रणयन किया। पद्म में रचित इस गेय ग्रंथ को वैष्णव समाज के अनुपम ग्रंथ का विरुद प्राप्त हुआ है। ' भक्तमाल की कथा करने वाले संत आचार्य अपने को 'भक्तमाली' कहने में बड़ा गौरव अनुभव करते हैं। जिस प्रकार श्रीम‌द्भागवत आदि का सत्संग होता है, वैसे ही भक्तमाल की कथाएं भी बड़े समारोहपूर्वक गाई एवं सुनी जाती हैं। नाभादासजी ने भक्तमाल में इसके रचनाकाल का कोई उल्लेख नहीं किया। अनुमानतः इसका रचनाकाल संवत 1642 से संवत 1680 के मध्य माना जाता है।' सुविदित है कि प्रज्ञाचक्षु नारायणदास (नाभादास) के गुरु रामानंद संप्रदाय के रैवासा पीठाधीश्वर अग्रदेवाचार्य थे। अग्रदेवाचार्य का जन्म फागुन शुक्ला द्वितीया वि. संवत 1553 को राजस्थान के दाधीच ब्राह्मण परिवार में हुआ था। अठारह वर्ष की अवस्था में अग्रदेव ने गलता में कृष्णदासजी पयहारी से शिष्यत्व ग्रहण कर लिया था। इन्हीं अग्रदेवाचार्य को नाभादास बाल्यकाल में जंगल में अनाथ रूप में मिले थे। निरंतर प्रेमाभक्ति में डूबे रहने वाले अग्रदेवाचार्य एक सिद्ध संत थे। रामकृपालदास चित्रकूटी के कथनानुसार- "दीन-हीन-अंधे बालक के रूप में श्री नाभाजी मिले। उन्हें नेत्र ज्योति, पंच संस्कार से संपन्न कर नारायणदास यह नाम दिया और संत सेवा में नियुक्त किया। पुनः समर्थ देखकर भक्तमाल रचना की आज्ञा दी।" चतुः संप्रदाय के 52 द्वारों में 14 द्वारे अग्रदेवाचार्य की परंपरा से है। रामभक्ति में रसिक मधुरोपासना में आप अग्रगण्य रहे।

 

रामानंदजी के बारह शिष्यों में अनंतानंद प्रधान शिष्य थे। उनके शिष्य थे कृष्णदास पयहारी। रसिक प्रकाश भक्तमाल में विवरण प्राप्त होता है कि पयहारी ने पुष्कर में बारह वर्ष तक षडाक्षर राममंत्र का जप किया। अनुष्ठान के दौरान ही मां सीता ने उन्हें साक्षात् दर्शन प्रदान किए। आमेर के राजा पृथ्वीसिंह के अत्यधिक आग्रह पर वे पुष्कर से गलता चले गए। गलता में उस समय तारानाथ नाम के एक नाथपंथी संत का दबदबा था, पर वह शीघ्र ही तपस्वी पयहारीजी की आध्यात्मिक शक्ति के आगे नतशिर हो गया और वहां से अन्यत्र कहीं चला गया। महाराज पृथ्वीसिंह को उस आचरणहीन तारानाथ से मुक्ति प्राप्त हुई और उन्होंने कृष्णदासजी को अपना गुरु बना लिया। वैष्णव रामभक्ति का गलता तब एक प्रमुख केंद्र बन गया।

 

कृष्णदासजी पयहारी के दो शिष्य थे-कीलदास और अग्रदेव।

 

अग्रदेव को अग्रदास भी कहते थे। आयु में बड़े होने के कारण, कृष्णदासजी पयहारी के गोलोक गमन करने के पश्चात गलता आश्रम की गद्दी का दायित्व कीलदास को प्राप्त हुआ। अग्रदेव तब गलता से चलकर रैवासा आ गए। यों तो कृष्णदासजी पयहारी के बाइस शिष्य थे। उनके नाम नाभादासजी अपनी भक्तमाल के एक छप्पय में इस प्रकार बताते हैं- कीलदेव, अग्रदेव, केवलदास, चरणदास, हठीनारायण, सूरजदास, पुरुषोत्तमदास, पृथुदास, त्रिपुरदास, पदमनाथ, गोपालदास, टेकराम, टीला (टीलदास), गदाधारी, देवपंडा, हेमदास, कल्याणदास, गंगाबाई, विष्णुदास, कान्हड़दास, रंगाराम, चांदण तथा सबीरी।

 

राम रसिक उपासना दक्षिण के आलवार संतों से लेकर अग्रदेवाचार्य तक काफी पल्लवित हो चुकी थी, पर उसे एक दार्शनिक बाने के साथ व्यवस्थित रूप देने का कार्य अग्रदेवाचार्य ने किया। उनकी पद्य कृति 'ध्यान मंजरी' में रसिक उपासना के अलौकिक रूप को प्रस्तुत किया गया है। 'ध्यान मंजरी' के इन सिद्धांतों का रसिक संतों में सर्वाधिक प्रचार एवं सम्मान हुआ। एक प्रकार से परवर्ती श्रृंगारी साधना की वह गीता हो गई और उसके प्रणेता रसिक संप्रदाय के प्रवर्तक आचार्य मान लिए गए।'

 

भक्तमाल के रचयिता नाभादासजी ने भी अपने गुरु अग्रदेवजी के संबंध में कहा है-

 

श्री अग्रदेव गुरु कृपा ते बाढी नवरस बेलि।

चढ़ी लड़ैती लाल छवि फूली नवल सुकेलि ।।

 

जब गलता से अग्रदेव रैवासा में आ गए तो उनके प्रिय शिष्य नाभादास भी उनकी सेवार्थ रैवासा में आ पहुंचे। डॉ. भगवतीप्रसाद सिंह मानते हैं कि भक्तमाल की रचना संवत 1642 (1558 ई. सन) में की गई। भक्तमाल के अलावा भी इनकी दो रचनाएं रामचंद्रजी का 'अष्टयाम' ब्रज भाषा के गद्य-पद्य दोनों स्वरूप में प्राप्त होती हैं। किंतु प्रसिद्ध रचना 'भक्तमाल' ही हुई।

 

'भक्तमाल' की रचना नाभादास किसी पांडित्य प्रदर्शन के भाव से नहीं करते हैं, वरन वे विनयपूर्वक कहते हैं कि चारों युगों के जितने भक्त हुए हैं और जो आगे होंगे, उनके चरणों की पावन धूलि हमारे मस्तक पर सदा विराजमान रहे। क्योंकि भक्त ही मेरे सर्वस्व हैं। नाभादास का दृढ विश्वास है कि भक्त गुणगान से वे इस भवसागर से तर जाएंगे। भक्तमाल की रचना के लिए नाभादास को अपने गुरु के आशीर्वाद से दिव्य दृष्टि प्राप्त हुई। भक्तमाल की रचना उन्होंने गुरु आज्ञा के पालनार्थ की। नाभादासजी द्वारा भक्तमाल रचना के उपरांत इसकी अनेक टीकाएं तथा अनेक नवीन भक्तमाल रचे गए, किंतु इस भक्तमाल जैसी प्रतिष्ठा अन्य की नहीं हुई। मात्र 214 पदों में रचित नाभादास के भक्तमाल की गद्य-पद्य रूप में बड़ी-बड़ी टीकाएं की गईं। संवत 1769 में की गई श्री प्रियादास की 'भक्तिरस बोधिनी' टीका सर्वाधिक प्रसिद्ध हुई। इस टीका में उन्होंने 634 कवित्तों की रचना की। यानी नाभादासजी के भक्तमाल से तीन गुना वृद्धि इस टीका में हो गई।

 

हमारे आलोच्य भक्त श्री धनाजी महाराज के भक्तिमय जीवनवृत्त का निर्देश भक्तमाल के पद संख्या 62 में एक पूरे छप्पय के रूप में प्राप्त होता है। वह इस प्रकार है-

 

घर आए हरिदास तिनहि गोधूम खवाए।

तात मात डर खेत थोथ लांगल हिं चलाए ।।

आस पास कृषिकार खेत की करत बड़ाई ।

भक्त भजे की रीति प्रगट परतीति जु पाई ।।

अचरज मानत जगत मैं कहुं निपज्यौ कहुंवै बयो।

धन्य धना के भजन कों बिनहिं बीज अंकुर भयो ।।62 ।।

 

अर्थात - परम भागवत धना के घर पर साधुओं की जमात आई। उन्होंने खेत में बीजने के लिए रखे गेहूं भी आए हुए साधुओं को खिला दिए। माता-पिता के डर से अपने खेत में बिना बीज के ही हल चला दिए। हल चलाकर वह अपने घर आ गए लेकिन थोड़े दिनों बाद निकट पड़ौस के खेतीहर उसके खेत में धारोधार ऊगे गेहूं की बड़ाई करने लगे तो धना को बड़ा आश्चर्य हुआ किंतु धना जान गए कि भगवान के भक्तों की सेवा निष्फल नहीं जाती। संसार के लोगों को भी जब इस बात का पता चला तो उन्होंने आश्चर्य मिश्रित हर्ष से कहा कि भगवान की लीला विचित्र है, बोया कहीं और निपजा कहीं। नाभादासजी कहते हैं, ऐसे भगवद्भक्त धनाजी के भक्तिभाव की वे प्रशंसा करते हैं, जिनके खेत में बिना बीज के ही अंकुर (गेहूं) उग आए।

 

प्रियादास ने अपनी 'भक्ति रस बोधिनी' टीका में तीन कवित्तों के माध्यम से भक्त धनाजी के चरित्र का इस प्रकार विस्तार किया-

 

खेत की तो बात कही प्रगट कवित्त मांझ और एक सुनौ भई प्रथम जू रीति है। 

आयौ साधु विप्रधाम सेवा अभिराम करै ढस्यौ ढिंग आप कही मोहूं दीजे प्रीति है। 

पाथर लै दियो, अति सावधान कियौ छाती महं लाय जियो, सेवै जैसी नेह नीति है। 

रोटी धरि आगै आंखि मूंदि लियौ परदा कै छियौ नहिं टूक देखी भई बड़ी भीति है ।।

(कवित्त पद-306)

 

बार-बार पांव परै अरै भूख प्यास तजी धेरै हिये सांचौ भाव पाई प्रभु प्यारियै। 

छाक नित आवै नीकै भोग को लगावै जोई छोड़ै सोई पावैं प्रीति रीति कछु न्यारियै। 

जाको कोऊ खाय ताकी टहल बनाय करै ल्यावत चरावत गाय हरि उर धारियै। 

आयौ फिरि विप्र नेह खोजहूं न पायौ कहूं सरसायौ बातें लै दिखायौ स्याम ज्यारियै ।।

(कवित्त पद-307)

 

द्विज लखि गायनि में चायनि समात नाहिं भायनि की चोट दूग लागी नीर झरी है।

जायकै भवन सीता रंवन प्रसन्न करें बड़े भाग मानि प्रीति देखी जैसी करी है।

धना कौ दयाल व्है कै आज्ञा प्रभु दई ढरौ करौ गुरु रामानंद भक्ति मति हरी है।

भए शिष्य जाय आप छाती सों लगाय लिये किए गृह काम सबै सुनी जैसी धरी है।।

(कवित्त पद-308)

 

नाभादासजी ने धना की भक्ति के प्रभाव का वह प्रसंग लिया, जिसमें वह संतों की सेवावश खेत का बीज भी साधुओं को खिला देता है और भक्ति के प्रताप से बिन बाहे, गेहूं पैदा हो जाते हैं। जबकि प्रियादास भक्तिरस बोधिनी के तीन कवित्तों में धना के बाल्यकाल का एक अन्य प्रसंग चित्रित करते हैं। उपरोक्त तीनों कवित्त में वर्णित कथाप्रसंग इस प्रकार है-

 

प्रियदास कहते हैं। खेत की बात तो पूर्व में नाभादासजी ने अपने कवित्त में कह दी, पर मैं धनाजी के बाल्यकाल का दूसरा प्रसंग सुनाता हूं। एक दिन घर आए एक द्विज द्वारा ठाकुरजी की रीतिपूर्वक बहुत सुंदर ढंग से सेवा करते देखकर उस घर के बालक धना को बड़ा आनंद आया। उसने ब्राह्मण के निकट आकर कहा- मैं भी ठाकुरजी की सेवा करना चाहता हूं। मेरे मन में भी उनके प्रति बहुत प्रेम है। ब्राह्मण के पास एक शालग्राम पत्थर था, उसने वह पत्थर धना को पकड़ा कर कहा कि तुम बड़ी सावधानी अर्थात बड़े ध्यान से इस ठाकुर की सेवा करना। धना बड़ा प्रसन्न हुआ और उस शालग्राम रूपी ठाकुर को अपने हृदय से लगा लिया। ब्राह्मण तो चला गया। धना ने अगले दिन भगवान के आगे प्रसाद रखा, पंडित की तरह परदा किया, आंखें बंद कर सामने बैठ गया। थोड़ी देर बाद सोचने लगा कि अब तो भगवान ने प्रसाद प्राप्त कर लिया होगा तब उसने आंखें खोली और देखा, प्रसाद तो ज्यों का त्यों पड़ा था, भगवान ने उस में से एक कौर तक नहीं खाया था। भगवान की उदासीनता से धना बड़ा भयभीत हो गया। वह सोचने लगा, उसकी सेवा में जरूर कोई कमी रह गई है, इसलिए उसे भगवान से क्षमा मांगनी चाहिए।

 

वह सच्चे मन से प्रभु के पैरों में (शालग्राम के) गिरकर क्षमा मांगने तथा विनती करने लगा, पर उसकी विनय का जब भगवान पर कोई असर नहीं हुआ तो वह इस बात पर अड़ गया कि ठाकुरजी आप जब तक प्रसाद नहीं ग्रहण करेंगे, तब तक मैं भी भूखा-प्यासा ही रहूंगा। बालक धना का ऐसा हठ और हृदय की सच्ची भक्ति देखकर भगवान पसीज गए। अब जो भी छाक घर से आती, वह पहले ठाकुर को समर्पित करता। भगवान को धना का प्रसाद बहुत स्वादिष्ट लगता। भगवान प्रसाद में से जो हिस्सा छोड़ते, उसे धना बड़ी रुचि से प्राप्त करता। प्रियादासजी कहते हैं, प्रीत की रीत कुछ विलग ही होती है।

 

एक दिन भगवान ने धना के समक्ष एक प्रस्ताव रखा कि मैं रोजाना तुम्हारा प्रसाद खाता हूं। जो जिसका अन्न खाता है, उसको उसकी कुछ सेवा टहल भी करनी चाहिए, इसलिए तुम आज से बैठे रहा करो, मैं तुम्हारी गाएं चराकर ले आया करूंगा। धना ने ऐसा करने के लिए मना किया, पर ठाकुर कब मानने वाले थे, वे प्रतिदिन धना की गाएं चराने लगे।

 

कुछ दिनों उपरांत वह ब्राह्मण त्रिलोचन पुनः धना के घर आया, पर उसने धना को वहां पूजा करते नहीं देखा तो कहा कि तुम ठाकुर की पूजा क्यों नहीं करते हो। इस पर धना ने प्रसन्न होते हुए कहा कि वह अपने खेत में ठाकुर को रोज प्रसाद चढ़ाता है और बदले में वे नित्यप्रति हमारी गाएं चराते हैं। पंडित को धना की बातों पर विश्वास नहीं हुआ। पंडित ने कौतुहल से पूछा कि वे भगवान अब कहां हैं? धना ने भोलेपन से उत्तर दिया-बताया तो है, वे हमारी गाएं चराने के लिए गए हैं। पंडित इस बात पर कैसे विश्वास करे। पूजा तो ठाकुरजी की वह वर्षों से कर रहा है, पर उसके समक्ष तो भगवान कभी प्रकट नहीं हुए। पंडित ने बहुत आग्रह किया तो धनाजी उसे अपने खेत में ले गए जहां श्यामसुंदर गाएं चरा रहे थे। ठाकुर को गाएं चराते देख द्विज के आश्चर्य का ठिकाना न रहा। उसका हृदय धना की निश्छल भक्ति देखकर गद्गद हो गया ओर आंखों से प्रेम की अश्रुधार फूट पड़ी।

 

फिर भगवान ने धना को गुरु करने की आज्ञा प्रदान की और कहा कि अभी भारतभूमि में रामरूप संत रामानंद हैं, उन्हें अपना गुरु बनाओ तथा विधिपूर्वक मंत्र दीक्षा ग्रहण करो। भगवद् आज्ञा का पालन करते हुए धना ने रामानंदजी को अपना गुरु बना लिया। प्रियादास कहते हैं कि रामानंद को गुरु बनाने पर भगवान बहुत प्रसन्न हुए और उन्हें अपने हृदय से लगा लिया। धना अपने गृहस्थ के सारे कार्य करते हुए भक्ति भावना में निमग्न रहने लगे। प्रियादास कहते हैं- मैंने जैसा सुना है, वैसा लिख दिया है।

 

नाभादासजी की भक्तमाल और प्रियादासजी पद्यमय टीका जिस तरह से भक्त चरित्रांकन के रूप में विख्यात रही है, इसी प्रकार दादूपंथी राघवदासजी की 'भक्तमाल' तथा चतुरदासजी की पद्य टीका भी अत्यंत चर्चित रही है। राघवदास ने भी धना के चरित्र को दो छप्पय छंद के माध्यम से अभिव्यक्त किया है।

 

राघवदासजी ने भक्तमाल की रचना क्यों की, इसके संबंध में वर्णन प्राप्त होता है कि दादूदयालजी के पौत्र शिष्य प्रह्लाददासजी ने यह विचार किया कि नाभाजी ने अपनी भक्तमाल में सगुण भक्तों की कथाएं तो लिखीं, पर निर्गुण भक्तों की कथाएं नहीं लिखीं, जबकि भक्तमाल में निर्गुण सगुण दोनों प्रकार के भक्तों की कथाएं होनी चाहिए। इसकी पूर्ति के लिए प्रह्लाददास ने अपने पौत्र शिष्य राघवदास को निर्गुण-सगुण भक्तों की कथाओं से युक्त सुंदर भक्तमाल लिखने की आज्ञा प्रदान की। राघवदास ने गुरु आज्ञा धारण कर इस भक्तमाल की रचना की।

 

संवत सत्रह-सै सत्रहोतरा, शुकल पक्ष शनिवार ।

तिथि तृतीया आषाढ़ की, राघव कियो विचार ।। 779 ।।

 

यानी विक्रम संवत 1717 की आषाढ़ शुक्ला तृतीया, शनिवार को विचारपूर्वक भक्तमाल ग्रंथ को पूर्ण किया। इस भक्तमाल में कुल 781 पद हैं। दादूपंथी चतुरदासजी ने इसकी पद्य टीका वि. संवत 1857, भादवा बदी चवदस, मंगलवार को पूर्ण की। दादूपंथी नारायणदास ने इसकी गद्य टीका, जिसे उन्होंने 'भक्तचरित्र प्रकाशिका' नाम दिया, विक्रम संवत 2026 में पूर्ण की।

 

राघवदास की भक्तमाल में भक्त शिरोमणि धनाजी का चरित्र वर्णन -

छप्पय

संतन के मुख नाखि के, धनैं खेत गेहूं लुणे।

बीज बांहणै लाग्यो, साधु भूखे चलि आये।

मगन भयो मन मांहि, सबै गेहूं बरताये।

मात पिता तैं डरत रिकत ऊंमरा कढाये।

भक्त भाव सौं भजे और तें बधे सवाये।

राघो अति अचिरज भयो, बिन बाहें निपजै सुणै।

संतन के मुख बाहि कै, धनै खेत गहूं लुणे ।। 37 ।।


 

मनहर छंद

गाडौ भस्यौ बीज बीचि संतन कौं बांटि दयौ, 

असै रह्यौ ध्यान तिहुँ लोक धनां जाट कौ।

 

पारौसी के खेत कौ करार कीन्हौ हारिन सूं, 

हाथ मारि लयो जन कौल कीयौ काठ कौ।

 

गेहूं लगे ठौर कछु वोरन कौं नांहिं और, 

ऊंमरा कढाये डर मांन्यौ राज हाट कौ।

 

राघो कहै खेत हरि हेत अति निपज्यौ जु, 

दिन दिन बढत प्रभाव पुण्य ठाठ कौ ।। 3811

 

नाभादासजी के प्रसंग को ही राघवदासजी ने थोड़े अंतर के साथ पुनः रचा है।

 

धना गाड़ा भरकर बीज को खेत में बोने के लिए ले जा रहा था, किंतु रास्ते में भूखे साधु मिल गए। साधुओं के प्रति सदैव ही धना का अनुरागमय भाव था, उसने वे सभी गेहूं साधुओं को भोजन कराने में खर्च कर दिए। पर साथ ही उसे जब माता-पिता के उल्हाने का ध्यान आया तो बीज बीजे बिना उसने खाली ऊमरे (हल की लकीरें) निकाल दिए। नित्यप्रति भगवद् भक्ति में लीन रहने वाले धना ने भले ही बिना बीज खेती की, पर उसके खेत की फसल औरों से सवाई रही। राघवदास कहते हैं, यह बड़े आश्चर्य की बात है कि धना के खेत में बिना बीजे अन्न उत्पन्न हुआ। धना ने अपना अन्न तो संतों की क्षुधापूर्ति के काम लिया, पर वे सारे गेहूं खेत में उग आए।

 

आगे, दूसरे पद में राघवदास कहते हैं कि धना ने गाड़े में भरा सारा बीज साधुओं को बांट दिया, क्योंकि धना का मन संत सेवा में इतना ही उदार था। उसके इस परमार्थ भाव के कारण ही सर्वत्र उसका सुयश फैलने लगा। धनाजी अपने साथ खेत में हाली भी रखा करते थे। साधुओं को बीज बांटने पर उस हाली ने आपत्ति की। धना ने कहा, तुम उसकी चिंता न करो, पड़ौसियों के खेत में जिस हिसाब से गेहूं पैदा होगा, उसी के अंदाज को परख कर तुम्हें तुम्हारे हिस्से का गेहूं दे दिया जाएगा। धना ने हाथ पर ताली पटककर उसे विश्वास दिलाया। उधर खेत बिना जोते रहने पर राज भी खेत दूसरे को दे सकता था तथा वह बनिया जिसने बीज के निमित्त गेहूं दिया था, वह भी नाराज न हो, यह सोचकर खेत में बिना बीज के खाली ऊमरे निकाल दिए। राघवदास कहते हैं, इस सबके उपरांत धना के खेत में अधिक उपज हुई और उसकी भक्ति का प्रभाव दिनोदिन बढ़ने लगा।

 

चतुरदास कृत पद्य टीका

 

इंदव छंद

खेत कथा कहि दी सब राघव, फेरि सुनो इक पैल भई है।

वैष्णव ब्राह्मण सेव करी घर, देखि ठस्यो मन मांगि लई है।

गोल सु अश्म उठाय दियो वह, लेत भयो अति बुद्धि दई है।

भोग लगावत आड करावत, ग्रास न खावत चिन्त नई है।। 164 ।।

 

चतुरदासजी कहते हैं कि धना के खेत में घटित कथा तो राघवदासजी ने कह दी है। अब मैं धना के बाल्यकाल की कथा कहता हूं। धना के घर पर एक वैष्णव ब्राह्मणका सुआगमन हुआ। उसने बड़ा मन लगाकर भगवान की सेवा की। धना ने मनोयोग से सेवा करते उस ब्राह्मण को देखा तो वह बड़ा प्रभावित हुआ। ब्राह्मण ने अपने झोले से शालग्राम को निकाल कर स्थापित किया, पूजा की और भोग लगाया। धना बड़े ध्यान से यह सब क्रियाएं देख रहा था। उसने ब्राह्मण से कहा कि उसे भी भगवान की यह मूर्ति दे दी जाए। बालक का मन देखकर एक गोल-सा दूसरा शालग्राम झोले से निकालकर पंडित ने धना को पकड़ा दिया और कहा- ये भगवान हैं, इनकी रोज पूजा किया करना तथा इन्हें भोग प्रसाद चढ़ाना, इनके भोग लगाए बिना स्वयं भोजन न करना। अब धना उस शालग्राम मूर्ति की पूजा करने लगा और भोग लगाता, परदा करता, किंतु भगवान को प्रसाद ग्रहण करते न देखकर चिंतातुर हो गया। वह सोचने लगा-इस तरह प्रसाद ग्रहण नहीं करेंगे तब भगवान तो दुबले हो जाएंगे।

 

पांय परै विनती हु करै तज, भूख मरै अड़ि के जु पुवायो।

रोटिन ल्यावत, नित्य जिमावत, जो रहित पावत यूं मन लायो। 

कोउ सुवावत काहि रिझावत, गाय चरावत यूं प्रभु भायो।

आय फिरौं द्विज देखत नै कछु, बात कही सब राम दिखायो ।। 165 11

 

धना भगवान को अतिशय अनुनय विनय करता, पैरों में गिरता, पर जब भगवान ने प्रसाद नहीं पाया तो उसने भी अन्न ग्रहण करना त्याग दिया। धना भूखा रहने के कारण दुबला होने लगा, पर उसने अपनी प्रतिज्ञा को नहीं छोड़ा। तय कर लिया, भगवान जीमेंगे तो वह जीमेगा। अंततः भगवान को अपने बालभक्त की बात माननी पड़ी। प्रकट होकर वे धना की लाई भोजन प्रसादी को पाने लगे। भगवान कुछ भोजन सामग्री धना के लिए शेष छोड़ देते, उसे रुचिपूर्वक धना प्राप्त कर लेता। धना भगवान में मगन रहने लगा। एक दिन भगवान ने धना के समक्ष यह प्रस्ताव रखा कि इस संसार में जो जिसका अन्न खाता है, वह उसका कार्य कर उसे प्रसन्न रखता है। मैं भी तुम्हारा अन्न खाता हूं, इसलिए तुम्हारी गायें चरा लाया करूंगा। अब ठाकुर रोज धना की गायें चराने लगे।

 

एक दिन वह ब्राह्मण जिसने धना को शालग्राम शिला प्रदान की थी, वह धना के घर आया और धना से कहने लगा कि तुम ठाकुर की पूजा भलीभांति करते हो न, और प्रसाद भी चढ़ाते होंगे ? धना ने कहा- तुम्हारे ठाकुर कुछ दिन तो रूठे रूठे रहे, प्रसाद ग्रहण नहीं किया, किंतु अब ऐसा नहीं है, समय पर प्रसाद ग्रहण कर लेते हैं और गायें चराते रहते हैं। धना की बातें सुनकर ब्राह्मण चकित हो गया। गायें चराने वाले भगवान के दर्शनों के लिए वह अत्यधिक आतुर हो गया। उसने धना को भगवान के दर्शन कराने को कहा। धना उस पंडित को अपने खेत में वहां ले गया, जहां भगवान गौचारण किया करते थे। पर ब्राह्मण को भगवान दिखाई नहीं दिए। भगवान ने युक्ति दी कि हे धना, तुम ब्राह्मण की गोदी में बैठ जाओ, इसे मेरे दर्शन हो जाएंगे। धना ने वैसा ही किया, वह ज्यों ही ब्राह्मण की गोद में बैठा, उसे भी भगवान के दर्शन हो गए।

 

गाय चरावत देख खुशी द्विज, भाव भयो जल नैन ढरे है।

धांम सिधारि सु रांम रिझावत, आपहु वा जिमि रीति करै है।

रीझी कहा हरि जाहु धना गुरु, राम हि नंद करो सु सिरे है।

जाय भये शिष कंठ लगावत, काम करै घर ध्यान धेरै है ।। 166 ।।

 

भगवान को अबोध भक्त की गायें चराते देखकर विप्रवर बहुत आश्चर्य मिश्रित खुशी में डूब गए। उनके नयनों से खुशी के आसूं झरने लगे। अपने घर आकर वह ब्राह्मण परमात्मा की भक्ति में निमग्न हो गया। ईश्वर को प्राप्त करने का जो मार्ग है, उसे अपना लिया। कुछ काल उपरांत स्वयं ठाकुर ने धना को स्वामी रामानंदजी को गुरु बनाने की आज्ञा प्रदान की। भगवान की आज्ञा को धनाजी कैसे टाल सकते थे ? काशी में जाकर वे रामानंद के शिष्य बन गए और गृहस्थ के तमाम कार्य करते हुए भी भगवद् भक्ति से कभी विमुख नहीं हुए।

 

नाभाजी और राघवदास की भक्तमाल रचना में 65 वर्ष का अंतराल है। राघवदासजी की भक्तमाल विस्तारित है, वह 781 पदों में रचित है, इसलिए उसमें काफी अतिरिक्त सामग्री समाहित है, पर धनाजी के प्रसंग में यही कहा जा सकता है कि भक्तिपरक घटनाएं वे ही हैं, जबकि कथन भंगिमा अलग है।

 

नाभादासजी द्वारा रचित भक्तमाल की अनेक टीकाएं प्रसिद्ध रही हैं। इनमें रामशरण भगवान प्रसाद रूपकला द्वारा 'भक्ति सुधा स्वाद तिलक' नाम की गद्य टीका का अपना एक स्थान रहा है।" यहां हम उनके वार्तिक तिलक की वे बातें जो पूर्व टीकाओं में वर्णित नहीं हुई उनका उल्लेख कर रहे हैं।

नाभाजी के धनाजी विषयक छप्पय संख्या 62 के अंत में धनाजी का मान बढ़ाते हुए रूपकलाजी लिखते हैं कि, "बिन बीज बोए ही जिनका खेत उपजा, ऐसे श्री 108 धनाजी का भजन धन्य धन्य है।" प्रियादासजी की टीका के वार्तिक में कुछ मनोहारी संवादों को काम में लिया गया है। धनाजी से पूछा कि, "पूजा करते हो कि नहीं ?" तब धनाजी सब वृत्तांत कह गए कि, "स्वामीजी कई दिनों तक तो इन्होंने प्रसाद नहीं पाया इससे मैंने भी नहीं खाया। अब तो आपकी मूर्ति में ही प्रगट होकर रोटी भी खाते हैं और गैया भी चरा लाते हैं।" यह सुन ब्राह्मणजी अति चकित हुए।

 

रूपकलाजी के सामने भक्तमाल के भक्ति प्रसंग तो वही हैं, किंतु उन्होंने अपनी वार्तिक कला से उन्हें रोचक बना दिए हैं।

 

हमने सभी प्रसिद्ध भक्तमालों तथा उनकी टीकाओं का गहन अध्ययन किया। गणेशदास भक्तमाली, गोवर्धन 12 ने भक्तमाल की टीका को चार बड़े खंडों में प्रस्तुत किया है। उनके द्वितीय खंड में धना का प्रसंग आता है। उन्होंने नाभाजी रचित प्रत्येक शब्द का शब्दार्थ प्रस्तुत किया है। टीका में अनेक संबंधित तथ्यों को लाने का प्रयास किया है। जैसे वे व्याख्या में कहते हैं- श्री धनाजी महाभागवत श्रीबलिजी के अवतार हैं। यथा-वन्दौं बलि जिन कलि तन धारयौ। धना रूप हरि प्रेम प्रचारयौ (श्री रामानंदाचार्य चरितामृत) संतों को भोजन कराने के प्रसंग को भी सविस्तार रोचक ढंग से प्रस्तुत किया है। इन्होंने धना के पिता का नाम पन्ना तथा माता का नाम रेखा लिखा है (पता नहीं किस प्रमाण से)। एक प्रसंग है-धना भोजन कराने के लिए सब संतों को अपने खेत में ले जाते हैं।

 

आगे के प्रसंग में भगवान को धना के खेत की रक्षा की फिक्र लगी। भगवान ने सोचा, रक्षा नहीं की जाएगी तो संत सेवा कैसे होगी? भगवान कंधे पर लाठी रखे हुए, नौकरी की तलाश में धना के पास आ गए। यहां नौकरी के प्रसंग को भक्तमालीजी ने बहुत रोचक बनाने का प्रयास किया है, बहुत सारे संवाद धना और पहरेदार बनकर आए भगवान के मध्य होते हैं। अंततः एक तिहाई भाग का अन्न लेने के करार पर भगवान धना के खेत की रखवाली करने को तैयार हो जाते हैं। भगवान ने कहा- हम खेत पर ही रहेंगे, घर पर नहीं आएंगे, आपको वहीं खाना-पीना पहुंचाना पड़ेगा। धना ने यह स्वीकार लिया। अब भगवान बड़ी तत्परता से श्री धनाजी का खेत रुखालने लगे। इस प्रसंग में भगवान और धना के बीच नाटकीय और चुटीले संवाद काम लिए गए हैं और प्रसंग को रोचक बनाया गया है।

 

प्रियदासजी की टीका के प्रसंग को भी भक्तमाली गणेशदास अत्यंत रुचिकर ढंग से प्रस्तुत करते हैं। धना के द्वारा ब्राह्मण से ठाकुरजी की मूर्ति लेने के प्रसंग को कल्पनाओं के रंग से सजाया गया है। धना को भगवान की सेवा का चाव चढ़ा है, उन्हें रात्रि में ठीक से नींद भी नहीं आती है। आखिरकार वे भगवान को उपस्थित होकर भोजन पाने के लिए राजी कर लेते हैं। 'प्रीत की रीत कछु न्यारियै।' प्रेम के विवश भगवान धना का प्रसाद पाते हैं और बदले में उनकी गाएं भी चराते हैं तथा वापस आने पर पंडित को भी भगवान के दर्शन कराए।

 

अंतिम प्रसंग बहुत ही रोचक है, उसे यहां शब्दशः दे रहे हैं-" श्री धनाजी की भक्ति पर रीझकर भगवान उन्हें साक्षात् दर्शन देते, वार्तालाप करते, संग-संग रहते, गाय चराते। इस प्रकार परम सुख प्रदान करते। श्री धनाजी की इच्छा होती कि प्रभु जैसे यह सब सुख दे रहे हैं, वैसे ही मुझे हृदय से लगाकर आलिंगन का सुख भी प्रदान करते तो मैं परम धन्य हो जाता, परंतु श्रीप्रभु धनाजी को कभी हृदय से नहीं लगाते। कभी-कभी धनाजी इस आशा से समीप भी गए, तो प्रभु ने बातों में ही बहला दिया, आलिंगन नहीं किया। तब एक दिन श्री धनाजी साहस बटोरकर हाथ जोड़कर श्रीप्रभु से अपना मनोरथ प्रकट किया और आज तक इस परम लाभ से वंचित रहने का कारण पूछा। तब श्रीप्रभु ने कृपा करके बताया कि वैसे तो आपकी स्वाभाविकी भक्ति से मैं परम संतुष्ट हूं, परंतु आपकी उपासना में अभी इतनी त्रुटि है कि आपने अभी गुरु नहीं किया है। बिना गुरु द्वारा विधिपूर्वक मंत्रोपदेश लिए भक्ति, ज्ञान, वैराग्य परिपक्व नहीं होते हैं। (नामदेवजी का प्रसंग भी ऐसा ही है) श्री धनाजी ने कहा- प्रभो, आप मिल ही गए, तब अब गुरु करने की क्या आवश्यकता रही ? भगवान ने कहा- धना, यह एक मेरी ही स्थापित की हुई मर्यादा है, इसका पालन करना चाहिए। तब धनाजी ने पूछा-तो प्रभो, आप ही बताइए, किसकी शरण में जाऊं? तब श्री भगवान ने कहा-आप श्री स्वामी रामानंदाचार्यजी की शरण ग्रहण करो, वे हमारे ही स्वरूप हैं। फिर मैं बेखटके आपको हृदय से लगा लूंगा।

 

इधर श्री धनाजी से इस प्रकार कहकर भगवान ने उधर श्री स्वामीजी से भी कहा कि धनाजी आपके शिष्य बनने आ रहे हैं, स्वीकार कर लीजिएगा, अधिकारी भक्त हैं। श्रीप्रभु के श्रीमुख से श्री धनाजी की भक्ति की प्रशंसा सुनकर श्री स्वामीजी को बड़ा हर्ष हुआ और बड़े प्रेम से इनको शिष्य बनाकर उपासना के रहस्य समझाए। गुरुपदिष्ट होकर श्री धनाजी जब घर गए तो प्रभु ने ललक कर इनको हृदय से लगा लिया।"

 

चूंकि भक्तमालों में सभी प्रभुभक्तों के चरित्र का वर्णन करना होता है, इसलिए उसमें विस्तृत चरित्र की गुंजायश कम रहती है। चरित्र विस्तार के दृष्टिकोण से ही टीकाएं की गईं ताकि चरित्र के विवरण में थोड़ी वृद्धि तथा लालित्य का समावेश हो।

 

भक्तमाली रामकृपालदास, वृंदावन की 'भक्त तोषिणी' टीका में दो पद प्रसंगवश अलग दिए गए हैं। 'धनि-धनि संत प्रभाव जग यह कछु अचरज नाहिं। संत वदन बोयो धना जाम्यो खेतन मांहि।' दूसरी इस कहावत का उल्लेख किया गया है-'धन्य धना का हरि सौं हेत, बिनही बीज उपजायो खेत।' बाकी इस टीका में धनाजी से संबंधित कोई नई बात नहीं कही गई है।

 

नाभादासजी की भक्तमाल के पश्चात भक्ति साहित्य में एक ओर तो इनकी भक्तमाल की गद्य तथा पद्य रूप में टीका प्रस्तुत करने की प्रवृत्ति रही, वहीं अनेक संप्रदायों के भक्त कवियों ने अपने नजरिए से भी बहुत भक्तमालों की रचना कीं। उन भक्तमालों में अपने-अपने संप्रदाय का दार्शनिक मत भी प्रमुख रहा।

 

रामस्नेही पंथ की खेड़ापा शाखा के संस्थापक आचार्य रामदासजी के शिष्य दयालुदासजी महाराज ने विपुल परिमाण में वाणी साहित्य की रचना की, वहीं संवत 1861 में उन्होंने 566 पदों में 'द्याल बाल भक्तमाल' की रचना की। धनाजी के संबंध में उनका मात्र एक ही छप्पय है, जो इस प्रकार है-

 

बालपणो दिढ प्रीत, सेव भगवद अनुरागी।

परसापरस सुप्रीत, दरस परसण बड़भागी।

भाता खाय गउ चार, खेत बिन बीज निपायो ।

गोंहूं तूंबां मांहि, पैहल हर जन मुख वाह्यो।

रामानंद परसाद गुर, आतम परचै जन प्रगट।

धना भगत आंकूर धिन, भाव साख निपजी अघट ।। 228 ।।

 

भावार्थ- बाल्यकाल से धना की भगवान में अगाध प्रीति थी। भगवान की सेवा के प्रति गहन अनुराग के भाव धना में विद्यमान थे। प्रीत की सर्वोच्च स्थिति को 'परसापरस प्रीति' अर्थात एक-दूसरे को परस-स्पर्श की स्थिति कहा जाता है। वे बड़े भाग्यशाली भक्त थे, जिनका भगवान के साथ साक्षात्कार होता रहता था। भगवान धना का लाया भाता (छाक) खाकर उनकी गायें चराया करते। धना के बिन बीज बाहे खेत में उन्होंने गेहूं निपजाए। क्योंकि धना ने वे गेहूं, पहले साधुओं के मुख में बाह दिए थे, अर्थात उनकी क्षुधापूर्ति कर दी थी। द्याल बाल कहते हैं कि ऐसे भगवद् भक्त धना धन्य हैं, जिनको आत्मपरिचय कराने वाले रामानंद जैसे गुरु प्राप्त हुए। उन्हें गुरु की प्राप्ति भी परमात्मा की कृपा से हुई। उनके भक्तिरूपी खेत में भावरूपी फसल उत्पन्न हुई जो कभी भी समाप्त नहीं हुई अर्थात अघट रही।

 

'भक्तमाल' की तर्ज पर दादूपंथी नारायणदास ने 'संतमाल' की रचना की। उन्होंने अपनी संतमाल में एक चतुष्पदी धनाजी पर लिखी जो इस प्रकार है-

 

रोटी धना की प्रेम से खाई चराई गाय थी।

बिन बीज गेहूं खेत में बहु हुये ईश सहाय थी।

प्रभु कहत काशी जाय, रामानंदजी को गुरु बना।

गुरुमंत्र लेकर नारायण सु धन्य हो गया था धना ।। 270 ।। 15

 

नारायणदासजी ने अपनी संतमाल के पदों की स्वयं ही गद्य टीका की है। टीका में उन्होंने नाभादास कृत भक्तमाल के सभी प्रसंगों का पुनर्कथन किया है।

 

श्री ब्रजवल्लभशरण वेदांताचार्य पंचतीर्थ ने भक्तमाल की 'भक्तिरस बोधिनी टीका' प्रस्तुत की है।" और तो इस टीका में अन्य टीकाओं से कुछ विलग नहीं है, टीका के अंत में धनाजी का एक पद दिया गया है, यह जरूर कुछ अलग बात है।

 

दादूपंथी ब्रह्मदास ने अन्य भक्तमालों से हटकर नए स्वरूप में अपनी 'भगतमाळ' की रचना की।" वह राजस्थानी भाषा में रचित भक्तमाल है। इसका संपादन विद्वान चारण कवि उदयराज उज्ज्वल ने किया। इस 'भगतमाळ' में चार अलग-अलग जगहों पर धनाजी महाराज का यथाप्रसंग उल्लेख है। पृष्ठ सं. 10 पर पद्म है -

 

मिळिया अनुकेत खुदावसु मारग, मांन महातम सेत मनौ।

सह रोटी बीज समेत संतां नां, ढील न लायौ देत धनौ।

खड़ आयो रेत विखै हळ खाली, खेत निपायौ हेत खरै।

गहियां ब्रिद लाज उबारण गायक, काज इसा महाराज करै।

जिय काज इसा महाराज करै ।। 10 ।।

 

अर्थ-ईश्वर भक्त धना हल चलाने के लिए खेत जा रहा था। मार्ग में अनिकेत संत मिल गए, जिन्होंने धना से कहा कि वे भूखे हैं। धना, संतों को भूखे कैसे देख सकता था। अपने पास का सारा अन्न जो खेत में बाहने के लिए ले जा रहा था उन भूखे संतों को खिला दिया। माता-पिता के भय से खेत में बिना बीज के ही हल चला दिए और घर आ गया। पर परमात्मा को तो अपने भक्त वत्सल विरुद की लाज रखनी होती है। धना के खेत में खूब अन्न उपजाया। भगवान तो अपने भक्तों के हित ऐसे कार्य करते ही आए हैं। 21 नंबर पद में वे फिर धना के संबंध में लिखते हैं-


 

धनै धीरज धार मन में, कियौ हरि सूं काज।

बिना वायां नीपजायौ, हुवौ बहतौ नाज। 

तौ सिरताज जी सिरताज, संतां सीस पर सिरताज ।। 21 ।।

 

अर्थ-धना ने अपना सारा बीज (अन्न) साधुओं को खिला देने के बावजूद अपने भीतर के धैर्य का क्षरण नहीं होने दिया। ईश्वर सब समय सब ठीक करते हैं, इस विश्वास के कारण बिना बोये उसके अत्यधिक मात्रा में अन्न हुआ। धना के सिरताज आप सब के सर्वोपरि हैं।

 

भगतमाळ के पृष्ठ 53 पर आपने फिर एक पंक्ति में उपरोक्त प्रसंग का उल्लेख किया है। ऐसे ही पृष्ठ-58 में 'नाज बिना वायौ निपजायौ' पंक्ति का प्रयोग करते हैं।

 

गूदड़ परंपरा के रामस्नेही संत बालकरामजी ने संवत 1833 में नाभादासजी की भक्तमाल की 'श्रीमद् भक्तदाम गुण चित्रणी' टीका तैयार की। भक्तमालों के पद्यमय टीका के रूप में यह सबसे बड़ी टीका कही जा सकती है। इस टीका में 6633 पद हैं तथा छंदों की भी बहुलता है।

 

टीका- भक्तदाम गुण चित्रणी 18

चामर छंद

अब सुनहु गाथा धना जन की जाति को सो जाट।

जब बाल काल हि धना पितु घर लही हरि की बाट ।।

इक बार कुलगुरु विप्र आयो धना पितु घर सोय।

नित करै अरचा राम की अति प्रभु लडावै भोय ।। ।।।

तिहिं पास ठाकुर धनै मांगा करन अरचा प्रीति।

तब दियो द्विज पाषाण ताकूं सिखाई सब रीति ।।

द्विज गयो पाछे करत पूजा धनौ अति रति ठानि।

बन जात गाय चरायबे निज पास प्रभुहिं बसानि ।। 2।।

 

निज छाक रोटी भोग लावत मंदि दृग पट तानि। 

नहिं पाइ तब कलपाइ जन पग लगत बड़ भय मानि ।। 

कहि क्यूं अहो क्षुद प्यास त्यागी भरत दृग जल एह। 

नहि लेऊं भोजन मैं ऊं तुम बिन जानि हरि अस नेह ।। 3 ।।

 

तब कियो भोजन दियो जन सुख भक्त वत्सल राम। 

निज छाक आवै भोग लावै हरिहिं पावै साम ।। 

प्रभु सेष राखै धनौ चाखै प्रेम राखै थीर। 

नित आध पारस खात जन को विचारी रघुवीर ।। 4 ।।

 

तब औसरे हरि गो चरावत धना कूं सुख दीन्ह। 

सो विप्र आयो बरस में घर हरिहिं देखि न चीन्ह ।। 

कहि धना सूं कत गए हरिजी धना तबहि कहाय। 

चलि तोहि हरि कूं दिखाऊं मम सो चरावत गाय ।। 5 ।।

 

द्विज जाय देख्यो गाय चारत दूरि ते हरि आप। 

पुनि निकट गत नहिं सो दिखायो फिरि सिलामय प्राप ।। 

तब विप्र के मन प्रेम जागा झरन लागा नैन। 

असि भावना धरि मैं हूं प्रभु कूं करौ निज बस ऐन ।। 6 ।।

 

तब विप्र निज घर जाय हरि कूं ध्याय लाय सु प्रेम। 

प्रभु तोष किन्हा पोष लीन्हा धना चीन्हा जेम ।। 

पुनि धना कूं हरि जानि भोला हुकम दीन्हा एहु। 

तुम ढरो कासी करो रामानंद गुरु सुख लेहु ।। 7 ।।

 

पुनि धना कासी जाय निज गुरु कीन्ह रामानंद । 

तब भक्ति मेवा सन्त सेवा सिखेवा सुखकंद ।। 

गृह आय हरि हरिदास सेवा कीन्ह लीन्ह सु नेम। 

अब कहत परचौ खेत को बिन बीज निपज्यो जेम ।। 8 ।।

 

बहु संत आवा एक दिन गृह भूख पीड़ित तेह । 

बीजार गोहूं संत जिमये धनै करि अति नेह ।। 

तब मात पितु तिस खिजनी लागे क्यूं खवायो बीज। 

कहि धना उहि तो कीट डाढ्यो हुतो मति करू खीज ।। 9 ।।


 

ताते हि भूखे संत जिमये और ल्याऊं नाज। 

मैं धरि राख्यो हौ बीज नीको खेत बाहन काज ।। 

अस करि पिता को समाधानहि हल बुलाए खेत। 

तब बीज बिन हल फेरि रीता भस्यो मन हरि हेत ।। 10।।

 

हालीन सूं अस कहि बनाई देहै गोहूं वाह। 

बीजार अब के लाय ऊरहि खेत भल अवगाह ।। 

तब धनो बीजहिं पिता छाने हिरत गोधू खंच। 

यहु भेद हाली तिया जान्या दोउ विधि कर रंच ।।11।।

 

झट प्रजूल ऊठी कर्कशा तन समावै न उसास। 

सा लरन लागी मति अभागी धना की तिय पास ।। 

कहि मुणस तेरे बीज मुड़ियन खवायो करि हेत। 

पितु-मातु कूं भोलापन रीता हल फिराया खेत ।।12।।

 

अब बीज ढूंढत मिलत नाहीं खेत ढूंढत तेह। 

जो खेत खाली जाय अबके उड़ेगो घर खेह ।। 

अरु होहु किंवा तुमहि मुड़िया हमारो की हाल। 

तब तिय धना की कही खिजि के क्यूं बजावत गाल ।। 13 ।।

 

हालीपना को धान्य तेरो देहिं लेखे डारि। 

क्यूं सोच तोकूं धनी पहली जाहु मूढ़ गमारि ।। 

मति देहु गारी संतजन कूं जेहिं हम सिरमौर । 

तूं लखत नहिं हरिभक्त महिमा करत झूठा झौर ।। 14।।

 

तब गई रंडी वदत भंडी करत सब नर पास। 

यही बात प्रगटी खीरपुर सब सुनी जननी जास ।। 

सुनि पिता पुनि कहि धना सूं यहु खेत खाली जात। 

तब धना कहि नहिं जात खाली सांच मानहु बात ।। 15 ।।

 

दिन पंच लगि यहि होत झगरा अरु धना मन सोच। 

निसि जपत रामहिं गुप्त कामहि क्षिति रहेगी पोच ।। 

नहिं मिलत बीजहि पिता खिजहि रखो रघुवर लाज। 

दिन सात में अति खेत मांहि बहुत ऊगो नाज ।। 16 ।।


 

जे हुत परोसी खेत के सब करत अति बखान। 

भल उज गोधू धना खेतहि और सम नहिं धान ।। 

तब देख नैनहिं धना आपहि भयो अति मन चैन । 

हरिभक्त सेवा करन की परतीति पाई ऐन ।। 17 ।।

 

अस गैब सूं गोहूं उगाना भए पुर विख्यात । 

सब लोक अचरज करत जग में धना धन्य कहात ।। 

पुनि भई नेपै बहुत क्षेपै जास सनमुख राम। 

अब संक तजि नित संत सेवा धना तिय जुत धाम ।। 18।।

 

पितु मात मृति गत तहां पीछे सुनो और उ बात। 

इक बार खेपा लटत आए संत बहु मग जात ।। 

कहि धना सूं हम भूख पीड़ित तब ही गोहू दीन्ह। 

भरि तुंबिका इक एक लीन्हा सबनि अधिक न लीन्ह ।। 19 ।।

 

तब लरत हाली बुद्धि काली जिस कपालीहीन । 

कहि भक्ति हो बेचित्त तेरो करत है धन क्षीन ।। 

अब मैं न हाली रहौं तेरा पिता हूं सूं जानि। 

सो लेय अपनो नाज न्यारो भयो बड़ अभिमान ।। 20 ।।

 

तिहि बरस बरसा भई सरसा धना के पग पीर। 

नहिं खेत श्रावण वाह कीन्हो जुक्ति कछु न ठीर ।। 

तब खेत सारे तुंबिका की बेलि गैबी छाई। 

आसोज कार्तिक मांहि तुंबा लगा अनगण भाई ।। 21 ।।

 

सब लोक हांसी करै हाली उही चटकी देत। 

हम बिन धना को खेत देखहु तुंबिका उतपेत ।। 

अब भक्त हुवै है धनौ ले कर तुंबिका तिय जुक्त। 

यहु सुनि धना नहिं होत विमना हरि भरोसा भुक्त।। 22।।

 

तब धनै हरिकृत खेत तुंबा उप्त नीका मानि। 

रखवाल खेतहि धस्यो इक नर संत कारज जानि ।। 

जब सर्व पाका तुंबका बहु मास खेत रहाय। 

पुनि पग धना को भयो ताजो फिरत इत उत धाय ।। 23 ।।

 

इक दिवस साधू काज तुंबौ लाय इत मुख कीन्ह। 

गोधू भरे ता मांहि पूरण निरखि अद्भुत चीन्ह ।। 

तब सो धनै दरबार लखई गोहूं तुंबनि जात। 

जो हुकम व्है तो करूं खलहा सुनत कौतुक आत ।। 24 ।।

 

दरबार तब इक देखि तुंबा गोहूं तुंबा मांहि। 

उन कहि तिहारा भाग का यहु हम जु लेवें नाहिं ।। 

तब धनै सबही तुंबका घर लाय गोधू लीन्ह। 

फिरि अति भरोसो राम को जन धना के मन कीन्ह ।। 25 ।।

 

अस संत सेवा पाक मेवा धरेवा बहु भंत । 

जल काज तुंबा लेन कूं वा संत आय अनंत ।। 

अस धना सुमना संत रमना जास राम सहाय। 

जे मूढ हाली बुरा कहिता ते रहे मुख चाय ।। 26 ।।

 

सोरठा

धन्य धनो हरिदास सफल संत सेवा लही। 

जिसकी रति शुभ वास सकल जगति विस्तर रही ।। 27 ।।

 

अपनी पद्यमयी टीका में संत बालकरामजी कहते हैं कि अब मैं आपको जाति से जाट भक्त धना की भक्तिमय गाथा सुनाता हूं-

 

धना को अपने घर में बाल्यकाल में ही भक्ति का चाव लग गया। एक बार जब उनके घर में उनका कुल ब्राह्मण आया और वह कुछ दिन धना के पिता के आग्रह पर वहीं रुका। वह ब्राह्मण नित्य ही बड़े मनोयोग से ठाकुरजी का अर्चन-वंदन करता। उसकी पूजा विधि को बालक बड़े गौर से देखा करता। उसके लिए यह पूजा बड़े कुतुहल का विषय थी। धना ने बड़ी प्रीत से ब्राह्मण को कहा कि वह भी भगवान से प्रेम करना चाहता है तथा उनकी पूजा करने का भाव रखता है। कुल ब्राह्मण ने बालक के मन के भाव समझे और अपने पास से एक शालग्राम धना को देते हुए, उसे पूजा करने की सारी रीति समझाई। ब्राह्मण देवता के विदा होने पर धना ने पूजा करना तय किया। वन में गाय चराने जाते तब अपने शालग्राम को साथ ले जाते।

 

ब्राह्मण की बताई रीति के अनुसार शालग्राम को सामने रखते। खुद के भोजन हेतु जो छाक साथ लाए, उसमें से चूरमें रोटी का भोग ठाकुर को लगाया और भोग लेने की प्रतीक्षा करने लगे। आंखें मुंदे, प्रभु का ध्यान लगाए, अचानक याद आया कि बालभोग कराते समय ब्राह्मण ने पट ताना था। धना ने भी ब्राह्मण का अनुसरण किया, अपने गमछे पर पट लगाया। थोड़ी देर बाद देखा तो प्रसाद ज्यों का त्यों पड़ा था, प्रभु ने तनिक नहीं पाया। धना को बड़ी निराशा हुई, वह दुखी हो गया, भगवान के आगे दंडवत पसर गया और किसी अनजाने में हुई भूल के लिए क्षमा मांगने लगा। बोला-भगवान, भूख-प्यास को क्यों त्याग दिया। आंखों से जलधार बहने लगी। जब भगवान को मनाने के सारे प्रयास बेकार चले गए तो हठ करने लगा। कहा- अगर तुम भोजन-पानी नहीं ग्रहण करते तो मैं भी नहीं करने वाला। ठाकुर प्रेम को पहचानते हैं।

 

भक्त धना का अमित प्रेम देखकर भक्तवत्सल भगवान ने भोजन कर उसे सुख प्रदान किया। वे इसी रीति से अपने भक्तों को सुख प्रदान करते हैं। अब धना प्रफुल्लित होकर रोजाना छाक लेकर आवे, पहले प्रभु को भोजन करावे और शेष भोजन स्वयं प्राप्त करे। रोजाना आधा भोजन रघुवीर करें और यह विचार करें कि मुझे भी भक्त के निमित्त कुछ कार्य करना चाहिए। यह सोचकर वे धना की गायें चराकर उन्हें सुख देने लगे। वह ब्राह्मण देवता कुछ काल बाद धना के घर में पुनः उपस्थित हुए पर उन्होंने अपने दिए शालग्राम को जब घर में (पूजागृह) नहीं पाया तो कहा कि शालग्राम रूपी ठाकुरजी की वह प्रतिमा कहां है? तब धना ने कहा कि मेरे साथ खेत चलो, वहां दिखाऊं, वे वहां मेरी गायों को चरा रहे हैं। द्विज ने दूर से ही देखा-ठाकुर गाय चरा रहे थे, किंतु निकट जाने पर दिखाई नहीं दिए। निकट जाने पर तो वे शालग्राम रूप में ही दिखाई दिए।

 

ब्राह्मण के मन में परमात्मा के प्रति सच्चा प्रेम जाग्रत हुआ, उसके नयनों से अश्रुपात होने लगा। उसने प्रण किया कि वह भी धना की तरह ठाकुर से निश्छल प्रेम करेगा और उन्हें प्राप्त करने का यत्न करेगा। घर आकर उसने प्रेम से ईश्वर आराधना प्रारंभ कर दी। थोड़े ही दिनों में ठाकुर ने धना की ही भांति ब्राह्मण को दर्शन देकर संतुष्टि प्रदान की। फिर ठाकुर ने धना का भोलापन जानकर उसे आज्ञा प्रदान की कि तुम काशी की तरफ जाओ और संत शिरोमणि रामानंद को गुरु रूप में प्राप्त करो। भगवद् आज्ञा को प्राप्त कर धना काशी गए और वहां रामानंदजी से शिष्यत्व प्राप्त किया और कंठी ग्रहण की। वे अब स्वामी हो गए। गुरु रामानंदजी ने उन्हें भक्ति और संतसेवा की अनेक सुखकारी बातों की शिक्षा प्रदान की। घर आकर धना ने हरिभक्ति और संतसेवा का कार्य प्रारंभ कर दिया। संतसेवा के इस नियम से उनकी प्रसिद्धि दूर तलक हो गई।

 

एक दिन बहुत सारे संत उनके घर आए। लंबी यात्रा के कारण संतों को बड़ी भूख लगी हुई थी। धना के घर में उस समय बिजाई करने के लिए गेहूं पड़े थे। धना ने प्रेमपूर्वक उस अन्न की रोटी बनाकर संतों को खिला दी। माता-पिता खेत से आए, उन्होंने देखा कि धना ने जो गेहूं खेत में बाहने के लिए रखा था, उसी को साधुओं को खिला दिया है, इस पर वे धना पर बहुत खीजने लगे। धना ने माता-पिता को बहलाते हुए कहा कि उन गेहुंओं में तो कीट लग गया था, वे बीजने के काबिल नहीं थे। बीजने के लिए तो मैंने अच्छे गेहुंओं को रख रखा है और मैं हल बाहने के लिए शीघ्र ही खेत में जाता हूं। बीज तो था ही नहीं, धना के मन में तो हरि के प्रति प्रीति थी। धना ने बिना बीज के हल चला दिए। धना ने अपने हाली से कहा कि उसे यह बात उसके पिता से छुपाए रखनी है। उसके हिस्से के गेहूं वह अन्यत्र से लेकर दे देगा। हाली तो किसी तरह मान गया किंतु उसकी घरवाली को यह बात पता चली तो वह बिफर गई। पति से यह भेद जानकर वह प्रज्वलित अग्नि की भांति उठ खड़ी हुई। उस कर्कशा स्त्री को इतना क्रोध उत्पन्न हुआ, जिससे उसके शरीर में तेज-तेज सांसें उठने लगीं। वह तुरंत धना के घर पहुंची और धना की पत्नी से झगड़ा करने लगी। कहा-तेरे इस निखट्टू पति ने अपना सारा बीज मोड़ों को खिला दिया। माता-पिता को बहला कर, झूठ बोलकर इसने खेत में रीता हल फिराया है। अब ढूंढ़ने से भी बीज नहीं मिलना है और खेत में वर्षा का गीलापन भी जा रहा है। जो खेत इस बार खाली रह जाएंगे, वहां केवल रेत उड़ेगी। हमारे घर में भी रेत ही उड़ेगी, इस स्थिति में मोड़ी (स्वामिन) तुम बताओ, हमारा क्या हाल होगा ? तब धना की धैर्यवान स्त्री ने कहा कि तुम क्रोध में भरकर क्यूं फालतू अपने गाल बजा रही हो ? तुम्हारे हालीपन के हिस्से का जितना अनाज होता है, वह तुम्हें मिल जाएगा। हे मूढ़ स्त्री, तुम्हें इन सब बातों का सोच अपने पति से भी पहले क्यूं है? धना की स्त्री ने कहा कि तुम संतों को मोड़ा कहकर क्यूं गाली दे रही हो, संतजन तो हमारे सिरमौर यानी माथे के मोड़ हैं। तू व्यर्थ विवाद कर रही है, हरि के भक्तों की महिमा तू क्या जाने ? तब वह कुलटा नारी धना को बदनाम करते हुए गांव के अन्य लोगों के पास गई। अब तो खेरीपुर (खीरपुर) के एक-एक जन को यह बात पता लग गई। जब पिता को धना की करतूत का पता लगा तो उन्होंने पुत्र धना से कहा कि इस बार हमारा खेत तो खाली चला जाएगा। तब धना समझाने लगा कि हमारा खेत खाली नहीं जाएगा, इसे सच मानें। पांच दिनों तक परिवार में यही झगड़ा चलता रहा। धना मन में चिंतित होने लगा। वह रात-दिन भगवान राम का स्मरण करने लगा-हे भगवान, हमारा खेत पोचा रहेगा। पिता ने कहा- अब दुबारा हल चलाएं तो भी बीज नहीं मिल रहा है। धना स्मरण करने लगा- हे रघुवर, मेरी लाज रखना। सात दिनों बाद खेत में भारी फसल उग आई। खेत के पड़ौसी आ-आकर यह बात बताने लगे। वे कहने लगे - इस बार धना के खेत में जैसे गेहूं उगे हैं, वैसे तो किसी के खेत में नहीं है।

यह बात जब धना ने स्वयं अपने नेत्रों से देखी तो उसके मन को चैन प्राप्त हुआ। संत बालकराम कहते हैं कि हरिभक्तों की सेवा करने की प्रतीति धना ने इस प्रकार प्राप्त की।

 

इस प्रकार गुप्त रूप से गेहूं उगने की बात पूरे खेरीपुर गांव में फैल गई। सब लोग मन में आश्चर्य करते और साथ ही धना की भक्ति की प्रशंसा भी करते जाते। जिनके भीतर भगवद् प्रीति रहती है, उनके कार्य सदैव वर्धमान रहते हैं, किसी चीज की बाधा उपस्थित नहीं रहती। अब सब तरह के संशय का त्याग कर धनाजी और उनकी धर्मपरायण श्रीमती नित्य ही संतसेवा में जुट गए। उनके घर पर संतों की टोलियां आतीं और सत्संग करतीं। धना ने सत्संग का व्रत ही ग्रहण कर लिया।

 

संत बालकराम वर्णन करते हैं कि धना के माता-पिता देवलोक होने के पश्चात की एक बात और सुनो-

 

एक बार धना अपने खेत में खलिहान निकाल रहे थे, तभी बहुत सारे संत रास्ते-रास्ते चले आ रहे थे। उन्होंने धना से कहा कि हमें बहुत भूख लग रही है। धना ने सभी साधुओं की एक-एक तुंबिया गेहूं से भर दी। एक-एक तुंबी से अधिक उन्होंने नहीं लिया। धना द्वारा साधुओं को गेहूं बांटते देखकर धना का कुबुद्धि हाली लड़ाई करते हुए कहने लगा कि भक्ति ने तुम्हारी मति का हरण कर लिया है, परिश्रमपूर्वक पैदा किए हुए धन का कोई इस तरह नाश करता है क्या? मैं तुम्हारे पिता के समय से तुम्हारा हाली रहा हूं, पर अब नहीं रहूंगा। उसने अपना अनाज ले लिया और घमंडपूर्वक अलग हो गया। उसी वर्ष वर्षा हुई और धना के पैर में पीड़ा उत्पन्न हो गई। श्रावण मास में खेत ऐसे ही बिना हल जोते पड़ा रहा, कोई भी युक्ति काम नहीं आई। बिन बाहे खेत में तुंबों की अड़क बेलें उग आईं। आसोज और कार्तिक के महीने में उन बेलों के अनगिनत तुंबे लग गए। तुंबों भरे खेत को देखकर पड़ौसी खेतों के लोग हंसी उड़ाए और हाली भी चुटकियां बजाकर धना की खिल्ली उड़ाने लगा। वह कहने लगा-हमारे ही कारण से अन्न पैदा होता था, अब हम नहीं हैं तो खेत चौतरफ तुंबियों से भर गया। धना बड़ा भक्त हुआ फिरता है, अब वह और उसकी पत्नी इन तुंबों की कुछ युक्ति करे। भगवान में प्रगाढ़ भरोसा रखने वाला धना पड़ौसियों तथा हाली की बातों से तनिक भी विचलित नहीं हुआ। तब धना ने सोचा, भगवान का खेत है और भगवान के तुंबे हैं। सबकुछ अच्छा ही होगा। धना ने सोचा, इन तुंबों को साधु लोग हमेशा अपने साथ रखते हैं, ये पकने पर उनके काम आएंगे, इस सोच से अनुप्राणित होकर धना ने उन तुंबों की रखवाली के लिए एक आदमी छोड़ दिया। जब सारे तुंबे पक गए तो उन्हें खेत में एक जगह एकत्र करवा लिए।

 

कुछ दिनों बाद धना के पैर की पीड़ा ठीक हो गई। अब वह इधर-उधर घूमने लायक हो गया। एक दिन एक साधु को तुंबा देने के लिए लाया गया। तुबे का मुंह काटा गया तो आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा, उसमें गेहूं भरे हुए थे। तब धना ने इस बात की सूचना दरबार को दी और पूछा कि आपकी आज्ञा हो तो मैं तुंबों से गेहूं निकालने का कार्य करूं।

 

इस कौतुक को दरबार ने भी आकर देखा कि सभी तुंबे गेहूं से ठसाठस भरे हुए थे। दरबार ने कहा कि धना, ये तो तुम्हारे भाग्य से पैदा हुए हैं, इन पर हमारा कोई अधिकार नहीं है। तब धना उस सारे गेहूं को घर ले आया। धना के मन में अपने ठाकुर पर और भारी भरोसा हुआ। इस प्रकार धना संतों की सेवा कर भांति-भांति के मेवा प्राप्त करता। जल भरने के काम आने वाले उन तुंबों को लेने बहुत-से साधु धना के यहां आए। धना का मन इतना सुंदर था कि उसकी रुचि संतसेवा में ही रहती। इस प्रभाव से ठाकुरजी सदैव उसकी सहाय करते। मूर्ख हाली इस बात को जानता नहीं था इसलिए बुरा-भला कहता रहा।

 

हरिभक्त धना धन्य-धन्य है, जिसने संत सेवा की सफलता प्राप्त की। उसकी रति-गति हमेशा परमात्मा में रही, इसलिए संसार में उसकी ख्याति का विस्तार हुआ।

 

इस प्रकार हम देखते हैं कि सभी भक्तमालों में भक्तप्रवर धनाजी का भक्तिमय गुणगान हुआ है। साथ ही इन पद्य रचनाओं से उनके भक्तिमय, संतजन हितैषी स्वभाव की जानकारी सहज प्राप्त होती है। धनाजी का संपूर्ण जीवन भक्ति एवं संत सेवा से ओत-प्रोत था।


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