भक्त श्री धनाजी एवं धनावंश
अध्याय प्रथम :-
वैष्णव धर्म का अभ्युदय एवं विकास
धनावंशीय वैरागी समाज विशुद्ध रूप से वैष्णव संप्रदाय में परिगणित है। इसकी धार्मिक एवं आध्यात्मिक पृष्ठभूमि से अवगत होने के लिए वैष्णव धर्म के संक्षिप्त एवं क्रमिक इतिवृत्त को जानना महत्त्वपूर्ण होगा।
'वैष्णव धर्म रत्नाकर' में उल्लेख है-
विना श्री वैष्णवीं दीक्षां प्रसादं सद्गुरोर्विना ।
विना श्री वैष्णवं धर्मे कथं भागवतो भवेत ।।
धर्मार्थ काम मोक्षाणामालयः सांप्रदायकः ।
संप्रदायविहीना ये मंत्रास्ते निष्फला मताः ।।'
सद्गुरु से वैष्णवी दीक्षा प्राप्त किए बिना, वह वैष्णव ही कैसा? वैष्णव धर्म अपनाए बिना कैसा स्वामी, कैसा धनावंशी ? संप्रदाय का अर्थ है- धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष प्रदान करने वाले चार पुरुषार्थों का घर। संप्रदाय मान्यता अथवा संप्रदाय में दीक्षित हुए बिना सभी प्रकार के मंत्र निष्फल माने जाते हैं। इसलिए हमारी श्रद्धा हमारे धर्मपंथ में होनी चाहिए।
हमारी पवित्र भारतभूमि धर्म से विलग कभी नहीं रही है, इसमें अनेक प्राचीन भावधाराएं प्रचलित और प्रवाहित होती रही हैं। शैव, शाक्त, सौर, गाणपत्य तथा वैष्णव आदि विभिन्न संप्रदायों का धार्मिक मत के रूप में प्रचलन रहा है।
विवेच्य वैष्णव संप्रदाय का उदय वैदिक काल में ही हो गया था। वेदों में वैष्णव भक्ति के कतिपय ऐसे प्रमाण प्राप्त होते हैं, जिनके आधार पर हम कह सकते हैं कि वैदिक काल से ही वैष्णव भक्ति का उदय हो चुका था। वेदों और उसके पश्चात तैत्तरीय संहिता, बाजसनेयी संहिता, ऐतरेय ब्राह्मण, शतपथ ब्राह्मण आदि प्राचीन धर्मग्रंथों में विष्णु के संबंध में पर्याप्त चर्चा की गई है। प्राचीन धर्मग्रंथों में उन्हीं के कारण वैष्णव धर्म को प्राचीन धर्म ठहराया जाता है। कहा जाता है कि वैष्णव धर्म उतना ही प्राचीन है, जितना ऋग्वेद। ऋग्वेद में विष्णु की स्तुति की गई है और ऋग्वेद के विष्णु अद्वितीय गुणों से संपन्न हैं। वे अत्यंत पराक्रमी, अलौकिक गुणों से युक्त, अवतारी, विश्व को धारण करने वाले नियंता, जगतबंध हैं। भले ही विष्णु ऋग्वेद के प्रमुख देवों में नहीं हैं, किंतु बाद में रचित वैदिक संहिताओं और ब्राह्मण ग्रंथों में विष्णु को प्रधान देव के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त हई हैं। ऐतरेय ब्राह्मण में कहा गया है कि अग्नि उत्तम देवता है, विष्णु परम देवता है तथा अन्य देवता इनके बीच में आते हैं।2
पूर्व में वैष्णव संप्रदाय को सात्वत, भागवत तथा पांचरात्र संप्रदाय के रूप में मान्यता प्राप्त हई। वेदों के स्तुत्य देवों में विष्णु, रुद्र, वरुण, सूर्य, इंद्र, अग्नि आदि देव रहे हैं। इनके प्रति उस काल में आत्यंतिक श्रद्धा भी वेदों में दिखाई देती है। माना जाता है कि यही श्रद्धा आगे जाकर धीरे-धीरे भक्ति के रूप में परिणत हो गई। ऋग्वेद में उपरोक्त देवों की उपासना के बहुत संदर्भ प्राप्त होते हैं। श्रद्धावान व्यक्ति, अपनी श्रद्धा भक्ति को धीरे-धीरे एकत्व रूप एक ही देव में स्थापित करने लगता है। वैदिक काल में भी यही हुआ। जो भिन्न-भिन्न देव थे, उनमें एक को अधिक मान दिया जाने लगा। एक देव में भिन्न-भिन्न देवों को देखे जाने का कारण श्रद्धा ही थी। ऋग्वेद का उल्लेख देखें-
त्वमग्ने वरुणो जायसे यत्त्वं मित्रो भवसि यत्समिद्धः ।
त्वे विश्वे सहसस्पुत्र देवा स्तवमिन्द्रो दाशुषे मत्र्याय ।।
त्वमर्यमा भवसि यत्कनीनां नाम स्वधावन्गुह्यमं विभर्षि।
अञ्जन्ति मित्रं सुधितं न गोभिर्यद्यम्पती समनसा कृणोषि ।। (5.3.1-2)
अग्निदेव को संबोधित करते हुए कहा गया है कि- हे अग्निदेव ! तुम ही वरुण हो, तुम ही मित्र हो, तुम ही इंद्र हो और तुम ही अर्यमा रूप में सदा हमारे स्वामी होकर कार्य कर रहे हो। इस प्रकार श्रद्धामूलक भक्ति का उदय हुआ।
ऋग्वेद में प्रायः सभी देवों का उल्लेख है, किंतु विष्णु का स्थान काफी महत्त्वपूर्ण है। कहीं-कहीं विष्णु, सूर्य के स्वरूप को प्रतिभासित करते भी नजर आते हैं। यास्क अपने निरूक्त में व्याख्या करते हुए कहते हैं कि रश्मियों से समूचे संसार को आवृत्त करने के कारण ही सूर्य, विष्णु के नाम से अभिहित होते हैं। जगत को अपनी रश्मियों से प्रकाशित करने के कारण सूर्यदेव को सूर्यनारायण भी कहा जाता है। नारायण शब्द विष्णु के साथ ही जुड़ता है। वैदिक ऋचाओं में विष्णुलोक का भी उल्लेख है। वेदों में विष्णु को त्रिविक्रम कहकर उनकी अपरिमित शक्तियों की ओर संकेत किया गया है। त्रिविक्रम विष्णु अपने तीन पैरों से समस्त ब्रह्मांड को नाप लेते हैं। इसलिए उन्हें उरुगायः यानी तेज गति वाले तथा उरुक्रमः यानी विस्तृत पैर वाले भी कहा गया है। इस ब्रह्मांड को मापने के लिए उन्हें तीन पैरों की आवश्यकता नहीं होती है। उनके दो ही पैर इस पूरे ब्रह्मांड को मापने के लिए पर्याप्त हैं। तीसरा पैर तो दृष्टिगम्य ही नहीं है। इसलिए विष्णु को वैष्णव धर्म में महान पद प्राप्त है। वे अपरिमित शक्ति के प्रतीक हैं तथा संसार का कल्याण करने वाले हैं। उनका विष्णुलोक ही सर्वोत्तम गोलोक है। वैष्णव ग्रंथों में उस विष्णुलोक का बहुत मनोहारी वर्णन किया गया है। यहां भगवान श्री विष्णु अंतर्यामी रूप में विराजित रहते हैं और संपूर्ण सृष्टि को अपना आधार प्रदान करते रहते हैं। ऋग्वेद में विष्णु को इंद्र के सहायक के रूप में तथा अनेक जगह उन्हें इंद्र से अधिक शक्तियों वाला स्वीकार किया गया है। वे संरक्षक तथा प्राणियों के पोषक रूप में हैं, इस प्रकार की प्रार्थनाएं भी ऋग्वेद में प्राप्त होती हैं।
भगवान विष्णु की अलौकिकता की परिकल्पना, ब्राह्मण ग्रंथों में भी पर्याप्त रूप से मिलती है। ऐतरेय ब्राह्मण ग्रंथ में विष्णु को अग्नि से श्रेष्ठ देव के रूप में माना गया है। इसी प्रकार शतपथ ब्राह्मण ग्रंथ में भी विष्णु को तेजस्वी तथा ऐश्वर्य संपन्न देव की संज्ञा दी गई है। ब्राह्मण ग्रंथों में विष्णु को देवों का प्रहरी देव कहा गया है।
जीवन और जगत के रहस्यों का उद्घाटन करने वाले उपनिषदों में भी विष्णु का उल्लेख है। वस्तुतः उपनिषद्, वैदिक साहित्य के चार अंगों में चतुर्थ अंग कहलाते हैं। वेदों के मंत्र एवं संहिता के पश्चात ब्राह्मण और आरण्यक ग्रंथ आते हैं तथा अंतिम भाग उपनिषद् हैं, जिसमें परमात्मा की चरम परिणति का व्याख्यान हुआ है। उपनिषद् को वेदांत भी कहते हैं, क्योंकि वेदों का जो अंतिम लक्ष्य है- ब्रह्म का निरूपण। वह इस उपनिषद् साहित्य से भली प्रकार सधता है। बारह प्रमुख उपनिषद् माने जाते हैं, जो ईशावास्य, केन, कठ, प्रश्न, मुंडक, मांडूक्य, तैत्तिरीय, ऐतरेय, छांदोग्य, वृद्धआरण्यक, कौषीतकि तथा श्वेताश्वेतर हैं। वेदांत में प्रस्थानत्रयी के रूप में उपनिषद्, ब्रह्मसूत्र तथा श्रीमद्भगवद्गीता को माना जाता है। ब्रह्म निरूपण करने के लिए प्रारंभ में आचार्य शंकर ने इन उपनिषदों पर भाष्य की रचना की। उनके बाद के अनेक संप्रदायों के आचार्यों के लिए उपनिषदों पर भाष्य तैयार करना एक चुनौती और प्रतिष्ठा का कार्य बन गया। इन संप्रदायों के आचार्यों ने अपने मतानुसार भाष्यों की रचना की जो आगे चलकर रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, निम्बार्काचार्य तथा वल्लभाचार्य जैसे संप्रदाय प्रवर्तकों की दार्शनिक भूमिका बन गई।
स्वयं शकराचार्य ने संप्रदाय का अनुगमन प्रत्येक धार्मिक के लिए यथेष्ट बताया। उन्होंने लिखा-
असम्प्रदायवित् सर्वशास्त्रविदपि मूर्खवदुपेक्षणीयः ।
अर्थात सब शास्त्रों का ज्ञाता पंडित भी अगर संप्रदाय को नहीं जानता है, तो वह उपेक्षणीय है। शंकराचार्य ने ईश्वर विषयक ज्ञान का सर्वश्रेष्ठ साधन श्रुति अर्थात उपनिषदों को बताया। उपनिषदों से जिज्ञासु को ईश्वर की तर्कसंगत ज्ञाप्ति होती है। उन्होंने अपने मत से ब्रह्म के निर्गुण और सगुण दोनों रूपों को एक ही वस्तु के दो रूप बताए, अर्थात स्वरूप की दृष्टि से परमात्मा निर्गुण हैं और जगत के संबंध से वे सगुण हैं।
उपनिषदों में विष्णु अवतार के संकेत किस प्रकार से प्राप्त होते हैं, इस पर भी हमें विचार करना चाहिए। वस्तुतः तो वैष्णव धर्म की मूल अध्ययन सामग्री इन उपनिषदों में यत्र-तत्र बिखरी हुई प्राप्त होती है। इनमें कुछ उपनिषद् तो ऐसे भी हैं, जो भगवान विष्णु और उनके अवतारों के रहस्य को पूर्णतया प्रतिपादित करते हैं। ऐसे वैष्णव उपनिषदों की संख्या चौदह हैं। उनके नाम इस प्रकार हैं- अव्यक्तोपनिषद्, कलिसंतरणोपनिषद्, गरुड़ोपनिषद्, गोपाल तापिनी उपनिषद्, तारसारोपनिषद्, त्रिपाद विभूति महानारायणोपनिषद्, दत्तात्रेयोपनिषद्, नारायणोपनिषद्, नरसिंहतापिनी उपनिषद्, रामतापिनी उपनिषद्, रामरहस्योपनिषद्, वासुदेवोपनिषद् तथा हयग्रीवोपनिषद् । उपरोक्त सभी उपनिषद् वैष्णवता को प्रतिपादित करते हैं। भगवान का षोडश मंत्र, जिसे तारक मंत्र कहा जाता है,
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे, हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, यह मंत्र कलिसंतरणोपनिषद् में है। जीव जिन सोलह कलाओं में बंधा हुआ रहता है, उससे मुक्त करने में यह सोलह नाम वाला मंत्र अत्यधिक समर्थ बताया गया है। वैष्णव उपनिषदों के अनुशीलन से हमें यह स्पष्ट पता चलता है कि जो नाना प्रकार के वैष्णव संप्रदाय हैं, उनकी उपासना विधि का मूल ज्ञान, हमें इन वैष्णव उपनिषदों में प्राप्त होता है।
महाकाव्य एवं पौराणिक काल में विष्णु को परमात्मा की संज्ञा प्रदान कर दी गई थी। हमारे सभी पुराणों में ईश्वर को अविनाशी एवं सर्वेश्वर के रूप में मान्यता प्राप्त है। पुराणों के अध्ययनकर्ता जे गोंडा ने अपनी पुस्तक' आस्पेक्ट ऑफ अर्ली विष्णुइज्म' में उल्लेख किया है कि अपने विभिन्न अवतारों के माध्यम से विष्णु सर्वहितकारक रूप में स्वीकार कर लिया गया है। वे सूर्य के समान व्यापक, इंद्र के समान रक्षक, यज्ञ के समान कल्याणकारक और जलवत सर्वाधार माने गए हैं। सर आर.जी. भंडाकर ने अपनी पुस्तक 'वैष्णविज्म शैविज्म एंड माइनर रिलीजियस सिस्टम्स ऑफ इंडिया' में महाभारतकाल के वैष्णव संप्रदाय के संबंध में पर्याप्त सूचनाएँ प्रदान की हैं। उनके अनुसार महाभारत के शांति पर्व में नारायण के अंश का पता चलता है। महाभारत के नारायणीय पर्व में भी वैष्णव धर्म का उल्लेख सात्वत धर्म और पांचरात्र के रूप में प्राप्त होता है। वस्तुतः वृष्णिवंश को ही सात्वत रूप में कहा जाता है। भगवान श्रीकृष्ण इसी l
Lवृष्णिवंश में उत्पन्न हुए थे। कृष्ण उपासना इस वंश में लोकप्रिय हुई। यही सात्वत वर्ग बन गई और उन उपासकों के इस समूह को सात्वत नाम दिया गया। भगवान श्री वासुदेव के उपासकों को ही भागवत कहा गया। वस्तुतः भागवत, एक उपाधि थी, जो कालांतर में वैष्णव उपासना करने वालों के लिए प्रयुक्त होने लगी। कुछ विद्वान इसमें मतभेद भी मानते हैं। उनके अनुसार भगवान और उनकी भक्ति की कल्पना सर्व प्रथम नारायण के उपासकों के मध्य हुई और उन्हें ही भागवत के नाम से जाना गया।
डॉ. राजबली पांडेय के मतानुसार "वैदिक भक्ति की पयस्विनी महाभारत काल तक आते-आते विस्तृत होने लगी। वैष्णव भक्ति की भागवत धारा का विकास इसी काल में हुआ। यादवों की सात्वत शाखा में प्रवृत्ति प्रधान भागवत धर्म का उत्कर्ष हुआ। सात्वतों ने मथुरा, वृंदावन से लेकर मध्य भारत, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक होते हुए तमिल प्रदेश तक प्रवृत्तिमूलक रागात्मक भागवत धर्म का प्रचार किया। महाभारत काल में वैष्णव भागवत धर्म को एक ऐतिहासिक उपास्य का आधार श्रीकृष्ण वासुदेव के व्यक्तित्व में मिल गया। कृष्ण, विष्णु के अवतार माने गए और धीरे-धीरे ब्रह्म से उनका तादात्म्य हो गया। इस प्रकार, नरदेहधारी विष्णु की भक्ति जन साधारण के लिए सुलभ हो गई। भागवत धर्म के इस रूप के उदय का काल लगभग 1400 ईस्वी पूर्व माना जाता है, तथा तब से लेकर लगभग छठी, सातवीं शताब्दी तक यह अविच्छिन्न रूप से चलता रहा।"4
वैष्णव भक्ति को व्याख्यायित करने वाले अनेक धर्मग्रंथ प्राप्त होते हैं, किंतु वैष्णव भक्ति का मुख्य रूप देखना है तो हमें श्रीमद्भागवद् महापुराण का पारायण करना होगा। वैष्णव धर्मग्रंथों में महाभारत का शांति पर्व, पांच रात्र संहिता, सात्वत संहिता, नारदीय भक्तिसूत्र, नारदीय पांच रात्र, हरिवंश पुराणा, पद्म संहिता, विष्णु तत्त्व संहिता आदि ग्रंथ हैं, इनके अलावा परवर्ती सभी वैष्णव संप्रदायों के आचार्यों के सभी ग्रंथों में वैष्णव भक्ति के सूत्र प्राप्त होते हैं।
महाभारत के नारायणीय पर्व में एक प्रसंग प्राप्त होता है, जिसमें बताया गया है कि भागवत धर्म को सर्वप्रथम स्वयं भगवान ने अर्जुन को बताया था और फिर नारायण ने इसका उपदेश नारद को भी किया था। नारद, नारायण के दर्शन करने के लिए श्वेतदीप में गए, जहां यह नियम था कि भगवान के आत्यांतिक भक्त हुए बिना कोई भी उनके दर्शन नहीं कर सकता था। नारद भागवत थे, इसलिए भगवान के दर्शन प्राप्त हुए। इस तरह भगवान की एकनिष्ठ भक्ति करने वाला ही भागवत है। उधर नारद पुराण में उल्लेख है कि, "भगवान विष्णु केवल भक्ति से संतुष्ट होते हैं, दूसरे किसी उपाय से नहीं। उनके नाम का बिना श्रद्धा के भी कीर्तन अथवा श्रवण कर लेने पर, मनुष्य सब पापों से मुक्त हो, अविनाशी वैकुंठ धाम को प्राप्त कर लेता है।" मोक्ष के इस आकर्षण ने भी साधकों को वैष्णव भक्ति की ओर उन्मुख किया। नारद पुराण के एक और उल्लेख को देखिए-" आदिदेव भगवान नारायण श्रेष्ठ वरणीय, वरदाता तथा पुराण पुरुष हैं, उन्होंने अपने प्रभाव से संपूर्ण लोकों को व्याप्त कर रखा है।" वे भक्तजनों के मनोवांछित पदार्थों को देने वाले हैं। उनका स्मरण करके मनुष्य मोक्ष पद को प्राप्त कर लेता है। वैष्णव भक्तों के लिए उपरोक्त कथन स्पृहणीय है।
नारद पुराण के प्रारंभ में ही नारदजी द्वारा की हुई स्तुति में विष्णु का उल्लेख है। नारदजी को नैष्ठिक ब्रह्मचारी और अपने भ्राता सनक, सनंदन, सनत्कुमार और सनातन ब्रह्माजी की सभा में जाते हुए मेरु शिखर पर मिले। उन्होंने सनकादिक मुनियों से कहा कि आप सर्वज्ञ हैं, सदा ही भगवान के भजन में तत्पर रहते हैं। मुझे भगवान के लक्षण बताइए तथा यह भी बताइए कि भगवान कैसे जाने जाते हैं? आदिदेव भगवान विष्णु ने पूर्व काल में ब्रह्माजी की किस प्रकार सृष्टि की, यह भी मुझे बताइए।
इस पर सनकजी ने कहा कि भगवान नारायण अविनाशी, अनंत, सर्वव्यापी और निरंजन हैं। उन्होंने ही इस संपूर्ण चराचर जगत को व्याप्त कर रखा है। स्वयंप्रकाश जगन्मय महा विष्णु ने सृष्टि के आदि समय भिन्न-भिन्न गुणों का आश्रय लेकर, अपनी तीन मूर्तियों को प्रकट किया। पहले भगवान ने अपने दाहिने अंग से जगत की सृष्टि के लिए प्रजापति ब्रह्माजी को प्रकट किया, फिर अपने मध्य अंग से जगत का संहार करने वाले रुद्र नामधारी शिव को उत्पन्न किया। साथ ही इस जगत का पालन करने के लिए उन्होंने अपने बाएं अंग से अविनाशी भगवान विष्णु को अभिव्यक्त किया। जरा-मृत्यु से रहित उन आदिदेव परमात्मा को कुछ लोग शिव नाम से पुकारते हैं। कोई सदा सत्य रूप विष्णु कहते हैं और कुछ लोग उन्हें ब्रह्मा बताते हैं। भगवान विष्णु की जो पराशक्ति है, वही जगत रूपी कार्य का संपादन करने वाली है। भाव और अभाव दोनों उसी के स्वरूप हैं। सब रूपों में एकमात्र भगवान महा विष्णु ही हैं, ऐसी भावना बुद्धि में होनी चाहिए।" सनकादिक भाइयों में से सनक ऋषि ने बहुत विस्तार से भगवान विष्णु के स्वरूप, उनकी भक्ति और आराधना का व्याख्यान किया है, जो कि नारद पुराण में उल्लेखित है। इससे नारदजी पर वैष्णवी भक्ति का बहुत अधिक प्रभाव पड़ा और उन्होंने नारद भक्तिसूत्र का प्रणयन किया।
वैष्णव भक्ति में अवतार संज्ञा का अत्यधिक महत्त्व है। सभी वैष्णव पुराणों में और गीता में भी, इस बात पर बल दिया गया है कि जब-जब सृष्टि पर अनाचार फैलता है तब सर्वशक्तिमान भगवान विष्णु अवतार ग्रहण कर धर्म की हानि को मिटाने का कार्य करते हैं। अर्थात संसार का उद्धार करते हैं। सभी अठारह पुराणों में विष्णु अवतारों की कथाएं वर्णित हैं। पुराणों में भगवान विष्णु की महत्ता और उनके विराट स्वरूप को उद्घाटित किया गया है। गीता में भी विराट स्वरूप दिखलाया गया है। पुराणों में भगवान के अवतारवाद का संपूर्ण विकास देखा जा सकता है। इस सृष्टि पर जब-जब भी धर्म की हानि होती है, दुराचार बढ़ता है, तब कुमार्गी आसुरी शक्तियों के विनाश हेतु भगवान विष्णु ही अवतार ग्रहण कर इस जगत को त्राण दिलाने का कार्य करते हैं। चाहे 'विष्णु पुराण' हो या 'ब्रह्मांड पुराण' अथवा 'भागवत महापुराण', इन सभी में अवतारों का भिन्न-भिन्न स्थल पर उल्लेख हुआ है। वैष्णव धर्म का प्रथम निर्देश वेदों से प्राप्त होता है, वैदिक युग के बाद पुराण युग में विष्णु को परमात्मा रूप में स्वीकारा जाता है और उन्हें इस संसार का नियंता माना जाता है। पर यह वैष्णव धर्म कालांतर में अनेक सोपानों को पार करता हुआ, आधुनिक युग तक पहुंच चुका है।
वैष्णव धर्म के प्रचार से भक्ति और अहिंसा जैसे तत्त्वों को बहुत बल प्राप्त हुआ। वैष्णव धर्म के वैशिष्ट्य में ईश्वरीय प्रेम की अभिव्यक्ति ही भक्ति के रूप में फलित हुई और जीवदया की भावना ही अहिंसा का आधार बनी। वैष्णव धर्म ने अध्यात्म, कला, संस्कृति को भी पर्याप्त प्रश्रय प्रदान किया। वैष्णव धर्म में भक्ति की अथाह प्रतिष्ठा के संबंध में डॉ. विजेन्द्र स्नातक का कथन है कि "वैष्णव धर्म के आचार्यों तथा रसिक कवियों ने 'भक्ति रस' की स्थापना में सर्वाधिक योग दिया है। यदि वैष्णव भक्ति का उदय न हुआ होता तो भक्ति को 'रस' के रूप में स्वीकृति मिलना असंभव था।" वैष्णव धर्म की मान्यता से अनुप्राणित श्रेष्ठ कवियों ने भारतीय वांग्मय को एक श्रेष्ठ धरोहर प्रदान की। ईसा से पांच सौ वर्ष पूर्व से लेकर ईसा की पांचवीं शताब्दी यानी लगभग एक हजार वर्षों के कालखंड में पौराणिक साहित्य तथा रामायण, महाभारत ने वैष्णवता को प्रसरित होने में अपना योगदान प्रदान किया, किंतु उससे आगे बौद्धकाल में वैष्णव धर्म की प्रगति को ठेस पहुंची, वैसे भी बौद्ध धर्म ने वैष्णव मान्यताओं की कुछ बातों को अंगीकार कर रखा था, पर धीरे-धीरे यह धर्म कतिपय महायान, व्रजयान जैसी परंपराओं को प्राप्त कर कमजोर होता गया।
परमात्मा को तत्त्व से जानने के लिए बौद्धों ने जिस दर्शन को विकसित किया था, उस शून्यवाद से आगे बढ़कर नवीं शताब्दी में शंकर ने उपनिषदों के अद्वैत तत्त्व दर्शन का भली प्रकार प्रवर्तन किया। अद्वैतवादी, एकत्ववाद और द्वैतवाद से भिन्न परम सत्ता को किसी संज्ञा या रूप में न बांधकर अगम, अगोचर, अचिंत्य, अनिर्वचनीय समझते हैं।
शंकराचार्य के काल में ही दक्षिण भारत में भागवत धर्म को आगे बढ़ाने वाली एक नई परंपरा का उदय हो रहा था। नवम् शताब्दी में दक्षिण भारत में वैष्णव उपासक आलवारों की भक्ति शीर्ष पर थी। छठी-सातवीं सदी से प्रारंभ यह भक्ति आंदोलन, हिंदी के चौदहवीं-पंद्रहवीं शताब्दी के भक्तिकाल से आठ-नौ सौ वर्ष पूर्व अस्तित्व में आ चुका था। वे विष्णु के अवतारों राम तथा कृष्ण का अपने गीतों के माध्यम से रससिक्त गुणगान कर रहे थे। नवीं दसवीं शताब्दी में तो इस भक्ति आंदोलन को आचार्यों का संग-साथ मिलना प्रारंभ हो गया। आचार्यों में सर्वप्रथम नाथ मुनि हुए। नाथ मुनि का मूल नाम तो रंगनाथ था, पर वे प्रसिद्ध इस नाम से ही हुए। नाथ मुनि का काल सन 824 से 924 तक माना जाता है। उन्होंने तमिल वेद का उद्धार किया।
'भक्ति द्राविड़ ऊपजी, लाए रामानंद' भक्ति के क्षेत्र में यह उक्ति बहुत प्रसिद्ध रही है। यानी भक्ति का प्रादुर्भाव द्रविड़ क्षेत्र में हुआ। वैष्णव भक्ति के संबंध में कुछ भी कहने से पूर्व हमें द्रविड़ देश में उत्पन्न और प्रवाहित भक्ति के संक्षिप्त इतिहास को जानना होगा। जिस द्रविड़ देश को इंगित किया गया है- वह हमारे आज के भारत का 'तमिलनाडु' प्रांत है। यहां ईसा की चौथी शताब्दी से नौवीं दसवीं शताब्दी के मध्य आलवार वैष्णव भक्त हुए। इन आलवारों ने वैष्णव भक्ति को खूब प्रचारित किया। आलावार भक्तों ने जिन भक्ति पदों की रचना की वे तमिल साहित्य में अत्यधिक प्रसिद्ध हैं तथा इन पदों के संग्रह का नाम 'नालायिर दिव्य प्रबंधम्' है। इस 'प्रबंधम्' में लगभग पांच शताब्दी के आलवार भक्तों के गेय पदों का संग्रह है।
'आलवार' का अर्थ होता है- 'वैष्णव', यानी भगवप्रेम में डूबे रहने वाले भक्त। आलवारों की भक्ति रचनाएं तमिल साहित्य की सर्वोत्कृष्ट रचनाएं हैं। "वस्तुतः ये आलावार भक्त भावुक, कोमल, रससिक्त एवं भक्ति भावना से आप्लावित रहने वाले कविगण थे। वैष्णव भक्त आलवारों के गीतों में भगवान विष्णु के विभिन्न अवतारों की चर्चा है। फिर भी विष्णु के दो प्रमुख अवतारों- रामावतार एवं कृष्णावतार ने उन्हें विशेष रूप से आकर्षित किया। इन दोनों अवतारों में भी कृष्णावतार में उनका मन जितना रमा उतना रामावतार में नहीं। श्रीकृष्ण की विभिन्न लीलाओं का उन्होंने ऐसा सजीव वर्णन प्रस्तुत किया, मानो उन्होंने उन लीलाओं का प्रत्यक्ष अवलोकन किया है।"9
वैष्णव भक्ति में आलवारों के योगदान को शीर्षस्थ स्थान पर रखा गया है।
"आलवार संतों ने 'नाम संकीर्तन-भक्तिधारा' से दक्षिण को रससिक्त कर भक्ति की मधुर हिलोर उत्तर की ओर बहायी।' इनके भक्ति पद सरस भक्तिभावों से अनुप्राणित हैं, सामान्यजन को सहज ही भक्ति की ओर आकृष्ट करने वाले हैं।
आलवार भक्तों के संबंध में कुछ बातें और जान लेनी चाहिए। आलवार भक्तों की दो शताब्दियों यानी चौथी से छठी शताब्दी के प्रारंभ तक भारत में गुप्तवंश का राज्य था। इस काल में भागवद् धर्म का अत्यधिक प्रसार हुआ। 'प्रबंधम्' का संकलन आलवार भक्त 'नाथ मुनि' ने किया। आलवारों ने भक्ति में 'प्रपत्ति' को अधिक महत्त्व दिया। आलवार काव्य, प्रबंध और स्फुट दोनों रूपों में मिलता है। उनकी ये रचनाएं सामान्य जन में भक्तिभावों का उद्रेक करने वाली हैं। ये सभी रचनाएं सामान्य जन के अत्यधिक निकट हैं, क्योंकि इनमें लोकगीतों की गेयता मौजूद है।
वैष्णव भक्त-दक्षिण देश से भक्ति का प्रसार करने वाले इन आलवारों के ऋणी हैं, क्योंकि इन्होंने भगवद् प्रपत्ति की एक व्यवस्थित सरणि प्रस्तुत की, जिस पर आगे चलकर वैष्णव भक्ति का बड़ा प्रसाद खड़ा हुआ। डॉ. आर. एम. श्रीनिवासन के कथनानुसार, "आलवार भक्तों की रचनाओं में कहीं भी पुनरूक्ति नहीं दिखाई पड़ती। आलवार साहित्य भक्तिपूर्ण अनुभवों, भावनाओं, कल्पनाओं तथा विचारों का साहित्य है। आलवारों के साहित्य की प्राकृतिक सुषमा का वैविध्य अन्यत्र दुर्लभ है। आलवार भक्तों के साहित्य में दक्षिण भारत के संगीत को उसके पूर्ण वैभव के साथ इस प्रकार अभिव्यक्त किया गया है कि हमारा हृदय श्रद्धाभाव से उमड़ पड़ता है।" आलवार संतों की संख्या यूं तो सौ से अधिक है, किंतु उनमें बारह अधिक प्रसिद्ध हुए। दक्षिण भारत के इन आलवार वैष्णव संतों ने अपने जीवन को भगवद्द्मय बनाकर सामान्य जन को भक्ति करने तथा भक्ति को जानने का सुगम पथ तैयार किया। आलवारों के बाद भी यह भक्तिपथ अनवरत चलता रहा है। आलवारों ने भगवद् भाव में प्रपत्ति और भगवद् अनुग्रह पर विशेष बल प्रदान किया। इसे बाद के संतों ने भी अपनाया।
आलवार भक्तों ने भक्ति के साधन पक्ष पर अधिक बल दिया। इसलिए उनकी रचनाओं में दास्य, वात्सल्य और माधये भाव की अधिक प्रधानता है। लगभग छह शताब्दी के भक्तिमार्ग ने आगे वैष्णव भक्ति का सुदृढ़ मार्ग प्रशस्त किया।
दक्षिण भारत में दूसरे वैष्णव आचार्य यामुनाचार्य हुए। वैष्णव पंथ के सुदृढ़ीकरण में इनका बड़ा योगदान रहा। यामुनाचार्य ने ही वैष्णवाचार्य रामानुजाचार्य से ब्रह्मसूत्र पर टीका लिखवाने का महती कार्य किया। रामानुजाचार्य ने वैष्णव भक्ति को मजबूत आधार प्रदान करने का स्तुत्य कार्य किया। उनके द्वारा प्रणीत विशिष्टाद्वैत दर्शन को प्रसिद्धि तथा प्रशंसा दोनों मिलीं।
रामानुजाचार्य का जन्म दक्षिण के पैरम्बदुर नामक स्थान में वि. सं. 1074 को हुआ। धर्म एवं आध्यात्मिक दर्शन, दोनों ही क्षेत्र में आपने सुधार के कार्य किए। ये श्रुति प्रमाणवादी होने से श्रोत्रिय कहलाए। रामानुजाचार्य के धर्म तथा अध्यात्म के सुकृत्य गृहस्थी तथा वैरागी दोनों के लिए उपादेय थे। साधुओं के लिए इन्होंने वैरागी संप्रदाय की स्थापना की, वहीं सामान्यजन को वैष्णव भक्ति की ओर उन्मुख किया।
वैरागी संप्रदाय के साधुओं के लिए उन्होंने कतिपय आचार तय किए, जिनका परिपालन परमावश्यक था। साधुओं के लिए गेरुआ परिधान, यज्ञोपवीत, मस्तिष्क पर ऊर्ध्वपुंडू तिलक और हाथ में तुलसी की माला आवश्यक थी।
उन्होंने जो विशिष्टाद्वैत नामक दर्शन का प्रणयन किया उसके अनुसार परमात्मा चिद्, अचिद् और विशिष्ट रूप में हैं। वे ब्रह्म-सत् चित्त् आनंद स्वरूप हैं। ब्रह्म सर्वज्ञ हैं तथा अपने आप में पूर्ण हैं। उसी पूर्ण ब्रह्म ने करुणावशात् इस जगत की रचना की और त्रिगुणात्मक जगत के संचालनार्थ नियमों का विधान किया। रामानुजाचार्य ने चिद् का अर्थ भोक्ता जीव किया और अचिद्- भोग्य जगत है तथा परमात्मा विशिष्ट हैं। ईश्वर, प्रकृति और कर्म के अधीन नहीं है। वह प्राण शरीर भी नहीं है तथा उसे सुख-दुख की अनुभूति भी नहीं होती। उस ब्रह्म का कोई रूप-आकार भी नहीं है तथा वह चिद् और अचिद् के व्यथा-विकार से प्रभावित भी नहीं होता। ब्रह्म जगत का कर्ता, पालक और संहारकर्ता है।
रामानुजाचार्य के अनुसार वह परमात्मा 'विष्णु' नाम से पुकारा जा सकता है। शिव और ब्रह्मा भी उसी के अंतर्भुक्त हैं। ईश्वर, लीला के निमित्त संसार का सृजन करता है।
रामानुजाचार्य ने वैष्णव मतावलंबियों के लिए तीन आवश्यक सूत्र दिए-
(1) सदाचरण प्रियता
(2) प्रपत्ति
(3) विधिपूर्वक नित्य उपासना।
परवर्ती सभी संत संप्रदायों ने प्रपत्ति अर्थात भक्ति और सदाचरण को प्रमुखता प्रदान की। हां, नित्य उपासना को लेकर विभिन्न मतभेद अवश्य रहे।
रामानुजाचार्य ने माना कि ईश्वर और जीव दो भिन्न सत्ताएं हैं। फिर भी उनमें परस्पर शरीर-आत्मा अर्थात् विशेष्य-विशेषण संबंध है। ईश्वर का निवास सब की आत्मा में है। वह ब्रह्म विशेषणों से युक्त है। ब्रह्म की इस विशिष्टता के कारण ही इस मत का नाम विशिष्टाद्वैत पड़ा।
रामानुजाचार्य का कथन है ब्रह्म पांच रूपों में प्रकट होता है- (1) अर्चा रूप में - अर्थात मूर्ति रूप में। (2) विभव रूप में अर्थात मत्स्यादि अवतार रूप में। (3) व्यूह रूप में- अर्थात केशवादि, वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युमन, अनिरुद्ध आदि रूप में। (4) अंतर्यामी रूप में- अर्थात अंतःकरण का प्रेरक रूप। (5) पर रूप में - अर्थात नारायण रूप में। नारायण वैकुंठ निवासी हैं और वे शेष शय्या पर शयन करते हैं-लक्ष्मीजी ब्रह्म की क्रिया शक्ति हैं।
ब्रह्म छह प्रकार के ऐश्वर्यों से युक्त हैं-
(1) ज्ञान
(2) बल
(3) ऐश्वर्य
(4) वीर्य
(5) शक्ति
(6) और तेज।
ब्रह्म मुख्यावतार और गौण अवतार, दो प्रकार से अवतरित होते हैं। मुख्यावतार में विष्णु ही अवतार ग्रहण करते हैं।
रामानुज संप्रदाय के उपास्य श्री लक्ष्मीनारायण हैं। रामनुजाचार्य ने विशिष्टाद्वैत दर्शन के अंतर्गत ब्रह्म, जीव, आत्मा, प्रकृति, काल, सृष्टि, साधन, मोक्ष आदि तात्त्विक
विषयों पर विवेचन प्रस्तुत किया है।
जीव : जीव के संबंध में रामानुजाचार्य कहते हैं कि वह सत् स्वरूप, अचिंत्य, नित्य, ज्ञानाश्रय, निरवयव, निर्विकार, अव्यक्त और अणु है। यह शरीर, इंद्रिय, मन, प्राण एवं बुद्धि से विलक्षण है परंतु कर्मों को लेकर कर्ता, भोक्ता और ज्ञाता है। यह मानव शरीर प्राप्त कर पांच प्राण, पांच इंद्रियों, पांच कर्मेंद्रियों से तथा मन, बुद्धि और
चित्त से संबद्ध है। जीव की तीन कोटियां हैं- बद्ध, मुक्त और नित्य।
इस जीव का प्रकृति से गहन नाता होने के कारण मुक्ति प्राप्त होने से पहले तक यह प्रकृति से बंधा हुआ रहता है। शरीर बंधन के कारण परमात्मा से संबंध नहीं जुड़ता। प्रारब्धवश जीव पुनः पुनः विभिन्न कोटि के जीवों के रूप में जन्म धारण करता है और मृत्यु को प्राप्त होता रहता है। जीव के जन्मने-मरने और पुनः जन्म लेने के उपरांत भी आत्मा अपरिवर्तित रहती है। जीव के पूर्वकृत कर्मों का नाश किसी भी अवस्था में नहीं होता। सृष्टि विनाश के बाद सर्ग के प्रारंभ में पुनः उसके शेष प्रारब्ध क्रियाशील हो जाते हैं। जीव वर्तमान को ही जान सकता है।
रामानुजाचार्य स्वामी ने अपने विशिष्ट द्वैत दर्शन के अंतर्गत जीव को नित्य, मुक्त और बद्ध नामक तीन श्रेणियों में बांटा है। यह भेद ईश्वर कृत नहीं है। कर्माधारित है। नित्य जीव वैकुंठ वास करते हैं, मुक्त जीव अपने विवेक से मुक्ति का वरण कर लेते हैं, जबकि तृतीय कोटि के बद्ध जीव बार-बार अज्ञानतावश कर्मों में फंसकर इस संसार की ओर मुख करता है।
बहुत विस्तृत ढंग से रामानुज, प्रकृति-अचित् सृष्टिक्रम, काल, साधन मार्ग तथा मोक्ष जैसे विषयों पर अपने विचार प्रकट करते हैं।
रामानुज ने लोकहितार्थ अनेक दिव्य ग्रंथों की रचना की। अपने मत विशिष्टाद्वैत की पुष्टि के निमित्त अपने 'श्रीभाष्यम्' में महर्षि व्यासजी द्वारा रचित ब्रह्मसूत्र की व्याख्या की है। व्यासजी के विचारों को युक्तियुक्त ढंग से विवेचित करने के कारण ही इसकी अत्यधिक प्रसिद्धि हुई। 'वेदांत दीपम्' ग्रंथ श्रीभाष्य का संक्षिप्त रूप है। श्रीमद्भगवद्गीता पर आपने गीता भाष्यम् की रचना की। उनका यह भाष्य इस बात पर अधिक बल प्रदान करता है कि ईश्वर के संबंध में जानने से पहले उनके प्रति अगाध श्रद्धा और विश्वास मन में रहना चाहिए।
वैष्णव भक्तों के नैमितिक अनुष्ठान के लिए आपने 'नित्य ग्रंथम्' की भी रचना की। इसे हम भगवद् आराधना ग्रंथ भी कह सकते हैं। "उनका उपदेश है कि 'श्री वैष्णव' को प्रतिदिन, वेदों, स्मृतियों और पुराणों में निर्धारित धार्मिक कार्यों को नियमित रूप से करना चाहिए।'"'"' रामानुजाचार्य ने अनेक ग्रंथों की रचना की। वे श्री शंकराचार्य के अद्वैत सिद्धांत का खंडन विशिष्टाद्वैत के माध्यम से करते हैं। वैष्णव जन के लिए करणीय एवं मननीय बहत्तर सूत्र प्रदान किए। रामानुजाचार्य इस धरा धाम पर 120 वर्षों तक रहे। वे संवत 1194 को महाप्रस्थान कर गए।
रामानुज मत के अनुसार परमात्मा का स्वरूप निर्गुण निराकार की बजाय सदा और सर्वत्र साकार है। एक हजार वर्ष पूर्व रामानुज क्रांतिकारी संत हुए। वैष्णव धर्म को उन्होंने तात्त्विक उच्चता प्रदान की। श्रीरंगम जैसे वैष्णव मठ की स्थापना की। 104 दिव्य मंदिरों में सुधरी हुई आराधना पद्धति लागू की। वह एकरूपता आज भी देखने को प्राप्त होती है।
मध्यकाल में प्रवर्तित चार प्रमुख वैष्णव संप्रदायों को चतुर्संप्रदाय नाम दिया गया है। रामनुजाचार्य ने 'श्री संप्रदाय' को प्रचलित किया। उसी प्रकार ईस्वी सन 1162 के लगभग निम्बार्काचार्य द्वारा प्रवर्तित 'सनकादिक संप्रदाय', सन 1197 के पश्चात मध्वाचार्य द्वारा प्रवर्तित 'ब्रह्म संप्रदाय' अस्तित्व में आया जिसे द्वैतवादी संप्रदाय के रूप में मान्यता प्राप्त हुई। इसके बाद वल्लभाचार्य का 'शुद्धाद्वैतवादी संप्रदाय' भी इस चतुर्संप्रदाय का एक अंग है।
निम्बार्क संप्रदाय : निम्बार्काचार्य के वैष्णववादी दर्शन को 'द्वैताद्वैतवाद' नाम
दिया गया। इसे ही भेदाभेदवाद भी कहा गया। निम्बार्काचार्य भी दक्षिण भारत के आंध्रप्रदेश में हुए। बाद में वे भगवान श्रीकृष्ण एवं राधा की उपासना के निमित्त व्रज में आ गए। निम्बार्क, रामानुजाचार्य से ही प्रभावित थे। निम्बार्कीय आराधना में कृष्ण एवं राधा की आराधना पर विशेष बल दिया गया है।
द्वैताद्वैत मत के अनुसार द्वैत भी सत्य है और अद्वैत भी सत्य है। इसे सनकादि संप्रदाय इसलिए कहा जाता है, क्योंकि सनकादिक चारों ऋषिगण भी इसी मत को मानते थे। इस मत के आचार्यों ने दूसरे मतों का खंडन नहीं किया है। निम्बार्क संप्रदाय की प्राचीन गद्दी मथुरा में है, वहीं राजस्थान के सलेमाबाद में बड़ी निम्बार्क पीठ है। युगल उपासना वाले सभी संप्रदायों का राधा-कृष्ण की भावना रखने वाले सभी संप्रदायों में आसानी से समन्वय हो जाता है। निम्बार्काचार्य ने 'वेदांत पारिजात सौरभ' नाम से वेदांत सूत्र पर एक लघु भाष्य भी रचा।
इस संप्रदाय के दर्शन को द्वैताद्वैत अथवा भेदाभेद इसलिए कहा जाता है, क्योंकि यह दर्शन इस बात को स्वीकारता है कि अवस्था भेद से जीव, ब्रह्म के साथ भिन्न भी है तथा अभिन्न भी है। जीव ब्रह्म का अंश है, वह अल्प है। भक्ति से परम पद की प्राप्ति अर्थात मोक्ष को प्राप्त कर सकता है। ब्रज क्षेत्र में इस संप्रदाय की विपुल प्रसिद्धि हुई।
ब्रह्म संप्रदाय : मध्वाचार्य ने ब्रह्म संप्रदाय की स्थापना की। इस संप्रदाय का नाम ब्रह्म संप्रदाय इसलिए पड़ा, क्योंकि इसके मूल प्रवर्तक ब्रह्म ही माने जाते हैं। मध्वाचार्य भी दक्षिण ही में रामानुजाचार्य की मृत्यु के सौ वर्ष के अनंतर हुए। मध्वाचार्य मानते थे कि ईश्वर और जीव में भेद का होना स्वाभाविक है। उनका मानना था कि जीव और ब्रह्म में भेद है, इसी प्रकार जीव और प्रकृति में भेद है तथा जगत और जीव में भी भेद है। और तो और, जीव और जीव में भी भेद की स्थिति है।
"माध्व मत में परमात्मा के गुण असीम, नित्य एवं अपरिमित हैं। सृष्टि, स्थिति, संहार, नियमन, आवरण, बोधन (ज्ञान), बंधन और मोक्ष आदि आठ कारणों में परमात्मा के अतिरिक्त अन्य किसी चेतन का अधिकार नहीं है... परमात्मा में अनेक रूप धारण करने की शक्ति है। लक्ष्मी परमात्मा से भिन्न तथा उसी के अधीन है। वे नित्य तथा सर्वगुण पूर्ण हैं। परमात्मा के इंगित पर सृष्टि आदि कार्यों को करती है। श्री, भू, सीता, रुक्मिणी उन्हीं के रूप हैं।" 12 आपका मत रहा है कि परमात्मा के अनुग्रह से मोक्ष संभव है, तब उनका प्रेम और कृपा क्यों न प्राप्त की जाए। मध्वाचार्य का द्वैतवादी सिद्धांत श्रीमद् भागवत महापुराण पर आधृत है। अवश्य इनका धार्मिक सिद्धांत रामनुजाचार्य से मिलता हुआ सा है, पर दर्शन में अंतर है। वे निस्संकोच ईश्वर और जीव में अंतर करते हुए अपना द्वैतवादी मत रखते हैं। इस प्रकार वे वेदांत की कुछ मान्यताओं से विलग खड़े हो जाते हैं। वे भगवान श्रीकृष्ण की अनन्य भक्ति करने का मंतव्य रखते हैं। यह संप्रदाय विष्णु के सभी अवतारों का आदर करता है। आगे चलकर चैतन्य महाप्रभु भी इसी संप्रदाय में दीक्षित हुए।
वल्लभ संप्रदाय : वैष्णव मत वल्लभ संप्रदाय के प्रवर्तक वल्लभाचार्य सन 1479-1531 के मध्य हुए। आपका जन्म काशी के एक तैलंग ब्राह्मण के घर हुआ। वल्लभाचार्य भ्रमणशील रहते थे। विद्वानों के मध्य चर्चा किया करते थे। विष्णु स्वामी संप्रदाय से भी आपका जुड़ाव रहा। उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं से प्रभावित होकर अपने मत का प्रसार प्रारंभ किया। इनका दार्शनिक संप्रदाय शुद्धाद्वैत के नाम से प्रसिद्ध हुआ। वे भक्तिमार्गी थे। भक्ति को आपने ज्ञान से श्रेष्ठ ठहराया। उन्होंने कहा-सच्चा भक्त मुक्त नहीं होना चाहता, वह तो ठाकुरजी की लीला का अंग बनना चाहता है। ईश्वर की कृपा को उन्होंने 'पुष्टि' शब्द प्रदान किया। इस कारण इस संप्रदाय का एक नाम पुष्टि मार्ग भी पड़ गया। भगवद् अनुग्रह ही पोषण यानी पुष्टि है। उन्होंने इस सिद्धांत को उपनिषदों से लिया। भगवकृपा से जो भक्ति प्राप्त होती है, वह पुष्टि भक्ति कहलाती है। भगवदानुग्रह प्राप्त करने को उद्यत भक्त परमात्मा की प्राप्ति के अलावा अन्य कोई कामना नहीं करता। भक्त आत्मसमर्पण के साथ भक्ति करता है।
इस संप्रदाय के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण परब्रह्म परमात्म के रूप में सच्चिदानंद स्वरूप हैं। समस्त जीव जगत उन्हीं से उद्भूत है। ब्रह्म माया से अलिप्त है, इसलिए वह शुद्ध है। इस शुद्ध ब्रह्म के विचार को आप ने शुद्धाद्वैत नाम दिया।
"शुद्धाद्वैत दर्शन के अनुसार भगवान को जब रमण करने की इच्छा होती है, तब वे अपने आनंद आदि गुणों के अंशों को तिरोहित कर स्वयं जीव रूप ग्रहण करते हैं। इस व्यापार में केवल भगवान की इच्छा ही कारण है, माया का इससे किसी प्रकार का संबंध नहीं है।" 13 वल्लभाचार्य ने अपने पुष्टि मत में दो प्रकार की भक्ति का विधान किया। एक मर्यादा भक्ति और दूसरी पुष्टि भक्ति। केवल भगवान के अनुग्रह पर टिकी हुई भक्ति पुष्टि भक्ति तथा साधन-सापेक्ष भक्ति को मर्यादा भक्ति नाम दिया, पर उसे निम्न कोटि भक्ति बताया। पुष्टिमार्गी मंदिरों में अष्टयाम यानी आठ बार सेवा-पूजा होती है। श्रीकृष्णः सखा मम्' यह इस मार्ग का मंत्र है। वल्लभाचार्य के सुपुत्र विठ्ठलनाथ ने इस पंथ को आगे बढ़ाया, वे अपने पिता की भांति ही विद्वान तथा तेजस्वी थे। ब्रज क्षेत्र में इनका तत्कालीन समय में प्रभुत्व रहा तथा वैष्णव धर्म की प्रगति में आपका योगदान रहा। पुष्टि मार्ग में दीक्षित अष्टछाप के भक्तकवि भी प्रसिद्ध रहे हैं।
वैष्णव धर्म के इस विकासक्रम में हम पाते हैं कि भगवान श्री विष्णु के विभिन्न प्राकट्य रूपों को ही उपास्य रूप में स्वीकार करते हुए भगवान के नाम, गुण, रूप, लीलाओं का चित्रण किया गया। भगवान की भक्ति को बाद में भले ही सगुण निर्गुण रूपों में विभक्त देखा गया हो, पर इससे वैष्णवी आधार कहीं लुप्त नहीं हुआ।
वैष्णव मत में इस बात पर बल दिया गया है कि जीव का अणु भाव प्राकृतिक है और सदा ही वह परमात्मा से परिछिन्न है। इसलिए जीव को यहां 'अंशी' रूप में परिभाषित किया गया है। अंशी रूप में यह परमात्मा के अधीन है। भागवत संप्रदाय नामक ग्रंथ में वैष्णव दर्शन की विशिष्टता समझाते हुए कहा गया है कि, "भागवत मत का यही मौलिक सिद्धांत है कि भगवान स्वामी, विभु तथा अंशी हैं तथा जीव सदा ही दास, अणु तथा अंश है। जीव का अणुत्व किसी भी दशा में निवृत्त नहीं होता है। संसारी दशा में तो वह अशुद्ध मन, प्राण, देह आदि के बंधनों से बद्ध रहता ही है, मुक्त दशा में वह इन बंधनों से मुक्त अवश्य हो जाता है, तथापि उसके अणुत्व की निवृत्ति उस समय में भी नहीं होती।" 14 यानी जीव को भगवान के अधीन रहना ही पड़ता है, यही उसका दायित्व है।
वैष्णव मतों में साम्य और वैषम्य दोनों ही रहे हैं, परंतु एक वैष्णव की श्रद्धा में कोई वैषम्य नहीं होता। वैष्णव मत यह दृढ़ विश्वास प्रदान करता है कि भगवद्माप्ति का मूलाधार भक्ति ही है।
रामानंदाचार्य और उनके शिष्य
धनावंश की स्थापना में मूल आग्रह रामानंद भगवान का ही रहा। उन्होंने अपने शिष्य धनाजी को भी संप्रदाय स्थापना के महत्त्व से अवगत कराया। ऐसे रामानंदजी के संबंध में अगस्त्य संहिता का कथन है. "रामानन्दः स्वयं रामः प्रादर्भतो महीतले।" इस उदघोष का यही अर्थ है कि रामानंद इस आतप्त भारत भू के लिए भगवद् सम ही साबित हुए।
उत्तर भारत में वैष्णव भक्ति का अभूतपूर्व प्रसार करने वाले रामानंदाचार्य का जन्म प्रयाग के कुलीन ब्राह्मण परिवार में हुआ। रामानंदजी के पिता पुण्य सदन कान्य कुब्ज ब्राह्मण थे। मां का नाम सुशीला देवी था। श्री संप्रदाय की वैष्णवी दीक्षा में जातीय आधार बहुत बड़ा महत्त्व रखता था। ब्राह्मणों में कान्य कुब्ज श्रेष्ठ जाति मानी जाती थी।
रामानंदजी की जन्मतिथि को लेकर मत भिन्नता रही है। विभिन्न विद्वानों द्वारा प्रस्तुत जन्म वर्ष में लगभग सौ वर्ष से अधिक का अंतर रहा है। हिंदी साहित्य के इतिहास लेखक रामचन्द्र शुक्ल इनका जन्म पंद्रहवीं सदी के द्वितीय चरण में, अंग्रेज विद्वान फर्कहर सन 1400 से 1470 के मध्य तथा कुछ विद्वान सन् 1299 को इनका जन्म मानते हैं। आचार्य किशोर कुणाल, रामानंद के जन्म का निर्धारण उनके शिष्यवर्ग की समकालीनता से करते हुए 1356 को तथा निधन सन 1470 ई. को स्वीकारने का कहते हैं।
डॉ. आर.एस. प्रजापति 15 स्वामीजी की जन्मतिथि निर्धारित करने के लिए भविष्य पुराण में सिकंदर लोदी के उल्लेख को आधार बनाते हैं। सिकंदर लोदी सन 1489 में दिल्ली का शासक बना था। इसलिए इस समय तक रामानंदजी जीवित थे। इसके अनुसार संवत 1545-46 तक रामानंदजी जीवित थे। न केवल रामानंदजी बल्कि भक्तिकाल के अनेक संतों की जन्मतिथियां विवादास्पद रही हैं। रामानंदजी के बारह शिष्यों की जन्मतिथियों को देखते हुए उनका समय निश्चित ही संवत 1545 तक रहा होगा। रामानंदजी के जन्म के संबंध में प्राचीन ग्रंथ के रूप में 'अगस्त्य संहिता' के 'भविष्योत्तर खंड' को प्रमाण मानकर उसमें उल्लेखित तिथि माघ कृष्णा सप्तमी वि. संवत 1356 को सही ठहराया गया, किंतु कबीर एवं उनके काल के साहित्य का गहन अनुसंधान करने वाले डॉ. पुरुषोत्तम अग्रवाल अगस्त्य संहिता में भविष्योत्तर खंड को एक क्षेपक मानते हैं। वे कहते हैं, "भविष्योत्तर खंड को बिना विचारे प्रामाणिक मान लेने वाले काश वास्तविक अगस्त्य संहिता देखते। तब यह रोचक तथ्य उनकी निगाह में आता कि 1145 और 1260 (बहत करके 1200 के पहले ही) के बीच रचित ग्रंथ के आधार पर रामानंद का जन्म सन 1299 बताया जा रहा है, और तब वे हमें बता पाते हैं कि अगस्त्य संहिता रचने वाले ऋषि कितने सक्षम भविष्यद्रष्टा कहिए कि भारत के नॉस्ट्रडेमस थे। यह तथ्य उन्हें मालूम पड़ता कि अगस्त्य संहिता में रामानंद या उनके किसी शिष्य का नामोल्लेख तक नहीं है। होता कैसे ? इतनी प्रगतिशील इतिहास दृष्टि 'अगस्त्य संहिता' के रचयिता के पास थी ही नहीं कि दो सौ साल बाद होने वाले रामानंद और उनके शिष्यों का विवरण लिख सकें।
अगस्त्य संहिता, मुनि अगस्त्य ओर सुतीक्ष्ण के संवादों का ग्रंथ है, जिसमें रामोपासना के रूप में वैष्णव धर्म परंपरा का उल्लेख है। रामानंदजी की जन्मतिथि और उनकी जीवनावधि के संबंध में अधिकतर जो दो स्रोत बने वे 'भविष्योत्तर खंड' और रूपकलाजी द्वारा 'भक्तिसुधा स्वाद तिलक' नाम से की गई भक्तमाल की टीका थी। सभी स्रोतों में रामनंदजी के शिष्य वर्ग के समय को अवहेलित किया गया। अनेक भक्तों की परचियां रचने वाले अनंतदास रामानंद की पांचवीं पीढी में थे। अनंतदास ने धनाजी पर भी परची की रचना की थी। अनंतदास और उनकी परचियों पर अनुसंधानात्मक कार्य करने वाले डेविड एन. लोरेंजन ने लिखा है, "असल में रामानंद के समय को जानने का उचित तरीका यह है कि हम कबीर, अनंतदास और नाभादास की सुपरिचित तिथियों से पीछे गिनना शुरू करें। यदि हम अनंतदास के समय को 1600 मानें (नामदेव परचई के रचनाकाल 1588 ई. के आधार पर) तो रामानंद का समय 1475 ई. के आस-पास ठहरता है। इसी तरह यदि नाभादास के समय को 1600 ई. मानते हैं तब रामानंद का समय पीछे खिसककर 1450 ई. के करीब आ जाएगा।" डेविड लोरेंजन की यह खोज धनाजी की जन्मतिथि संवत 1472 को सही साबित करती है तथा रामानंदजी से प्रेरित होकर संवत 1532 में उनके द्वारा धनावंश संप्रदाय की स्थापना करना भी उचित प्रतीत होता है। नाभादासजी ने भक्तमाल में रामानंदजी के दीर्घायुष्य को भी 'बहुत काल वपु धारिकै' के माध्यम से कहा है। अगर रामानंदजी का जन्म सन् 1299 को मान लिया जाए तो उनके शिष्य कबीर, रैदास, धना तथा पीपा का काल गड़बड़ा जाएगा और ये गुरुभाई समकालीन भी नहीं ठहरेंगे। रामानंदजी की मृत्युतिथि अगर संवत 1467 मान लेंगे तो इस समय धना का तो जन्म ही नहीं हुआ था। धनाजी का जन्म संवत 1472 में हुआ था। वे अपने युवाकाल में रामानंदजी का शिष्यत्व ग्रहण करने के लिए काशी गए थे। काशी में श्री धनाजी को श्री रामानंदजी के प्रथम शिष्य अनंताचार्यजी के सान्निध्य में श्रीमठ में रखा गया।
रामानंद का काल यानी चौदहवीं पंद्रहवीं शताब्दी राजनीतिक दृष्टि से भारत में उथल-पुथल की सदी थी। अनेक मुस्लिम वंशों का केंद्रीय सत्ता पर काबिज होना और समूचे भारतवर्ष में अपनी सत्ता के प्रसार का प्रयत्न करना, गुलाम, खिलजी, तुगलक, सैयद तथा लोदी वंश का मुख्य ध्येय रहा। इनमें इस्लामिक कट्टरता भी बेहद थी। इस राजनीतिक संक्रांति काल में सामाजिक एवं धार्मिक स्थितियां भी अच्छी नहीं कही जा सकतीं। सर्वत्र अराजकता के वातावरण में सर्वाधिक हानि धर्म की हो रही थी। रामानुज संप्रदाय में दीक्षित रामानंद को उत्तर भारत के धार्मिक पतन ने भीतर से आंदोलित किया। घोर नैराश्य के इस दौर में धार्मिक अवलंब की आवश्यकता को रामानंद ने बहुत गहराई से महसूस किया। धर्म के नाम पर अंधविश्वास, रूढ़ियों में जकड़ चुके समाज को एक स्वस्थ धार्मिक वातावरण देना आवश्यक हो गया था।
उदयप्रताप सिंह के अनुसार, "संस्कृतियों की इस संक्रांति वेला में राष्ट्रीय स्तर पर ऐसी शक्ति की आवश्यकता महसूस की जा रही थी, जो धर्म के वास्तविक स्वरूप की रक्षा करते हुए बाह्याडंबरों के बंधन को शिथिल कर सके, आचारों एवं विचारों में प्रेम और समानता के आधार पर हिंदू-मुसलमान, ऊंच-नीच, स्त्री-पुरुष को एक सूत्र में निबद्ध कर सके। भक्ति मार्ग इस दिशा में उदार था, पर इस समय भक्ति के आचार्य स्वयं को जाति-पांति, उच्च-निम्न भाव से मुक्त नहीं कर सके थे। अतीत की घटनाओं से ज्ञात होता है कि आचार्य रामानंद ऐसे महात्मा थे, जिन्होंने भक्ति और भक्त के लिए वेदशास्त्र, संस्कृत भाषा, जाति-पांति, बाहरी धार्मिक आचार आदि के बंधन को अनिवार्य नहीं माना। ' 18
न केवल रामानंद संप्रदाय और वैष्णव पंथ, बल्कि धर्म-अध्यात्म से नाता रखने वाली हर जाति और समुदाय रामानंदजी का ऋणी रहेगा। चौदहवीं और पंद्रहवीं शताब्दी के उत्तर भारत को रामानंद ने राजनीतिक अस्थिरता के मध्य धर्म-अध्यात्म की शक्ति से संवलित किया। वैष्णव धर्म की ऊर्जा को अपने शिष्यों के माध्यम से संपूर्ण भारत में फैलाया। सामाजिक एवं धार्मिक जीवन में विसंगतियों की भरमार थी। ब्राह्मणीय वर्णाश्रम व्यवस्था ने धर्म पर एक जाति विशेष का आधिपत्य लाद रखा था। रामानंद ने ऐसे विकट समय में 'जात-पात बूझै नहीं कोई, हरि को भजे सो हरि का होई' का नार देकर भक्ति पर हर वर्ग का अधिकार साबित किया। भक्ति मार्ग ऐसा सुगम पथ है, जिस पर हर जाति, धर्म, वय, लिंग का व्यक्ति चल सकता है। स्त्रियों एवं शूद्रों के लिए भी यह मार्ग प्रतिबंधित नहीं है, इस पर किसी का विशेष अधिकार नहीं है।
रामानंद दीक्षित तो रामानुज संप्रदाय में हुए थे। रामानुज संप्रदाय भगवान श्री लक्ष्मीनारायण को अपना इष्ट मानता है, किंतु उक्त संप्रदाय के घनघोर ब्राह्मणीय वैष्णवाचार के कारण वह केवल कान्य कुब्ज ब्राह्मण वर्ग तक ही सीमित होने लगा था, रामानंद को उड़ने के लिए विस्तृत धर्माकाश की आवश्यकता थी, उन्होंने अपने गुरु राघवानंदजी से आज्ञा प्राप्त कर स्वतंत्र संप्रदाय के रूप में रामावत संप्रदाय की स्थापना की। वे धर्म के माध्यम से सामाजिक समरसता स्थापित करने का ध्येय रखते थे।
नाभादास भक्तमाल में रामानंद की तुलना राम से करते हैं- ' श्री रामानंद रघुनाथ ज्यों, दुतिय सेतु जग तरन कियो।' यानी रामानंद भगवान श्रीराम के ही दूसरे रूप हैं। उन्होंने जगत के उद्धार के लिए धर्म का सेतु तैयार किया। उनके सभी शिष्य भी जगत का कल्याण करने वाले थे। स्वयं रामानंद इस कलिकाल में श्रीराम से कम नहीं है। श्रीराम ने वानर सेना को पार करने के लिए समुद्र पर सेतु का निर्माण करवाया था, द्वितीय सेतु रामानंद ने संसारी जीवों को भवसागर से पार करने के लिए सुगम भक्ति पथ रूप में निर्मित किया।
भक्तमाल के अनुसार रामानंद के प्रमुख 12 शिष्य श्री अनंतानंद, श्री कबीरदास, श्री सुखानंद, श्रीसुरसुरानंद, श्री पद्मावती, श्री नरहरियानंद, श्री पीपा, श्री भावानंद, श्री रैदास, श्री धनाजी, श्री सेन तथा श्री सुरसुरानंद की पत्नी थे। भक्तमाल की टीका में स्वामीजी के परमधाम गमन के संबंध में कथन किया गया है कि "परम धाम गमन के पूर्व श्री स्वामीजी ने अपनी शिष्य मंडली को संबोधित करके कहा कि सब शास्त्रों का सार भगवत्स्मरण है, जो सच्चे संतों का जीवनाधार है। कल श्रीराम नवमी है। मैं अयोध्याजी जाऊंगा, परंतु मैं अकेला जाऊंगा। सब लोग यहीं रहकर उत्सव मनाएं। कदाचित् मैं लौट न सकूं, आप लोग मेरी त्रुटियों एवं अविनय आदि को क्षमा कीजिएगा। यह सुनकर सबके नेत्र सजल हो गए। दूसरे दिन स्वामीजी संवत 1515 में अपनी कुटी में अंतर्धान हो गए। "
रामावत संप्रदाय की स्थापना कर रामानंदजी ने राम उपासना को व्यापक आधार प्रदान किया। परमेश्वर, राम की उपासना के लिए 'रामार्चन पद्धति' नामक उत्तम कोटि के ग्रंथ की रचना की, वहीं 'वैष्णव मताब्ज भास्कर' के माध्यम से अपने धर्म-दर्शन को प्रकट किया। उन्होंने कर्मकांड को प्रश्रय नहीं दिया। ईश्वर की शरणागति में कुल, बल, काल, अवस्था की कोई अपेक्षा नहीं रखी। उनके बारह शिष्य भिन्न जाति और कुल के हैं, जिनमें रैदास जाति से चमार, पीपा क्षत्रिय, धना जाट, सेन नाई, कबीर जुलाहा जैसी जातियों से थे। 20 रामानंद के इन बारह शिष्यों को बारह आदित्य कहा गया है। इन शिष्यों की भक्तिधारा में भी सगुण-निर्गुण जैसा स्वातंत्र्य था। आलोचक शिवकुमार मिश्र ने ठीक ही कहा है कि, "रामानंद निस्संदेह उत्तर भारत के सांस्कृतिक नवजागरण के अग्रदूत थे।"
रामानंद का जन्म तो प्रयाग में हुआ किंतु युवाकाल में वे काशी आ गए। आज भी उनके द्वारा संस्थापित 'श्रीमठ' रामानंद संप्रदाय की प्रमुख पीठ के रूप में विद्यमान है। प्रयागराज में जहां रामानंद का जन्म हुआ था, वह स्थल 'हरीत माधव मंदिर' के रूप में आज भी दर्शनीय है। रामानंद ने भले ही अपने स्वतंत्र 'रामावत संप्रदाय' की स्थापना कर ली किंतु दर्शन के रूप में उन्हें रामानुजप्रणीत विशिष्टाद्वैत ही स्वीकार्य था। रामोपासना की भक्तिधारा सहज गम्य हो सकती है, इसलिए रामावत संप्रदाय की स्थापना की, बाद में यह संप्रदाय खूब फूला फला। रामानंद के बाद उनकी शिष्य-प्रशिष्य परंपरा में गलता गद्दी रामावत संप्रदाय की एक प्रमुख पीठ के रूप में अत्यधिक ख्यातिनाम हुई। कृष्णदासजी पयहारी के शिष्य अग्रदास ने रामानंद संप्रदाय का एक द्वारा रैवासा में स्थापित किया। उन्हीं अग्रदास के शिष्य भक्तमाल के रचयिता नाभादास थे।
रामानुजाचार्य ने वर्णाश्रम धर्म में भगवद् आराधना में अनुष्ठान को प्रधानता दी, जबकि रामानंदाचार्य ने लोकमंगल के व्यापक दृष्टिकोण को रखकर अनुष्ठान की जगह संस्कार, आचार, आराधन में एक समन्वयकारी भक्ति पद्धति को प्रमुखता प्रदान की। भक्ति का सहज-सरल मार्ग प्रशस्त किया। भक्ति मार्ग के अनेक कठोर बंधनों को तोड़ने का कार्य भी उन्होंने किया। आचार्य होने के नाते प्रस्थानत्रयी पर उपनिषद् भाष्य, आनंद भाष्य तथा गीता भाष्य की रचना की। पंथानुयायियों के लिए 'वैष्णव मताब्ज भास्कर' में आपने स्पष्ट लिखा कि हर व्यक्ति भगवद् प्रपत्ति (भक्ति) का अधिकारी है। इसके लिए केवल आत्मसमर्पण की अपेक्षा रहती है। पद्मावती और सुरसुरी नामक दो स्त्रियों को शिष्या बनाकर उन्होंने स्त्रियों के लिए भी भक्ति का मार्ग खोल दिया। उनके इसी उदार दृष्टिकोण के कारण उत्तर भारत में भक्ति का व्यापक प्रसार हुआ। रामानंद संप्रदाय पर गहन अध्ययन करने वाले डॉ. बदरीनारायण श्रीवास्तव ने रामानंद के सभी ग्रंथों की संख्या 17 बताई है, जिसमें कुछ ग्रंथ हिंदी व कुछ संस्कृत भाषा में हैं। उनके प्रमुख ग्रंथों में श्रीवैष्णव मताब्ज भास्कर, श्री रामार्चन पद्धति, गीता भाष्य, उपनिषद् भाष्य, आनंद भाष्य, सिद्धांत पटल, रामरक्षा स्तोत्र, राममंत्र जोग, योग चिंतामणि, राम अष्टक आदि हैं। 21 वैष्णव मताब्ज भास्कर, पंथ उपदेशार्थ है, वहीं 'रामार्चन पद्धति' की रचना स्वामीजी ने अपने प्रथम दो शिष्य अनंतानंदजी तथा सुरसुरानंद को उपदेश देने के निमित्त की थी। बाद में सभी शिष्य वर्ग में इसका अत्यधिक प्रचार हुआ। 'आनंद भाष्य' पर अप्रामाणिकता का आरोप भी लगा है। 'सिद्धांत पटल' भी तपसी शाखा का प्रमुख ग्रंथ है। तपसी- रामानंद संप्रदाय की एक अलग शाखा है। रामानंदजी द्वारा रचित हनुमत आरती - 'आरती कीजै हनुमान लला की, दुष्ट दलन रघुनाथ कला की' तो बहुत प्रसिद्ध रही है। रामानंदजी द्वारा रचित कुछ फुटकर पद भी चर्चित रहे हैं।
रामानंदजी का जन्मनाम रामदत्त था। उनके गुरु राघवानंद रामानुजाचार्य की शिष्य परंपरा में 14वें आचार्य माने जाते हैं। रामानंद ने गुरु आज्ञा से नव संप्रदाय की स्थापना की। रामानंद ने संपूर्ण भारत का धर्म प्रचारार्थ तीर्थाटन किया, जिसे रामानंद दिग्विजय नाम दिया गया। वे अपने शिष्यों के यहां भी गए। पीपाजी के निमंत्रण पर गागरौन गढ़ भी गए। कहते हैं, उनके साथ कबीर और रैदास भी थे। किंवदंती तो यह भी प्रसिद्ध है कि वे धनावंश के पंथ प्रवर्तक धनाजी के पास भी पहुंचे थे और उन्हें पंथ निर्माण की आज्ञा अपनी दूसरी भेंट के दौरान प्रदान की थी। धनाजी ने प्रथम भेंट युवाकाल में स्वयं काशी जाकर की थी तथा उन्हें अपना गुरु बनाया था। रामानंद ने वैष्णव धर्म के प्रचारार्थ जनभाषा को काम में लिया। उनके अधिकांश शिष्यों ने जनभाषा में ही भक्ति रचनाएं तैयार कीं।
रामानंद के नवीन संप्रदाय को वैरागी संप्रदाय कहा गया। रामावत संप्रदाय के साधु वैरागी कहे गए। संवत 1505 को रामानंदजी की मृत्युतिथि माना जाता है। डॉ. बदरीनारायण श्रीवास्तव के अनुसार, "स्वामीजी ने मृत्युकाल समीप जानकर अनंतानंद को काशी रहकर और सुरसुरानंद को पंजाब, भावानंद को दक्षिण, नरहरियानंद को उत्कल, गालवानंद को कश्मीर, पीपा तथा योगानंद को गुर्जर देश, धना, कबीर, रैदास और सेन को काशी रहकर धर्म एवं भक्ति के प्रचार का आदेश दिया।" 22 अपने गुरु द्वारा उत्तरकाल में दी गई आज्ञा का सभी संत शिष्यों ने पालन किया। रामानंद के जीवन चरित्र को लेकर प्रसंग 'पारिजात' 'रामानंदायन' तथा भगवद्दास रचित 'रामानंद दिग्विजय' नामक ग्रंथ प्राप्त होते हैं।
स्वामीजी के 12 प्रमुख शिष्यों में प्रथम शिष्य अनंतानंदजी थे। वे पुष्कर क्षेत्र के ब्राह्मण थे। वे ब्रह्मा के अवतार थे। भक्तमाल में अनंतानंद का जन्म अयोध्या के समीप महेशपुर नामक ग्राम में बताया गया है। द्वितीय शिष्य कबीर हुए। कबीर का जन्म काशी में हुआ। वे काशी के लहरतारा तालाब में नीरु एंव नीमा नामक जुलाहा दंपती को मिले। बड़े होकर रामानंद के शिष्य बने किंतु सगुण की जगह आपने निर्गुण भक्तिधारा को प्रश्रय प्रदान किया। सुरसुरानंद का जन्म लखनऊ के निकट परखम नामक गांव में हुआ। सुरसुरानंद को देवर्षि नारद का अवतार बताया गया। काशी आकर रामानंदाचार्य के शिष्य हो गए। सुरसुरानंद के गांव की सुरसुरी नाम की ब्राह्मण कन्या ने सुरसुरानंद को पति रूप में मान रखा था, इसलिए वह भी स्वामीजी के चरणों में रहकर लोककल्याण के निमित्त भजन भाव में निमग्न रहने लगी और स्वामीजी की शिष्या हो गई। नरहरियानंद रामानंदजी के शिष्य थे। आपका जन्म वृंदावन के निकट एक गांव में हुआ। अति अल्पवय में माता की मृत्यु होने पर नरहरियानंद को रामानंदजी के यहां काशी में भिजवा दिया गया था। आप ही जगत विख्यात संत तुलसीदासजी के गुरुजी थे।
रामानंदजी के शिष्य रैदास भगवान के बहुत बड़े भक्त थे। जाति से चमार होने के कारण जूते गांठकर अपना जीवनयापन करते लेकिन उनकी उत्कृष्ट भक्ति ने उन्हें अपार प्रसिद्धि दिलवाई। रैदासजी की वाणी श्रुति, शास्त्र और सदाचार संपन्न थी। भक्त धनाजी की भी अपने गुरुभाई रैदास में बड़ी प्रीति थी। वे अपने एक पद में रैदास के संबंध में कहते हैं कि मरे ढोर के चर्म का व्यवसाय करने के बावजूद वे माया का परित्याग करने वाले हैं। पीपा गागरौन गढ़ के खीची राजा थे। वे देवी उपासक थे। मुक्ति की चाह रखने पर देवी ने उन्हें रामानंद का शिष्यत्व ग्रहण करने की आज्ञा प्रदान की थी। रामानंदजी का शिष्यत्व ग्रहण कर पीपा ने अपने राजपाट और रानियों का परित्याग कर दिया। रामानंदजी का शिष्य बनने के कुछ काल बाद रामानंदजी अपनी बड़ी शिष्य मंडली के साथ गागरौन गढ़ आए। पीपाजी ने सभी संतों की सेवा की। पीपा का समस्त जीवन संत सेवा में व्यतीत हुआ। पीपा कबीर के समकालीन थे। रामानंदजी के शिष्य सेन जाति से नाई थे। भगवान के प्रिय भक्त थे, इसलिए अपने भक्त की लाज रखने के लिए भगवान ने नाई का रूप धर लिया था। सेन बांधवगढ़ राजा के नाई थे। वे सदा संतों की सेवा में लगे रहते थे।
रामानंदजी के प्रमुख बारह शिष्यों में परिगणित सुखानंद अनूठे प्रभुभक्त थे।
उन्हें रामानंदजी का शिष्य बनने का दिव्य आदेश प्राप्त हुआ। वे अपने गुरु के दर्शन करने के लिए व्याकुल हो गए। सुखानंद भगवान के भाव में इस तरह से निमग्न रहते, उनके नेत्रों से लगातार प्रभु विरह में नेत्र किसी झरने की तरह झरते रहते।
पद्मावती भी रामानंदजी के द्वादश शिष्यों में एक थीं। वे लक्ष्मीजी का अवतार थीं। आपके पिता प्रभाकरजी भगवती लक्ष्मी के उपासक थे। स्वयं लक्ष्मीजी ही पुत्री रूप में प्राप्त हुईं। वे अपने पिता को लेकर काशी में रामानंदाचार्य के दर्शनार्थ उपस्थित हुईं और शिष्या रूप में दीक्षित हुईं। काशी में रहकर उन्होंने महिलाओं में रामभक्ति के जागरण का कार्य किया।
रामानंदजी के शिष्य भावानंद को महाराज जनकजी का अवतार माना जाता है। वे मिथिला निवासी थे। इनका जन्म नाम विठ्ठलपंत था। दीक्षा के उपरांत रामानंदजी ने आपको भावानंद नाम दिया। ये गृहस्थ संत थे। इनके पुत्र निवृत्तिनाथ, ज्ञानदेव और सोपानदेव महान संत हुए। पुत्री मुक्ताबाई भी श्रेष्ठ भक्तों में परिगणित है।
रामानंदजी के सबसे छोटे शिष्यों में धनाजी ही थे। धनाजी भगवान के अद्वितीय भक्त हुए। भक्त शब्द उनके नाम के आगे जुड़ गया। स्वयं भगवान ने ही प्रसन्न होकर उन्हें दर्शन देकर रामानंदजी का शिष्यत्व ग्रहण करने का आदेश प्रदान किया था। वे काशी आए और रामानंदजी से दीक्षा प्राप्त की। परशुराम चतुर्वेदी के अनुसार वे कबीर, नामदेव, रैदास और सेन से छोटे थे। 23 परशुराम चतुर्वेदी भले ही धना के रामानंद का शिष्य होने में थोड़ा संशय इसलिए प्रकट करते हैं कि उनके पदों में गुरु रामानंद का उल्लेख नहीं है। जबकि नाभादासजी की भक्तमाल से बड़ा दूसरा साक्ष्य क्या हो सकता है, जिसमें वे उन्हें रामानंद के बारह शिष्यों में उल्लेखित करते हैं। प्रामाणिक-अप्रामाणिकता की बात को दरकिनार करते हुए देखें तो अगस्त्य संहिता में भी धना को रामानंद का शिष्य बताया गया है। अग्रदासजी के ग्रंथ 'रहस्यत्रय' में भी उन्हें रामानंदजी का शिष्य ही बताया गया है। रामानंद संप्रदाय के अन्यान्य सभी ग्रंथों में भी ऐसी ही पुष्टि की गई है। मैकालिफ ने 'द सिख रिलीजन' में धनाजी के अनेक उल्लेख दिए हैं। रीवां नरेश रघुराजसिंह भी धना के संबंध में अनेक कथन करते हैं।
'अगस्त्य संहिता' में रामानंदजी के सभी बारह शिष्यों को महाभागवतों का अवतार माना गया है। जो इस प्रकार हैं-
(1) अनंतानंदजी-ब्रह्मा के अवतार, (2) सुरसुरानंदजी - नारद के अवतार, (3) सुखानंदजी-शंभु के अवतार (4) नरहरियानंदजी - सनत्कुमार के अवतार, (5) योगानंदजी-महर्षि कपिल के अवतार, (6) पीपाजी- मनु के अवतार, (7) कबीरजी- प्रह्लाद के अवतार, (9) सेनजी- भीष्म के अवतार, (10) गालवानंदजी -शुकदेव के अवतार, (11) रैदासजी- यमराज के अवतार, (12) धनाजी-बलि के अवतार तथा पद्मावतीजी- लक्ष्मीजी की अवतार। यहां सुरसरि को विस्मृत कर गए तथा दो नए शिष्यों के रूप गालवानंदजी तथा योगानंदजी के नाम जुड़ गए हैं। रामानंद परंपरा के कतिपय अन्य ग्रंथों में शिष्यों के नामों में थोड़ा अंतर है किंतु भक्तमाल में उल्लेखित शिष्यों को ही अधिक प्रामाणिक माना गया है।
रामानंदजी के शिष्य धनाजी के जीवन, आचार एवं भक्ति के संबंध में हम विस्तारपूर्वक विचार आगे के पृष्ठों में करेंगे। धनाजी पर रामानंदजी की सहज प्रीति थी। धनाजी की भगवनिष्ठा ने रामानंदजी को अत्यधिक प्रभावित किया था। भक्ति की जहां चर्चा चलती, रामानंदजी भक्त श्रेष्ठ धनाजी की निस्पृह भक्ति का अवश्य उल्लेख किया करते।
