Notable Personalities: श्री देवाराम स्वामी

नाम- श्री देवाराम स्वामी 

पिता -श्री विजय राम जी स्वामी

गोत्र -भाम्मू 

निवासी -बाकलिया तहसील लाडनूं जिला नागौर 

जन्म- 7 जुलाई 1937

शिक्षा-प्रारंभिक शिक्षा गाव बाकलिया में हुई एवं तत्पश्चात हाई स्कूल तक की परीक्षा 1954 में श्री जगन्नाथ तापड़िया हाई स्कूल से उत्तीर्ण की। 

इंटरमीडिएट की परीक्षा 1963 में माध्यमिक शिक्षा मंडल मध्यप्रदेश भोपाल से उत्तीर्ण की

जीवनी:-

संसार रूपी सागर में प्रक्रति के अनुरूप असंख्य जीवो का आगमन धरा पर होता है और आगमन के पश्चात प्रक्रति द्वारा प्रदान किये गए विशेष गुणों के अनुरूप वह अपने दायित्व का निर्वहन करके इस संसार से पुनः विदा हो जाते हैं। लेकिन संसार में उत्पन्न होने वाले जीवो में एक मनुष्य ही एसा प्राणी है जिसको सभी सजीव गतिविधियों के साथ-साथ विवेक व बुद्धि का प्रकाश लेकर इस संसार में ईश्वर की महरबानी से आते हैं। सर्व मंगलकारी परमात्मा दवारा संसार के सभी मनुष्यों को समान रूप से सामर्थ्य और शक्ति प्रदान करके भेजते हैं, लेकिन उनमें से बहुत कम व्यक्ति होते हैं जो अपनी शक्ति और सामर्थ्य का उपयोग जनकल्याण और मानवता के नए आयाम स्थापित करने में कर पाते हैं। ऐसे ही एक व्यक्तित्व का मैं आपसे परिचय करवाना चाह रहा हूं जिन्होंने अपने सांसारिक दायित्वों का निर्वहन के साथ-साथ बेहतरीन तरीके से निस्वार्थ सामाजिक दायित्व का निर्वहन करके मानवता की एक मिसाल कायम की हैं। ऐसे व्यक्तित्व का नाम है श्री देवाराम स्वामी जिनका जन्म श्री विजय राम जी स्वामी गोत्र भाम्मू निवासी बाकलिया तहसील लाडनूं जिला नागौर के घर में दिनांक 7 जुलाई 1937 को हुआ। श्री देवाराम जी के पिता विजय राम जी एक सामान्य कृषक होते हुए भी अपनी दूरदृष्टि सोच के कारण अपनी संतान को शिक्षा दिलाने के लिए शिक्षण संस्थान में प्रवेश दिलाया, इनकी प्रारंभिक शिक्षा गाव बाकलिया में हुई एवं तत्पश्चात हाई स्कूल तक की परीक्षा 1954 में श्री जगन्नाथ तापड़िया हाई स्कूल से उत्तीर्ण की। हाई स्कूल की परीक्षा पास करने के पश्चात पारिवारिक परिस्थितियों के मध्य नजर इन्होने रोजगार के लिए पशुपालन महाविधालय बीकानेर से 6 महीने का वेटरनरी कम्पाउंडर पाठ्यक्रम पास किया एवं 21 फरवरी 1956 से 15 जुलाई 1961 तक पशुपालन विभाग में कम्पाउंडर के रूप में सेवाएं दी। तत्पश्चात 16 जुलाई 1961 से मार्च 1962 तक कनिष्ट लिपिक, जुलाई 1962 से जुलाई 1965 तक वरिष्ट लिपिक, एवं अगस्त 1965 से जनवरी 1966 तक अकाउंटेटस कलर्क के रूप में सेवाएं दी । इस दौरान उन्होंने अपने शिक्षण को नियमित रखते हुए इंटरमीडिएट की परीक्षा 1963 में माध्यमिक शिक्षा मंडल मध्यप्रदेश भोपाल से उत्तीर्ण की और साथ ही लोक सेवा आयोग अजमेर द्वारा आयोजित लेखाकार परीक्षा 1965 पास की एवं रसद विभाग सीकर में लेखाकार के पद पर नियुक्त हुए ।


1982 में सहायक लेखाधिकारी के पद पर पदोन्नति होने पर स्थानीय अंके क्षण उप निदेशालय जोधपुर अन्तर्गत आपने सोडियम सल्फेट आडिट सुप्रिटेंडेंट के रूप में जिला परिषदों, नगर परिषदों, कृषि मंडियों, ग्राम पंचायतो आदि समस्त संस्थाओ का अंके क्षण का कार्य किया।


फरवरी 1992 मे आपकी पदोन्नति लेखा अधिकारी के पद पर होने के फलस्वरूप आपने नागौर ट्रेजरी में जिला कोषाधिकारी के रूप में महत्वपूर्ण पदभार ग्रहण किया एवं जिला स्तरीय अधिकारी के रूप में अपनी अमिट छाप स्थापित करते हुए अपनी विशेष पहचान पुरे जिले में बनाई। आप में सामाजिक दायित्व एवं समाज सेवा की ललक प्रारम्भ से ही रही थी आपने सामाजिक संगठन बनाकर सामाजिक जागरूकता उत्पन्न करने एवं सर्वप्रथम राजस्थान में धन्नावन्शी स्वामी समाज की एक अलग पहचान कायम करने के लिए अपने कुछ सक्रिय सहयोगियों के साथ 1975 में नागौर में एक बैठक आयोजित कर समिति का गठन किया गया जसमे महंत प्रेमदास जी जायल को अध्यक्ष, श्री रतनदास जी स्वामी निम्बी को मंत्री तथा स्वयं देवाराम जी स्वामी कोषाध्यक्ष बने। उसके पश्चात इस समिति के अनुकरण में जोधपुर प्रवासी समाज के बन्धुओं द्वारा इसी समिति के द्वारा बनाए गए संविधान एवं कर्तव्यों के अनुसार राजस्थान स्तर की समिति का गठन क्या एवं उसका जयपुर में रजिस्ट्रेशन करवाया गया। जोधपुर स्थित उक्त समिति सामाजिक जागरूकता के क्षेत्र में ज्यादा महत्वपूर्ण कार्य नहीं कर सके और रजिस्ट्रेशन तक ही सिमित रही। लेकिन श्री देवाराम जी के मन में हमेशा यह भावना बनी रही कि किस प्रकार सामाजिक संगठन को मजबती प्रदान की जाए। सामाजिक संगठन की एकता और मजबूती प्रदान करने के लिए जब भी कोई सामाजिक परिवारिक समारोह होता देवाराम जी द्वारा समारोह में मौजूद समाज के मौजिज लोगो के सामने अपने मन के मन्तव्य को प्रकट करते और समाज के होनहार युवाओं और विद्यार्थियों के लिए कोई शैक्षणिक संस्था निर्माण का प्रस्ताव रखते। सामाजिक माहोल बनाने का यह कार्य काफी लम्बे समय तक चला और इस दौरान उन्हें कोई बड़ा सहयोग कहीं से प्राप्त नहीं हुआ फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी और अपने मन्तव्य के अनुरूप लक्ष्य की प्राप्ति के लिए अपने कदमों को हमेशा आगे बढ़ाते रहें। और जैसा कि हम जानते है प्रक्रति में कुछ सुभ कार्य करने के लिए इश्वर ने कोई नियत समय पहले से तय कर रखा होता है, और ऐसा ही हमारी सामाजिक संस्था के गठन और स्थापना का नियत समय शायद इश्वर ने पहले से ही तय कर रखा था। इसी शुभ कार्य के लिए इश्वर ने इनके मन और मष्तिष्क में एक नई उर्जा और शक्ति प्रदान की और इन्होनें इस कार्य को अंजाम तक पहुंचाने के लक्ष्य के अनुरूप अपने कुछ चुनिन्दा साथियों के साथ एक बैठक 3 मार्च 1993 को हुई तथा समाज का भवन मंगलपुरा लाडनूं में 1996 बनाया गया था जिसकी जमीन का क्रय समाज के आर्थिक सहयोग से चंदा एकत्रित करके किया गया था एवं उस संस्थान को श्री धन्नावंशी स्वामी समाज शिक्षण संस्थान मंगलपुरा लाडनूं के नाम से जाना जाता है, मैं आयोजित की गयी और एक प्रस्ताव पारित किया गया की नागौर जिले के लिए धन्नावंशी स्वामी समाज समिति का गठन कर उसका रजिस्ट्रेशन करवाया जावे। समिति में सर्वसम्मति से प्रस्ताव लेकर श्री देवाराम स्वामी को अध्यक्ष बनाया गया एवं इस सम्पूर्ण कार्य का दायित्व भी इन्हीं को सौंपा गया आपने अपने दायित्व के अनुरूप 26 मार्च 1993 को नागौर में श्री धन्नावंशी स्वामी समाज समिति का रजिस्ट्रेशन करवाया। इस समिति में आप स्वयं अध्यक्ष मनोनीत किये गए तथा आपके सहयोगी श्री रतन दास स्वामी को मंत्री एवं श्री रामनिवास स्वामी रायधनु को कोषाध्यक्ष तथा नरेन्द्र कुमार स्वामी जखेड़ा को अध्यक्ष शिक्षा समिति बनाया गया।


जोधपुर रोड नागौर पर 15 बिस्वा जमीन का निशुल्क आवंटन कर दिया। जमीन आवंटन के साथ ही श्री देवाराम जी ने अपने कुछ सहयोगियों के साथ उस जमीन पर अपने निजी कोष से छोटी सी बाउंड्री वोल का निर्माण करवाकर कब्जा प्राप्त किया एवं भवन निर्माण की ऐतिहासिक नींव रखी गई। तत्पश्चात आवंटित जमीन पर समाज का भव्य भवन खड़ा करने के लिए समाज के सभी भामाशाओ से सहयोग प्राप्त करने के लिए प्रथम बैठक का आयोजन 25 सितम्बर 1994 को आवंटित भूमि पर करने का निर्णय लिया गया और बैठक आयोजन की सूचना समाज के नागरिकों को प्रेषित की गई। और जैसा की होता है प्रकृति को कुछ और ही मंजूर था इस शुभ घडी में जिस उत्साह और उमंग के साथ देवाराम जी ने इस बैठक का आयोजन करने का निर्णय लिया था। प्रकृति की क्रूरता ने इनके साथ बहुत बड़ा अन्याय किया और इनका प्रशिक्षु डॉक्टर पुत्र जो कि बीकानेर से ट्रेनिंग ले रहा था का अचानक मलेरिया की वजह से 24 सितम्बर 1994 को स्वर्गवास हो गया। यह उनके जीवन का बहुत बड़ा आघात और असहनीय पीड़ा और कष्ट का समय था फिर भी हिम्मत के धनि इस महान विभूति ने दृढ निश्चय के साथ इस पीड़ा और इस असहनीय कष्ट को भी सहन करके सामाजिक दायित्व निर्वहन को कमजोर नहीं पड़ने दिया। आपने समाज के प्रबूदाघ नागरिकों के साथ अपनी अगवाई में गांव-गांव तक अपने निजी खर्च से पहुँच कर उनसे सहयोग प्राप्त किया और समाज का राजस्थान में प्रथम भव्य छात्रावास एवं भवन की स्थपना की। यही नहीं भवन निर्माण के पश्चात भी आपका लगाव इस संस्था के प्रतिदिन बढ़ता गया और सेवानिवृति के पश्चात अपने स्वास्थ्य की परवाह किये बिना भी लगातार आज तक इस संस्था का अध्यक्ष पद सुशोभित करते हुए प्रबंधन में अपना अमूल्य योगदान प्रदान कर रहें हैं। और जब भी कोई सामाजिक समारोह होता है और आपको अवसर मिलता है तो आप इस संस्था के हित में बिना किसी संकोच के सहयोग देने एवं समाज से प्राप्त करने के लिए हमेशा लालायित रहते हैं। इन्हीं के अनुकरण से समाज के लिए जोधपुर, बीकानेर, जयपुर में भवन निर्माण की सकारात्मक प्रतिस्पर्धा जगी और वहां पर भी भवन बनकर समाज की एक अलग पहचान कायम की। मेरे पास वह शब्द और वो लेखनी नहीं है जो मैं ऐसी महान विभूति के जीवन चरित्र का वर्णन कर सकू लिकिन यह मेरा सोभाग्य है कि में पिछले 20 वर्षों से आपके सानिध्य में इस सामाजिक संस्था और समाज के प्रथम तीर्थ स्थल के सेवा में आपका अनुचर बनकर सहयोगी बनने पर गोरवान्वित महसूस कर रहा हूँ। पुनश्च महान विभूति के चरणों में सादर अभिनन्दना।


लेखनी
स्वामी राधेश्याम गोदारा
(कोषाध्यक्ष श्री धन्नावंशी स्वामी समाज समिति नागौर)