डूंगर बालाजी मंदिर-

 

*ऊंचे पर्वत पर रम्य डूंगर बालाजी मंदिर*

 

राजनीतिक उठापटक तथा अनेक युद्धों के कारण छापर के निकट का ऐतिहासिक गांव द्रोणपुर लगभग नष्ट हो चुका था। तब बीदावाटी के राव गोपालदास(सिंह) बीदावत एक नया गांव अपने नाम पर बसाना चाहते थे। और अपने लिए एक नया किला सुरक्षित जगह पर बनाना चाहते थे। राव गोपाल दास राव बीदा के प्रपौत्र थे। गोपाल दास के पिता का नाम राव सांगा तथा उनके पिता का नाम संसारचंद था। द्रोणपुर के निकट द्रोणागिरी पर्वत जिसे स्थानीय भाषा में काला डूंगर कहा जाता है, बड़े आकर्षक रूप में था। राव गोपाल सिंह इस पर्वत के शिखर पर किला बनवाना चाहते थे और इस निमित्त उन्होंने पर्वत के शिखर की जगह को समतल करवाना भी प्रारंभ कर दिया था। तभी जमीन समतल करवाते समय राव गोपाल दास को अनेक तरह के अपशगुन होने प्रारंभ हुए। उन्होंने पंडितों से इसके संबंध में जानना चाहा, तब पंडितों ने सलाह दी कि यहां किला बनवाना आपकी सेहत के लिए ठीक नहीं है। उन्होंने सलाह दी कि इस समतल जगह पर एक हनुमत मूर्ति स्थापित कर दी जाए,ताकि इस भूमि की छेड़छाड़ का दोष आपको नहीं लगे। तब उन्होंने उसी पर्वत के पत्थर से बनी एक हनुमत मूर्ति वहां स्थापित कर दी, जो आज भी कायम है। गोपाल सिंह की मृत्यु के बाद उनके सुपुत्र जसवंत सिंह ने अपने पिता के नाम पर इस पर्वत की तलहटी में एक नया गांव बसाया जिसे उन्होंने गोपालपुरा नाम दिया। जो बीदावत ठिकानों में एक प्रमुख ठिकाना माना गया। तब से गोपालपुरा बीदावतों का नया ठिकाना बन गया।

 मंदिर की स्थापना तो संवत 1669 में ही हो चुकी थी, किंतु वह मंदिर बहुत छोटे रूप में रहा। बड़े रूप में डूंगर बालाजी मंदिर का निर्माण सन 1782 में राव उदय सिंह बीदावत के पुत्र भोपाल सिंह ने करवाया। मंदिर के दक्षिण में एक चबूतरे पर अश्वत्थामा की मूर्ति भी स्थापित की गई, क्योंकि यहां अश्वत्थामा का वास बताया जाता है। अश्वत्थामा की गिनती भारत के सप्त चिरंजीवियों में की जाती है। भोपाल सिंह ने ही गोपालपुरा के गढ़ का निर्माण करवाया। बीकानेर के महाराजा सूरत सिंह ने 2 रुपए की भोग पूजा इस मंदिर के लिए प्रारंभ की, जो देश आजाद होने तक बीकानेर राज्य से कायम रही। ऐतिहासिक डूंगर बालाजी मंदिर 2100 फीट ऊंचे द्रोणागिरी पर्वत पर स्थित है। इस द्रोणागिरी पर्वत के संबंध में किंवदंती प्रचलित है कि हनुमानजी जब संजीवनी बूटी लेकर जा रहे थे तब पर्वत का यह हिस्सा यहां टूट कर गिर गया। कहते हैं पांडवों ने भी इसी पर्वत के निकट अज्ञातवास का कुछ काल यहां व्यतीत किया था। महाभारत काल के गुरु द्रोणाचार्य की यह तपस्थली बताई जाती है। निकट के चाड़वास गांव को आचार्यवास के रूप में द्रोणाचार्य द्वारा बसाया हुआ बताया जाता है। आज भी द्रोणागिरी पर्वत पर अश्वत्थामा की गुफा बताई जाती है। जिसकी लंबाई कहते हैं कि रणधीसर की डूंगरी तक गई हुई है। यहां द्रोणाचार्य की गुफा भी  बताई जाती है। लोगों का मानना है कि सफेद वस्त्र धारण किए चिरंजीवी अश्वत्थामा रात्रि में घूमते देखे गए हैं। यह लोक धारणा है। डूंगर बालाजी मंदिर सुजानगढ़ तहसील मुख्यालय से 12 किलोमीटर उत्तर पश्चिम में स्थित है। सड़क मार्ग से जुड़ा होने के कारण यहां प्रतिदिन चहल पहल रहती है। तथा श्रद्धालु लोग यहां पर सैकड़ों की संख्या में आते रहते हैं। मंदिर तक पहुंचने के लिए पक्की सड़क तथा अलग से सीढ़ियां बनी हुई हैं। ये दोनों ही तरह के मार्ग ऊपर चढ़ने के लिए हैं। वाहन से जाने वाले लोग सड़क मार्ग से तथा पैदल जाने वाले लोग 375 सीढ़ियों को पार कर मंदिर तक पहुंचते हैं। धूप तथा वर्षा के बचाव हेतु सीढ़ियों पर छत बनी हुई है। ये सीढ़ियां 116 वर्ष पहले बनाई गई थीं। सीढ़ियों के दोनों तरफ रेलिंग तथा बीच-बीच में विश्राम स्थल बने हुए हैं। छायादार पेड़ भी सीढ़ियों के किनारे लगाए हुए हैं। जिससे श्रद्धालुओं को किसी भी मौसम में मंदिर तक पहुंचने में कोई दिक्कत नहीं होती। इस पर्वत पर पहुंचना बहुत ही रोमांचकारी होता है। मंदिर के निकट राम सीता, शिव मंदिर तथा मोहन लाल सोमानी (श्रीडूंगरगढ़) पितरजी के मंदिर बने हुए हैं। ऊपर दो विश्राम घर भी बने हुए हैं। मंदिर में निरंतर हनुमत स्तवन के रूप में हनुमान चालीसा, सुंदरकांड आदि के पाठ चलते रहते हैं। मंदिर में बालाजी की तीन मूर्तियां स्थापित हैं। जिनमें एक सर्वाधिक प्राचीन तथा दो नवीन मूर्तियां हैं। एक मूर्ति बीकानेर के महाराजा गंगासिंहजी के पुत्र सादुल सिंह द्वारा स्थापित है। मंदिर का पूजन गोपालपुरा के महंत धनावंशी स्वामी परिवार करता है।

             

•• चेतन स्वामी••